March 21, 2009

समानता का सहस्त्राब्दी लक्ष्य

सात साल में पूरा होगा?



भारतीय गांव में आज भी लड़कियों को पहली दूसरी या ज्यादा से ज्यादा पांचवी तक पढ़ा कर स्कूल छुड़वा दिया जाता है लेकिन अब ऐसी माताएं अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए अडिग हैं। भारत में इन दिनों औपचारिक स्कूल व्यवस्था को उन क्षेत्रों में सशक्त किया जा रहा है जहां लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा के बाद स्कूल नहीं भेजा जाता।



भारत में महिलाओं की स्थिति बेहतर मानी जाती है लेकिन यह भी सच है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है। घूंघट में छिपे चेहरों में आज आत्मविश्वास की इतनी ललक है कि हर क्षेत्र में अब पुरूषों के कंधे से कंधा मिला कर चलने में भी उन्हें कोई गुरेज़ नहीं है। आंकड़ों पर यदि नजऱ डाली जाए तो 2001 की जनगणना में भारत में 54 प्रतिशत महिलाएं साक्षर थीं। यदि लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सहस्त्राब्दी लक्ष्यों की बात की जाए तो 2015 में तक प्राथमिक शिक्षा में लड़कों और लड़कियों का अनुपात शत- प्रतिशत होना चाहिए जो 2005 में 91 प्रतिशत पहुंच चुका था।

इसी तरह माध्यमिक शिक्षा में भी लड़के लड़कियों का अनुपात 100 प्रतिशत होना चाहिए और 2003 में यह दर 70 प्रतिशत पहुंच गई थी। राजस्थान में महिला आयोग की अध्यक्षा और राजस्थान विश्वविद्यालय में लंबे समय तक जर्मन भाषा पढ़ा चुकी प्रमुख शिक्षाविद् डॉ. पवन सुराणा का कहना है कि महिलाओं के साक्षर होने से कुछ नहीं होगा बल्कि उन्हें शिक्षित भी होना पड़ेगा। शिक्षा के उच्च स्तर स्तर पर लैंगिक अंतर बढ़ता है और जहां प्राथमिक स्तर पर प्रति 1000 लड़कों की भर्ती पर 95 लड़कियां स्कूलों में प्रवेश लेती हैं वहीं यह अनुपात उच्च प्राथमिक स्तर पर घट कर 88 प्रतिशत रह जाता है।

मानव संसाधन और विकास मंत्रालय के डीआईएसई की रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्य को तब तक प्राप्त नहीं किया जा सकता जब तक सभी लड़कियों को शिक्षा व्यवस्था से नहीं जोड़ लिया जाता। भारतीय गांव में आज भी लड़कियों को पहली दूसरी या ज्यादा से ज्यादा पांचवी तक पढ़ा कर स्कूल छुड़वा दिया जाता है लेकिन अब ऐसी माताएं अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने के लिए अडिग हैं। भारत में इन दिनों औपचारिक स्कूल व्यवस्था को उन क्षेत्रों में सशक्त किया जा रहा है जहां लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा के बाद स्कूल नहीं भेजा जाता। लड़कियों के लिए स्कूल खोले जाने, महिला अध्यापकों की संख्या बढ़ाने और बड़ी उम्र की लड़कियों को शिक्षा से जोडऩे के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।

1988 में शुरू किया राष्ट्रीय साक्षरता मिशन बताता है कि कुल अशिक्षित आबादी में महिलाओं की बहुत बड़ी संख्या है। यह मिशन वास्तव में महिलाओं को क्रियाशील साक्षरता प्रदान करने का मिशन है। महिला प्रौढ़ शिक्षा और युवतियों की शिक्षा के लिए भी देश में कई कार्यक्रम संचालित हैं। राष्ट्रीय बालिका शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत जहां 31 हज़ार आदर्श विद्यालय विकसित किए गए और दो लाख अध्यापकों को लैंगिक संवेदनशीलता में भी प्रशिक्षित किया गया। सवाल यह भी है कि वो कौन से कारण है जो महिलाओं की कम साक्षरता के लिए जि़म्मेदार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक भेदभाव और आर्थिक शोषण इसमें प्रमुख भूमिका निभाते हैं। सहस्त्राब्दी लक्ष्य अभी सात साल दूर है फिर भी उन्हें प्राप्त कर पाना अभी एक बड़ी चुनौती है।

संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दी लक्ष्यों में लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण का लक्ष्य रखा गया है। भारत में महिलाएं हर क्षेत्र में पुरूषों की बराबरी कर रही हैं पर शिक्षा के क्षेत्र में समानता लाए जाने के प्रयास जारी हैं।
000

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती. com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी,कविता, गीत,गजल, व्यंग्य,निबंध,लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है।आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही साथी समाज सेवी संस्थाद्वारा संचालित स्कूलसाथी राऊंड टेबल गुरूकुल में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है।
शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से साथी राऊंड टेबल गुरूकुलके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है।
अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर,तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में),क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर,पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर,जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ।
सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी,रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबाइल नं.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष