June 12, 2009

फूलों और तितलियों के संग बतियाते

फूलों और तितलियों के संग बतियाते
-अनिल खोब्रागड़े
उदंती.com के इस अंक में किसी एक कलाकार को प्रस्तुत करने की श्रृंखला में इस बार हमने अनिल खोब्रागड़े के चित्रों को विभिन्न पन्नों पर प्रकाशित किया है। अनिल के चित्रों में एक ओर जहां क्षेत्रीय संस्कृति की छाप हैं वहीं वे प्रकृति के रंगों को चुरा कर वर्तमान में रंग भरने का खूबसूरत प्रयास करते हैं। रंग बिरंगे फूल और तितली के साथ उन्होंने बस्तर के जीवन को रेखाओं में उतारा है।
बैलाडीला में स्कूली शिक्षा प्राप्त अनिल खोब्रागड़े को पेंटिंग में रुचि बचपन में अपने दोस्त की बहन को कढ़ाई बुनाई करते देख कर हुई। अनिल कहते हैं रंग बिरंगे धागों से उनकी कढ़ाई को देखकर मैंने भी एक ग्रीटिंग कार्ड बनाया। संयोग देखिए दोस्त की उस बहन की शादी एक आर्टिस्ट जितेन्द्र साहू से हो गइ, जब उन्हें मेरी रुचि के बारे में पता चला तो उन्होंने मुझे खैरागढ़ में इसकी शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया।  मैं पहले तो इस क्षेत्र को समझ नहीं पाया फिर धीरे-धीरे मेरे सीनियर्स व गुरुओं के प्रोत्साहन से काम करने लगा।
चूंकि मेरा जन्म बस्तर में हुआ है तो मैंने पहले बस्तर की संस्कृति को अपनी पेटिंग्स में तराशा।  जैसे बस्तर के आदिवासी किस तरह जंगल में मशरूम चुनते हैं, किस तरह गोदना गुदाते हैं।  इसी तरह सल्फी जो बस्तर के जीवन  का अनिवार्य अंग है, को चित्रित किया। मैंने अपनी पेटिंग में इमेजिनेशन को अधिक महत्व दिया।
 बाद में मैंने महसूस किया कि आदिवसियों के जीवन में बदलाव आने लगा  है। उनपर आधुनिकता का असर तो हुआ पर वे पूरी तरह उसे अपना नहीं पाए- जैसे वे चप्पल तो जान गये पर उसे वे पहन नहीं पाए। उनके पास चप्पल  तो होता है पर जब वे हाट से घर की ओर लौटते हैं तो उनका चप्पल पैरों में नहीं डंडे में लटका होता है। इस तरह के दृश्यों को भी मैंने अपने चित्रों में उतारने की कोशिश की।
मैंने पिछले कुछ वर्षों में देखा कि आदिवासी पहले खुश व संतुष्ट होकर अपना जीवन जीते थे पर अब विकास के नाम पर वह दुखित हो गया है। उनके जीवन में आए इस बदलाव पर भी मैंने काम किया है।
बस्तर के जीवन को अपना विषय बनाने के साथ अनिल ने  बच्चों के मूड पर काम किया  है। नेहरू आर्ट गैलरी में बच्चों के विभिन्न मूड वाली उनकी पेटिंग्स अवार्ड के लिए चुनी गई थी। इसके बाद उन्होंने तितली और फिर फूलों के सीरीज पर काम किया।
चित्र प्रदर्शनी के कुछ अनुभव सुनाते हुए अनिल ने बनारस के अस्सी घाट में लगाए गये एक ओपन एक्जीबिशन को अपने जीवन की  शानदार प्रस्तुतियों में से एक बताया, इस प्रदर्शनी में  हम सीधे जनता के साथ रुबरु थे। इस प्रदर्शनी के लिए कला कम्यून संस्था ने हमें आमंत्रित किया था।  अस्सी घाट की उस चित्र प्रदर्शनी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। घाट में तो हमारी पेंटिंग्स प्रदर्शित थी ही हमने बांस व लकड़ी के सहारे नदी में भी अपनी पेंटिंग का प्रदर्शन किया था जो अद्भुत था। अनिल ने कविता पोस्टर भी किया है। भिलाई, खैरागढ़ आदि कई स्थानों में  भी अनिल की कई प्रदर्शनी लग चुकी हैं।
ठंड, बाजार, बारिश और ओस पर भी अनिल ने बेहतरीन काम किया है। लेकिन अनिल ने गत वर्ष  फूलों को लेकर जो श्रृंखला बनाई है वह उनके किए गए पूर्व के कार्यों से कुछ हट कर है। अपने फ्लावर सीरीज के बारे में अनिल का कहना है कि - मैंने महसूस किया कि हम सब फूल के बाहरी स्वरुप को ही देखते हैं पर मैंने सोचा कि इन फूलों के साथ यदि उन्हें जीवन देने वाले पानी के साथ मिला दिया जाए तो उस फूल का क्या रूप होगा, यही कल्पना करके मैंने इस सीरीज को शुरु किया। मेरे इन चित्रों में फूल और पानी का समावेश नजर आता है। फूल श्रृंखला के अंतर्गत  अनिल ने  200-300 के लगभग पेंटिंग बनाई है। 2008 में ललित कला आर्ट एकेडमी दिल्ली ने पहली बार इस सीरीज को प्रदर्शित किया।
पेटिंग बिकती है पर संतुष्टि नहीं आर्ट का मार्केट स्ट्रगल का काम है कर्मिशियल मार्केट में आर्टिस्ट को उतना नहीं मिल पाता। हमें प्लेटफार्म नहीं मिलता। यह सीरीज मैंने इतना कर लिया कि अब बंद कर दिया।
अपनी आगे की योजना के बारे में अनिल का कहना है कि वे फूलों पर ही आगे भी काम करना चाहते हैं मैं फूलों को हर मौसम में जैसे बारिश में, ठंड में, धूप में उसकी भावनाओं को व्यक्त करना चाहता हूं। मेरे मन में फूलों को लेकर एक विचार- मंथन चल रहा कि  हम फूलों को तभी देख कर खुश होते हैं जब तक वह खिलता है, लेकिन मुरझाते ही उसकी उपेक्षा कर देते हैं अत: मैं सोच रहा हूं कि फूल के उस अनुभव को अपने चित्रों में उतारने की कोशिश करुंगा। (उदंती फीचर्स)
अनिल खोब्रागड़े
जन्म- 5 जुलाई 1978 में बस्तर छत्तीसगढ़ में शिक्षा- बीएफए, एमएफए (पेटिंग) इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ (छ.ग.)। भिलाई, खैरागढ़, भोपाल, मुजफ्फरनगर, मुम्बई व दिल्ली में कई चित्र प्रदर्शनी। साथी समाज सेवी संस्था कोंडागांव द्वारा आयोजित आर्टिस्ट कैंप में भागीदारी। वाराणासी, जगदलपुर, मलाजखंड (मप्र) खैरागढ़ ओपन एक्जीबिशन। पता- c/o श्री एम आर खोब्रागड़े, क्वाटर नं. टी/सी-188, पोस्ट- किरंदुल, जिला दंतेवाड़ा (बस्तर) छत्तीसगढ़ - 494556 मोबाइल- 09926469545.

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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