November 15, 2008

पुरातन/ संग्रहालय

रायपुर संग्रहालय में बापू के तीन बंदर

-जे. आर. भगत
संग्रहाध्यक्ष, महंत घासीदास स्मारक संग्रहाय, रायपुर

रायपुर संग्रहालय में रखी तीन बंदरों की पत्थर की यह मूर्ति 16वी- 17 वीं शती के आस- पास की हैं। जो राजनांदगांव के गोंड राजाओं से प्राप्त हुई है।
महंत घासीदास स्मारक संग्रहाय में संग्रहीत प्रतिमा दीर्घा में प्रदर्शित तीन बंदरों की प्रतिमाएं मनोरंजन, ज्ञानवर्धक होने के साथ-साथ नैतिक शिक्षा से संबंधित सर्वोत्तम काकृतियों मानी जाती हैं। यद्यपि पत्थर से बनी इन मूर्तियों का कला पक्ष कमजोर है।
आखिर इन बंदरों की काकृतियों में ऐसा क्या है?

इन बंदरों में से एक दोनों हाथों से नेत्र मूंदे है, दूसरा अपने दोनों हाथों से कान मंूदे है और तीसरा अपने दोनों हाथों से अपना मुख ढंका हुआ है। यह तो जग जाहिर है कि बंदरों द्वारा अभिनीत इन मुद्राओं में तीन उपदेश छिपे हुए हैं -

१. बुरा मत देखो
२. बुरा मत सुनो
                                     ३. बुरा मत बोलो

उपरोक्त तीनों उपदेश हमारे उपनिषद, पुराण, गीता, रामचरित मानस आदि में आये हैं तथा पौराणिक आख्यानों में भी इनका विस्तृत दृष्टांत, व्याख्या एवं उद्धरण प्राप्त होता है। मध्य काीन संतों, महात्माओं तथा कवियों ने भी इन्हीं उपदेशों को अपनी-अपनी भाषा में प्रस्तुत किया है। कबीर, रहीम, तुसी, वृन्द, बिहारी आदि कवियों द्वारा रचित दोहे, कविताओं आदि में भी इन बंदरों के इस रूप को उदाहरण के रूप में रखा गया है।

जिस प्रकार ये बंदर बापू के माध्यम से सार्वभौमिक बन गए हैं उसी तरह उपनिषदों का यह संदेश आज भी सार्वभौम तथा प्रासंगिक है -
१. भद्रं कणैभि: श्रृणुयाम
(दूसरों की अच्छाईयां सुनो)

२. भद्रं पश्येमाक्षमिर्य जत्रा:
(दूसरों की अच्छाईयां देखो)

३. ऋ तं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि
(सदैव सत्य बोो)

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से प्राप्त गांधी जी के ये तीन बन्दर इस बात की ओर संकेत करते हैं कि इन बंदरों के माध्यम से नैतिक शिक्षा देने का चलन बहुत पहे यानि 16वीं शताब्दी से ही हो गया था। संग्रहाय में मौजूद बंदर की ये मूर्तियां इस बात का जीता जागता उदाहरण है। तीन बंदरों का यह रूप महात्मा गांधी को अत्यन्त प्रिय था तथा इन्हें वे अपने गुरू के रूप में स्वीकार करते थे।

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