November 23, 2008

सोनाबाई ने जब अपने गांव आने का निमंत्रण दिया

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क्या सोनाबाई के संग्रहालय बनाने का सपना पूरा होगा?

- डॉ. रत्ना वर्मा

अपनी पत्रिका के इस अंक के लिए जब आलोक पुतुल जी (रविवार. ष्शद्व) से बात हो रही थी तब उन्होंने सोनाबाई के लेख के बारे में जानकारी दी, तभी मुझे आज से लगभग 20 साल पहले सोनाबाई से की गई बातचीत के वे पल याद आ गए जब उन्होंने मुझे अपने गांव आने का निमंत्रण दिया था। चाह कर भी मैं इतने बरसो में उनके गांव नहीं जा पाई और अब तो वे ही इस दुनिया से रुखसत हो गई हैं। यदि जाने का मौका भी मिलेगा तो अपने हाथों से सजाए उनके सूने घर- आंगन को देखने की हिम्मत नहीं है मुझमें। हां यदि सोनाबाई के संग्रहालय बनाने के सपनों को पूरा करने की दिशा में कोई प्रयास होता है और उनका बनाया सजाया घर और उनके हाथों से गढ़े गए शिल्प को कला प्रेमियों को देखने के लिए संरक्षित कर संग्रहालय का रुप दे दिया जाता है तब जरूर उनके गांव जाना चाहूंगी। भोपाल राष्ट्रीय संग्रहालय में तो रजवार आर्ट को बहुत ही खूबसूरती से प्रदर्शित किया गया है। आज रजवार आर्ट की अंतर्राष्ट्रीय पहचान बन चुकी है, लेकिन क्या जहां की मिट्टी में सोनाबाई रची बसी रहीं और अपनी कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया है, वहां भी उनकी मूल कला को संरक्षित संवर्धित किए जाने की दिशा में कोई प्रयास किया जाएगा?
फिलहाल तो शंपा शाह के बेहद संवेदनशील लेख के साथ- साथ सोनाबाई से 20 वर्ष पहले लिया गया वह साक्षात्कार भी यहां हूबहू प्रकाशित कर रही हूं जो रायपुर से प्रकाशित दैनिक अमृत संदेश के रविवार के अंक में 8 मार्च 1987 में प्रकाशित हुआ था।
बात सन् 1987 की है तब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश राज्य से अलग नहीं हुआ था। भोपाल में आयोजित होने वाले विभिन्न लोक कलाओं की प्रस्तुति के आधार पर रायपुर में भी बसंत जगार नाम से पहला लोक सांस्कृतिक उत्सव आरंभ किया गया था। इसमें अपनी कला के प्रदर्शन के लिए देश भर से लगभग 500 कलाकारों को आमंत्रित किया गया था। आदिवासी कला संस्कृति के पारखी शेख गुलाब जैसे कला मर्मज्ञ के साथ गोविंद झारा, पेमा फात्या, और सोनाबाई भी अपनी कलाकृतियों के साथ उपस्थित थीं।
कला और संस्कृति मेें विशेष लगाव के कारण, जगार में शिरकत करने वाले लगभग सभी कलाकारों से मैंने तब बातचीत की थी। उस अवसर पर सोनाबाई से लिए गए साक्षात्कार का यह पुनप्र्रकाशन मिट्टी में रची बसी एक कलाकार को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि है-

सोनाबाई रजवार का नाम अब किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कच्ची मिट्टी से वह अपना रचना संसार गढ़ती हैं। सोनाबाई ऐसी लोक कलाकार हैं जो कला कर्म करते नहीं उसे जीते हैं, कला उनके लिए अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति भी है ।

56 वर्षीय सोनाबाई 10-12 वर्ष की उम्र में ही विवाह बंधन में बंध गई थीं। पति जब काम पर बाहर निकल जाते थे तो सोनाबाई का बालमन कुछ करना चाहता था। घर का अकेलापन काटे नहीं कटता था। उसी समय उनका अपना मिट्टी का घर बनने लगा। उस नए घर ने सोनाबई की जीवनधारा ही बदल दी। घर को सजाने संवारने की ललक तो थी ही सो गीली मिट्टी के पशु- पक्षी बना- बना कर वे अपना समय भी काटने लगीं और घर भी सजाने लगीं।

गांव में मिट्टी के पशु- पक्षी, देवी देवता बना कर घर सजाने की कला तो परम्परागत कला है, जो सोना बाई में शायद जन्म से ही विद्यमान थी तभी तो बिना किसी से कुछ सीखे ही उनके हाथ अपने आप ही आकार लेने लगे। कभी तोता तो कभी हिरन, कभी मोर और कभी गाय, बकरी। दीवारों को सजाना गांव की औरतों को खूब आता है, सोना बाई भी पशु - पक्षी बनाते बनाते खिड़कियों पर भी सुन्दर सुन्दर जाली बनाने लगीं और उसी जाली पर कहीं तोता तो कहीं मोर बैठा कर अपना मन बहलाने लगीं।

मुश्ताक ने एक स्थान पर लिखा भी है कि च्सोनाबाई का घर ही उनका कैनवास है। ऐसा बहुआयामी कैनवास जो जीवन्त तो है ही लेकिन जिसमें कलाकार और उसकी रचनाएं एक साथ सांस ले सकते हैं तथा अपने एकांत में मौन संवाद भी कर सकते है । सोनाबाई ने अपने घर में प्रत्योक आकृति को उसका वही स्थान दिया है, जो स्वभावत: हो सकता था। जैसे बरामदे की जाली में बैठी चिडिय़ा। जब उन जालियों मे जीवित चिडिय़ों का झुण्ड का बैठता है तो मिट्टी की बनी चिडिय़ा भी जीवन्त हो चहचहाने लगती है। कोने में बैठे बच्चे, छोटी खिडक़ी से झांकता घोड़ा यह सब इतना सहज लगता है कि कृतियां भी उनके परिवार की सदस्य सी जान पड़ती हैं। ज्

आज सोना बाई दिल्ली भोपाल से बहुत आगे अमरीका तक का सफर कर आई हैं पर सोनाबाई तो खरा सोना हैं कहीं कोई दिखावा नहीं, घमंड नहीं। अपनी कला की तरह वही सरलता और वही भोलापन। वह ठीक से हिन्दी नहीं बोल पाती, अपनी सरगुजिया बोली में अपने मन की खुशी व्यक्त करती हैं कि अब तो लोग मेरे गांव आने लगे हैं। अच्छा लगता है यह सब अनुभव करके। वह कहती हैं- अब मैं एक और मिट्टी का घर बनाऊंगी, जहां मिट्टी की कलाकृति बना- बना कर रखूंगी ताकि दूर दूर से आने वालों को दिखा सकूं। वे कहती हैं मैंने भारत भवन में जैसा संग्रहालय देखा है वैसा ही अपने उस नए घर को संग्रहालय का रूप दूंगी।

सोनाबाई के पास आज बहुत पैसा है। 50 हजार रूपए तुलसी सम्मान के, 5 हजार रुपए राष्ट्रपति पुरस्कार के और 55 हजार वह अमरीका से बचा कर लाई हैं। सब बैंक में जमा हैं। इतना पैसा पास होते हुए भी उन्हें पैसे का घमंड जरा भी नहीं है और न ही वह पैसे का दिखावा करतीं। सोनाबाई के इन भित्ती शिल्पों की कुछ लोगों ने कीमत आंकनी चाही पर सोनाबाई अपनी इस कला को बेचना नहीं चाहती, इसे वे व्यवसाय नहीं बनाना चाहती। न ही अपने बेटे- बहू को इसकी अनुमति देना चाहती। उनका कहना है जीवन चलाने लायक खेती बाड़ी है, ज्यादा लालच करना ठीक नहीं। 60 के करीब पंहुच रही सोनाबाई के हाथों में अब भी गजब की फूर्ति है और उनके हाथ अब भी उतनी ही तेजी से चलते हैं, जैसा अपना नया घर बनाते समय चलते थे।

रायपुर के बसंत जगार पर आने के लिए जब सोनाबाई के पास सूचना पंहुची तो समय बहुत कम था। सोनाबाई बताती हैं मैं तो आना ही नहीं चाहती थी, क्या करती आकर, मेरे पास यहां दिखाने के लिए मूर्तियां तैयार ही नहीं थी। मैंने तो पहले मना कर दिया पर साहब लोगों ने कहा कि जाना तो पड़ेगा ही, वहां तुम्हारी कला को नहीं तुम्हें देखेंगे। (यह सब बताते हुए सोनाबाई इस उम्र में भी शरमा जाती हैं) फिर क्या करती घर में जितनी कलाकृति थी सब उठाकर ले आई, कुछ तो दीवारों से उखाड़ कर लाईं हूं। इनमें रंग रोगन करने का समय भी नहीं मिला। मुझे तो इसे दिखाने में भी शर्म आती है। सोनाबाई की यह साफगोई सचमुच उसकी सादगी का प्रतीक है। बातचीत के दौरान सोनाबाई ने अपनी मीठी सरगुजिया बोली में मुझे आपने गांव आने का निमंंत्रण देते हुए कहा- कभू हमरो गांव कोती अइहौ न, हमला खुशी होइही।

सोनाबाई से जब मैंने कुछ प्रश्न पूछना शुरु किया तो वे बहुत ही नपे - तुले शब्दों में धीरे धीरे अपने मन की बात बताती चली गईं। उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश-

- कच्ची मिट्टी से तरह- तरह की मूर्तियां बनाना आपने कहां से सीखा?

00 कहीं से भी नहीं, बस कल्पना के आधार पर मैं यह सब बना लेती हूं।

- शुरुआत कहां से हुई ?

00 घर से ही। जब मैं बहुत छोटी थी तब हमारा घर बन रहा था, बस उसी समय घर बनाते- बनाते मन में कुछ विचार उपजा और दीवारों पर विभिन्न पशु- पक्षियों के आकार उकेरते चली गई। लोगों को यह पसंद आया तो मैंने इन सबसे अपने पूरे घर को सजा लिया। हर कमरे में कुछ न कुछ बना दिया। जानवर, पेड़ पौधे, पक्षी। जो मन करता बना लेती।

-मूर्तियां बनाने के लिए क्या कोई विशेष प्रकार की मिट्टी इस्तेमाल करती हैं?

00 हां काली और पीली ्मट्टी में धान का भूसा मिला कर मिट्टी सानना पड़ता है, इस मिश्रण को तीन दिन तक पानी में भिगोकर रखा जाता हैं फिर उसे अच्छी तरह कूटते हैं। ऐसा करने से मिट्टी की मूर्ति जब सूख जाती है तब भुरभुरी नहीं होती और जल्दी टूटती भी नहीं।

-आपने इनमें रंग भी लगाया है, रंग किस तरह का होता है?

00 मूर्ति तैयार होने के बाद सबसे पहले छुही( जिससे घरों में हम पुताई करते हैं) मिट्टी से रंगती हूं, फिर उस पर गेरू (पीली मिट्टी)और कभी- कभी नीला रंग भी लगाती हूं।

-यह जो तोता है उस पर तो आपने हरे रंग का प्रयोग किया है?

00 हां यह रंग सेम के पत्ते से बनाती हूं। आप शायद नहीं मानेंगी पर मैंने कभी बाजार से रंग नहीं खरीदा।

- फिर इतने प्रकार के रंग किससे बनाती है?

00 सब रंग बन जाते हैं। पत्तों से हरा रंग, नील से नीला, छुही से पीला, मटमैला और गेरू से गेरुआ, कोयले से काला, और क्या चाहिए इन्हें रंगने के लिए।

- हमें पता चला है कि आप अपनी कला की बिक्री नहीं करतीं?

00 हां आज तक अपनी कला को हमने नहीं बेचा हैऔर न ही बेचने का इरादा है। हम तो यह सब अपने घर को सजाने के लिए बनाते हैं।

-अब तो आपकी यह कला विदेशों तक पंहुच गई है दुनिया आपकी कला को सराह रही है, तो इसे व्यवसाय क्यों नहीं बना लेती?

00 हम कच्ची मिट्टी से मूर्तियां बनाते हैं, इससे यह कभी भी टूट सकती है। ऐसे में इनका क्या मोल करना। हम तो किसान हैं किसानी ही करेंगे और इसे कला के रूप में ही बनाते रहेंगे। मेरा बेटा भी इसी के पक्ष में है।

-इसे भट्टी में नहीं पका सकते क्या?

00 हमारा यह काम ही नहीं है। फिर इसमें भूसा होता है, पैरों में लकड़ी का उपयोग करते हैं , इसलिए इन्हें पकाया भी नहीं जा सकता।

-पर कला के कद्रदान तो इसे खरीद कर ले जाना चाहते हैं?

00 हां खरीदना तो सभी चाहते हैं पर हम सोचते हैं मान लो अभी पैसे में बेच दिए और वह घर ले जाते- जाते टूट गया तो ले जाने वाला क्या सोचेगा। यही सोचकर बेचना अच्छा नहीं लगता। कोई लेने की बहुत जिद ही करता है तो उसे ऐसे ही दे देते हैं। फिर वह जबरदस्ती कुछ पैसे पकड़ा भी जाता है, तब हम का करिबो।

-आप अपने घर में इस तरह की मूर्तियां और दीवरों पर जाली बनाती हैं, इसकी जानकारी भारत भवन को कैसे मिली?

00 एक दिन अचानक मेरे घर कुछ लोग आए, मुझसे बातचीत करने के बाद वे मेरी बनाई मूर्तियों को ले जाने की बात करने लगे। मैं एकदम रुंआसी सी हो गई, अपने हाथों से जन्में और बरसों से घर में पल रहे इन शिल्पों को अपने से कैसे अलग कर देती। उन लोगों ने मुझे काफी समझाया, कि वे इसे क्यों ले जा रहे हैं, तब कहीं मैं इन्हें देने को राजी हो पाई। फिर भी जब उन्होंने घर की दीवारों से मेरी बनाई चीजों को उखाड़ लिया तो घर बेजान सा उजड़ा- उजड़ा लगने लगा, घर की दीवारें किसी मां की उजड़ी गोद सी सूनी और उदास जान पड़ीं और इन सूनी दीवारों को देख मेरी आंखों में आंसू की धारा बह निकली, तब मेरे बेटे ने मुझे दिलासा दिया और मैंने भी सोचा कि इन दीवारों को अब फिर से नया बनाऊंगी।

मैंने नया बना भी लिया है। जब आप मेरे घर आएंगी तो मेरे घर की दीवारें सूनी नहीं दिखाई देंगी। लेकिन आज भी उस दिन की बात को याद करती हूं, तो सोचती हूं कि भले ही उस दिन मेरा मन बहुत रोया था पर यदि वे उस दिन नहीं आते तो मेरी कला तो अनजानी ही रह जाती, जिसे आज पूरी दुनिया देख और सराह रही है।

- राष्ट्रपति और तुलसी सम्मान पा कर कैसा अनुभव करती हैं?

00 अच्छा लगता है। नए नए लोगों से मिलना होता है लोग बहुत प्यार व सम्मान देते हैं।

- पुरस्कार में मिली राशि का क्या करेंगी?

00 अभी तो बैंक में जमा है। गांव में मकान बनाने की सोच रहे हैं। मकान बनाकर वहां कुछ अच्छी मूर्तियां बनाकर रखेंगे ताकि आने जाने वाले देखें।

- पर जिस प्रकार की मूर्तियां आप बनाती हैं वह तो मिट्टी के ही घर में बन सकती हैं तो क्या आप नया घर भी मिट्टी का ही बनाएंगी?

00 हां, मिट्टी का ही बनाएंगे। जीवन भर मिट्टी के घर में रहती आई हूं इसलिए नया घर भी मिट्टी का ही बनाऊंगी।

-क्या आप मू्र्तियां रोज बनाती हैं?

00 नहीं जब मन करता है तभी बनाती हूं।

- घर में और कोई है जो आपकी तरह मूर्तियां बनाता है। आप किसी और को अपना हूनर सीखा रहीं हैं?
00 मेरा एक बेटा है दरोगाराम, उसने तो मेरे साथ रहकर सब बनाना सीख लिया है, मेरी बहू भी बहुत अच्छी मूर्तियां बनाने लगी है, अब तो वे दोनों ही घर सजा लेते हैं।

- यदि कोई आपकी कला सीखना चाहे तो सिखाएंगी?
00 मैं तो तैयार हूं पर कोई सीखना चाहे तब न।

- आपकी इस कला को आने वाली पीढ़ी याद रखे यह तो चाहती ही होंगी?

00 बिल्कुल चाहती हूं मैं तो अपने बेटे से हमेशा यही कहती हूं खाओ पीओ मस्त रहो पर अपनी विद्या को मत छोड़ो, फिर कभी भी किसी चीज की कमी नहीं पड़ेगी।
-पिछले वर्ष आप अमेरिका गईं थी, कैसा लगा वहां, वहां के लोग वहां का रहन- सहन, खान- पान और वहां की जलवायु?

00 बहुत अच्छा लगा। वहां के लोगों ने बहुत प्यार दिया, खूब घूमाया मुझे। वहां हमारे देश जैसी गंदगी नहीं है। बहुत साफ- सफाई है। एक लकड़ी का टुकड़ा तक फेंकते नहीं वहां, सब कचरे के डब्बे में डालते हैं। पर वहां की लड़कियों को शरम नहीं हैं खुले बदन घूमती हैं। मुझे भी सिर मत ढकों कहती थीं, पर मैं तो बिना सिर ढापे शरम के मर ही जाऊं। मेरी चूडिय़ों को देखकर वे आश्चर्य करती थीं, कहती थीं इसे हाथ में कैसे पहना? एक ने तो इन चूडिय़ों की कीमत 500 रूपए लगा दिया और उसे मांगने भी लगी, पर मैं कैसे दे देती, अपने सुहाग चिन्ह को, उन्हें समझाती भी कैसे।

- वहां आपने क्या क्या देखा?

00 वहां मैंने बड़ी बड़ी मछलियों देखी हाथी के जितनी बड़ी। जब वापस आ रही थी तो सबने बिदाई के समय कुछ न कुछ भेंट दिया कुछ तो रोने भी लगे थे, हमारे इधर पठौनी में जैसे रोते हैं उसी तरह। बहुत प्यार सम्मान मिला वहां मुझेे।

-वहां आप अपने साथ कौन कौन सी कलाकृतियों को ले गई थीं?

00 कुछ भी नहीं ले जा पाई थी सब वहीं जाकर बनाया था।
- तो क्या अपने साथ मिट्टी भी ले गईं थी?

00 नहीं मिट्टी भी नहीं ले जाने दिया गया था। बीमारी फैल जाएगी कहकर। एक बोरी भूसी जरूर ले गए थे जिसे वहीं की मिट्टी में मिला कर कुछ मूर्तियां बनाईं थी, लेकिन वे उतनी अच्छी नहीं बन पाईं थी जैसी हमारे यहां की मिट्टी से बनती हैं। वहां पर मूर्तियां सूखने के बाद तडक़ जाती थीं।
- वहां के खाने को लेकर परेशानी हुई होगी?
00 हम तो वहां का खाना खा ही नहीं सकते थे अपने हाथ से खाना बनाते थे। चावल दाल सब्जी। मैं होटल का खाना नहीं खा सकती इसलिए यहां रायपुर में भी सामान मंगवा कर आपने हाथ से बना कर खा रही हूं।
- भविष्य की कोई योजना कुछ विशेष करने के बारे में सोचा है आपने?
मेरी तो अब उम्र हो गई है मुझे क्या सोचना अब तो जो कुछ करेंगे बच्चे ही करेंगे सबका प्यार और सम्मान पाकर मैं तो बहुत खुश हूं।
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2 Comments:

दीपक said...

अच्छा विवरण दिया आपने पढकर मन खुश हुआ !! बचपन के दिन याद आ गये जब अम अपने हाथ से मिट्टी की गणपति बना कर घर मे बिठाते थे !!

ushaathaley@blogspot said...

mere pas Sonabai ke ghar ke bahut se photo hain tatha anya jankari bhi hai, kya udanti ke liye bhejoo?

-Dr.Usha Vairagkar Athaley
Raigarh

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