कांगड़ा - सुगंधित ग्रीन टी
- प्रिया आनंद
- प्रिया आनंद
नीलगिरि, दार्जिलिंग और कांगड़ा वैली की चाय के बीच कांगड़ा ग्रीन टी दार्जिलिंग चाय के बाद दूसरे नंबर पर आती है। यह स्वाद और सुगंध दोनों के आधार पर विशिष्ट है।

इस चाय का इतिहास लगभग 160 साल पुराना है, जब अंग्रेज यहां आए तो यहां की जलवायु का अध्ययन करके उन्होंने पाया कि यह चाय के उत्पादन के बिल्कुल उपयुक्त है। उन्होंने यहां चाय के बागान लगवाने शुरु किए और उनके बेहतर प्रयासों से यह व्यवसाय फलने फूलने लगा। व्यवसाय नया था और फायदेमंद भी इसलिए स्थानीय लोगों ने भी इसमें रूचि ली। इस तरह कांगड़ा की हरी चाय का व्यापार लंदन और एम्सटर्डम तक पहुंच गया। अगर हम भारत की चाय का सम्मिलित आकलन करें तो नीलगिरि, दार्जिलिंग और कांगड़ा वैली की चाय के बीच कांगड़ा ग्रीन टी दार्जिलिंग चाय के बाद दूसरे नंबर पर आती है। यह स्वाद और सुगंध दोनों के आधार पर विशिष्ट है। अंग्रेजों के समय में इस चाय का उत्पादन जोरो पर था और इससे स्थानीय लोगों की भी अच्छी आय होने लगी थी। कांगड़ा में जब 1905 का भूकंप आया तो इसमें काफी जान-माल का नुकसान हुआ। बड़ी-बड़ी इमारतें किले और महल धाराशायी हो गए। अंग्रेज इस तबाही को देख कर डर गए तथा स्थानीय लोगों के हाथ औने-पौने दामों में चाय बागान बेच कर चले गए।
कहना न होगा कि यह हादसा कांगड़ा चाय पर काफी भारी पड़ा क्योंकि इसी के बाद कांगड़ा चाय के उत्पादन का ग्राफ गिरता चला गया। कांगड़ा चाय के व्यवसाय के पतन की रफ्तार अब भी जारी है तथा भरपूर प्रयासों के बाद भी इसे अब तक नहीं संभाला जा सका है। कारण कितने ही होंगे, पर उन्हें आसानी से विश्लेषित किया जा सकता है।

कांगड़ा में चाय की पहली फैक्टरी 1980 में लगी। पहले कुटीर उद्योग के तहत ही काम चलता रहा। लोग तब भी निजी व्यवसाय के आधार पर इस उद्योग में शामिल थे। इसके बाद बीड़, बैजनाथ और सिद्धबाड़ी में फैक्टरिया खुलीं। तब कुल छह फैक्टरियां थीं जिनमें चार को-आपरेटिव थी और दो निजी हाथों में चल रही थी। ये दोनों ही निजी फैक्टरियां ग्रीन टी बना रही थीं। कुछ समय तक तो यह सिलसिला चला, पर ग्रीन टी का मार्केट डाउन होते ही इन दोनों फैक्टरियों में भी ब्लैक टी बनाना शुरू कर दिया।
एक अंतराल ले कर बीड़, बैजनाथ और सिद्ध बाड़ी की फैक्टरियां बंद हो गई, साथ ही चाय के उत्पादन भी ढीले पड़ गए। जाहिर है जब उन्हें अपने उत्पाद का पैसा ही नहीं मिलता था तो यह काम क्यों करते...? अगर वे चाय का उत्पादन करते भी तो उसकी खपत कहां होनी थी? इसलिए स्थानीय चाय उत्पादक चाय का काम छोड़, आजीविका के दूसरे संसाधन तलाशने में लग गए। यही इस व्यवसाय के पतन की शुरुआत थी। चाय उत्पादकों ने अपने पुश्तैनी व्यवसाय से मुंह मोड़ा और उधर चाय की झाडिय़ों का पूरा जंगल खड़ा हो गया। कहना न होगा कि इसमें बदलते हुए सामाजिक परिवेश ने भी भूमिका निभाई। धीरे-धीरे परिवार एकल व्यवस्था की ओर मुड़े, संयुक्त परिवारों का चलन खत्म होता गया और साथ मिलकर काम की परंपरा भी समाप्त हो गई। कुटीर उद्योग के आधार पर जो हरी चाय का व्यवसाय लोगों के लिए किसी खजाने से कम नहीं था वह अब विघटन की कगार पर आ गया है। कांगड़ा ग्रीन टी के इस गिरते ग्राफ की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। इसके बावजूद कांगड़ा चाय का अस्तित्व बाजारों में बना रहा, इसे पसंद करने वाले खरीदते भी रहे और इसे इस्तेमाल भी करते रहे। हाल में कुछ निजी व्यवसायियों ने सिद्धबाड़ी और बैजनाथ की फैक्टरियों को लीज पर लिया है और इनमें काम भी शुरू हो गया है। यही नहीं, यहां से चाय एक्सपोर्ट भी हो रही है। आमतौर पर कांगड़ा ग्रीन टी की कीमत 320 रुपए प्रति किलो है जबकि एक्सपोर्ट क्वालिटी की चाय 3000 रुपए किलो बिकती है। प्रदेश के इस हसीन और मजबूत आर्थिक उत्पादन का ग्राफ क्यों गिरा, इसका सबसे पहला जवाब तो यही है कि इसकी पैकिंग का स्वरूप ही निर्धारित नहीं है। हिमाचल की इस चाय की पैकिंग अलग-अलग तरह की है इसलिए यह निर्धारित करने में बेहद मुश्किल होती है कि हम किस क्वालिटी या ब्रांड की चाय खरीद रहे हैं। गौरतलब है कि एक्सपोर्ट क्वालिटी की चाय ज्यादातर पर्यटकों के द्वारा ही खरीदी जाती है। इससे पहले मोनाल चिडिय़ा वाले कार्टन के पैक में चाय अधिक पसंद की जाती थी, अब उसकी जगह साधारण पैकिंग्स ने ले ली है। आप इसे अनाकर्षक पैकिंग भी कह सकते हैं, देखकर यही अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है कि यह कांगड़ा चाय होगी। दरअसल सच तो यह है कि हम अपनी चीजों की कीमत ही नहीं जानते, फिर अगर बेहतरीन कांगड़ा टी सिर्फ देसी चाय बन कर रह जाए तो क्या आश्चर्य?

यह कांगड़ा चाय का दुर्भाग्य है कि दार्जिलिंग के बाद दूसरे नबंर होने के बावजूद इस चाय को वह अहमियत नहीं मिली जो इसे मिलनी चाहिए। इस उत्कृष्ट चाय का उत्पाद जो गिरा तो संभलने में ही नहीं आया। यहां की टी बोर्ड सभी सुविधाएं बागबानों को देने को तैयार है और देता भी है, पर उसका कोई सुखद परिणाम नजर नहीं आ रहा। टी प्लांटर्स के लिए 25 प्रतिशत सबसिडी का प्रावधान है, यह सबसिडी अलग-अलग कामों के लिए दी जाती है। हां यह जरुर है कि एक बार सबसिडी देने के बाद 20 सालों तक नहीं दी जाती। चाय के बागों की बात करें तो इस समय कुल 25 हेक्टेयर जमीन इस के लिए बची है जिसमें भी 53 प्रतिशत पर ही काम चल रहा है। गौरतलब है कि इसका हालिया सर्वे भी नहीं हुआ कि इसकी हालत सुधारने के बारे में कुछ सोचा जा सके।
बागबानों को यह सबसिडी रीजुविनिएशन और रीप्लाटेंशन के लिए दी जाती है। रीजुविनिएशन में चाय की झाड़ी की छंटाई जमीन से होती है और इसकी सबसिडी की राशि 16 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर है जबकि रीप्लाटेंशन में पूरी झाड़ी उखाड़कर नया पौधा लगाया जाता है। रीप्लाटेंशन के लिए मिलने वाली सबसिडी की राशि 62 हजार प्रति हेक्टेयर है।

इधर चाय उत्पादक संघ ने यह तय किया है कि कांगड़ा चाय का एक प्रतीक चिन्ह होना ही चाहिए, ताकि कांगड़ा वैली चाय को किसी और नाम से न बेचा जा सके। अगर ऐसा हो जाता है तो बागवान इस चाय की मांग को व्यवस्थित तरीके से तैयार कर सकेंगे और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। ऐसा जी आई सी की मान्यता मिलने से हुआ है। संभवत: कांगड़ा चाय के संदर्भ में इसे सकारात्मक माना जाना चाहिए।
सुनने में यह भी आया है कि अमरटेक्स अपने सभी शोरुमों में यह चाय बेचने की योजना बना रहा है जहां इसे कांगड़ा चाय के नाम से ही बेचा जाएगा। कहना न होगा कि यह एक अच्छी खबर है और इससे इस चाय को नवजीवन मिलेगा। अगर हिमाचल सरकार सचमुच आर्थिकी का एक मजबूत संसाधन विकसित करना चाहती है तो उसे इस तरफ पूरा ध्यान देना होगा साथ ही बागबानों को भी उत्साहित करना होगा। कांगड़ा चाय, हिमाचल की खूबसूरत पहचान है इस पहचान को बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है।
संपर्क: दिव्य हिमाचल, पुराना मटौर कार्यालय, कांगड़ा पठानकोट मार्ग, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)176001 फोन नं. 09816164058
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