Saturday, June 13, 2009

पारिवारिक संबंधों में जहर

आज यह लिखते हुए मेरी कलम कांप रही है, थरथरा रही है धरती पर तो भूकंप नहीं आया है परंतु फिर भी तनमन में तो भूकंप जैसी ही उथल-पथल हो रही है। कारण है समाज की सबसे पवित्र इकाई परिवार में घिनौने प्रदूषण का प्रकोप जो महामारी का रुप लेता दिख रहा है। परिवार, जिसका पवित्रतम अंग है माता- पिता का संतान से ममता और वात्सल्य का कल्याणकारी संबंध जिसके बलबूते पर एक पूर्णतया निरीह और असहाय शिशु के रुप में जन्मा प्राणी पनप कर मानव बनता है। इसी कारण से किसी भी बच्चे के लिए सबसे विश्वसनीय लोग उसके माता- पिता ही होते हैं।  जहां तक हमारी सभ्यता और संस्कृति की बात है तो माता- पिता द्वारा पुत्रियों को पुत्रों की तुलना में कुछ अधिक ही महत्व दिया जाता है। क्योंकि पुत्री को एक दिन वधू बनकर माता- पिता का घर छोडऩा पड़ता है।

इस परिप्रेक्ष्य में यहां यह उल्लेख करना समीचीन होगा कि कुछ माह पहले योरप से समाचार आया कि आस्ट्रिया में एक व्यक्ति जोसेफ फ्रिट्जल पुलिस द्वारा इसलिए गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह अपनी पुत्री को पिछले 24 वर्षों से अपने घर के तहखाने में कैद रखकर उसके साथ बलात्कार करता रहा था जिसके फलस्वरुप उसकी पुत्री ने सात बच्चों को जन्म दिया था। इस घिनौने समाचार ने संसार भर में तहलका मचा दिया और इस दानवी बाप के लिए पूरे मानव समुदाय ने कठोरतम दण्ड की मांग की। अदालत ने भी इस दानवी बाप को आजीवन कारावास का दण्ड दे दिया है। इसके बाद इटली से भी एक कुकर्मी पिता का समाचार आया जिसने अपनी पुत्री को 25 वर्ष तक बंधक बनाकर बलात्कार किया और 8 बच्चों को जन्म दिया। इसके बाद कोलम्बिया (दक्षिणी अमेरिका) से भी एक पिता द्वारा पुत्री से कई वर्षों तक बलात्कार किए जाने का समाचार आया है।

इन समाचारों ने यह सोचने पर बाध्य किया कि द्वितीय विश्वयुृद्ध के बाद पश्चिमी दुनिया में ऐसे विनाशकारी बदलाव हुए कि जाने-परखे कल्याणकारी सामाजिक मूल्य और नैतिकता लुप्त हो गए जिससे वहां पारिवारिक संबंधों का ताना- बना भी जीर्ण- शीर्ण हो गया। स्वच्छंदता, उद्दंडता, अनाचार, अंग प्रदर्शन, नशाखोरी अविवाहित मातृत्व और विवाह की संस्था का अवमूल्यन पश्चिमी जगत में समाज स्वीकृत आचरण बन गए। थोड़े शब्दों में कहें तो जो कुछ भी समाज को हजारों वर्षों से अनुशासित, संयमित और सभ्य बनाये हुए था उसे दकियानूसी वर्जनाओं की बेडिय़ां बताते हुए उनसे मुक्ति के नाम पर उपरोक्त स्वच्छन्दता और अनाचार को आधुनिक प्रगतिशीलता का द्योतक बना दिया गया। ज्ञात हो कि फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल में वयस्क पुत्री या बहन के साथ यौन संबंध अपराध की श्रेणी में नहीं आते !!!

यह तो हुई विदेशों की बात लेकिन पिछले महीनों में मुम्बई, थाणे, नागपुर और अमृतसर से जिस प्रकार के  समाचार आये हैं उससे लगता है कि पश्चिमी दुनिया से फैल कर यह जहर भारतीय परिवारों की जड़ों को भी संक्रमित करने लगा है। मुंबई की एक 21 वर्षीया युवती ने पुलिस में यह शर्मनाक रिपोर्ट दर्ज कराई कि उसके व्यापारी पिता और दुष्ट तांत्रिक उसके साथ पिछले 9 वर्षों से लगातार बलात्कार करते रहे हैं। हाल में जब उसके पिता और दुष्ट तांत्रिक उसकी 15 वर्षीया छोटी बहन के साथ भी यह घिनौना कुकृत्य करने लगे तब मामला इस युवती की बर्दाश्त के बाहर हो गया। ताज्जुब तो यह है कि इस कुकृत्य में इन युवतियों की मां भी अपने पति और तांत्रिक से सहयोग कर रही थी। इसके अगले ही हफ्ते अमृतसर की एक 21 वर्षीया युवती ने भी मुंबई की उक्त युवती के साहस से प्रोत्साहित होकर रिपोर्ट लिखाई कि उसका पिता जो एक समृद्ध व्यापारी हंै, उसके साथ पिछले सात वर्षों से बलात्कार करता रहा है। ये दोनों ही परिवार बड़े नगरों में समृद्ध और शिक्षित वर्ग से आते हैं। स्पष्ट है कि इन दोनों परिवारों के कर्ता- धर्ताओं द्वारा भारतीय सभ्यता की उत्कृष्ट परंपराओं से उपजे सामाजिक मूल्यों को जीर्ण- शीर्ण वस्त्रों की भांति त्याग दिया गया था।

जैसा कि अनेक समाज शास्त्री और मानव व्यवहार विज्ञान के विशेषज्ञ कहते हैं कि 1990 के बाद से 24 घंटे टेलीविजन के माध्यम से हमारे देश में पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति की जो आंधी चल रही है उसने हमारे परिवारों को दिगभ्रमित कर हमें अपने पारंपरिक मूल्यों से विमुख कर दिया है। सीरियलों में भी विवाहेतर संबंधों और अविवाहित मातृत्व को आधुनिक भारतीय परिवारों में सहज आचरण के रुप में दिखाया जाता है। स्पष्ट है कि जहां ऐसा मनोरंजन (?)  दिन रात परोसा जाता हो वहां स्वाभाविक ही है कि परिवार के सदस्यों के मन में विकृतियां उपजती हैं। वैश्विकता (ग्लोबलाईजेशन) से प्रेरित आर्थिक उदारीकरण में गरीबी से ग्रसित हमारी बड़ी आबादी के उद्धार के सुनहरे सपने तो आर्थिक मन्दी के अंधे कुएं में लुप्त हो गए और गरीबी जहां की तहां रही, ऊपर से खाद्य पदार्थों की मंहगाई ने जिंदगी को और मुश्किल बना दिया। परंतु इससे भी बड़ी जो हानि हुई वह है हमारी सभ्यता और संस्कृति में फैलता जहरीला संक्रमण।

भारतीय परिवार में रक्त संबंधियों के बीच यौन संबंध प्राचीन काल से जघन्यतम और अक्षम्य अपराध की श्रेणी में रखे गए हैं। कहा भी गया है कि -
अनुज वघू भगिनी सुतनारी। सुन शठ कन्या सम ये चारी।
इनहिं कुदृष्टि बिलौके जोई। ताहि बधे कछु पाप न होई। 
हमारा समाज आज भी उपरोक्त विधान का निष्ठापूर्वक पालन करता है। यही कारण है कि जिसने भी मुंबई और अमृतसर से आए उपरोक्त समाचारों को सुना उसने इसे अत्यंत जघन्य घृणित अपराध कहते हुए अपराधी माता- पिता को कड़े दण्ड की मांग की है। यद्यपि यह यथार्थ है कि इस तरह के नैतिक रुप से पूर्णतया पतित माता- पिता हमारे भारतीय समाज में अपवाद स्वरुप ही हैं परंतु हमारे समाज को इतना शर्मनाक अपराध एक अपवाद के रुप में भी स्वीकार्य नहीं है।

फिलहाल यह भी सत्य है कि हमारे देश में इस प्रकार के अपराध को भी अन्य बलात्कारों की श्रेणी में ही रखा जाता है अत: आवश्यकता है कि केन्द्रीय कानून मंत्रालय सगे- संबंधियों के बीच होने वाले बलात्कार को जघन्यतम अपराध की श्रेणी में रखने के लिए तुरंत कानून बनाए और कठोरतम से कठोरतम दण्ड का प्रावधान करें। साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जहां पश्चिमी समाज पारंपरिक सामाजिक मूल्यों को बेडिय़ां मान कर तोड़ रहा है वहीं हमारा समाज पारंपरिक सामाजिक मूल्यों को ऐसे घुंघरु मानता है जिनसे समाज में कल्याणकारी संगीत प्रस्फुटित होता है। अत: समय की मांग है कि पारिवारिक संबंधों को पवित्र, प्रगाढ़ और अक्षुण्ण बनाए रखने वाले हमारे पारंपरिक सामाजिक मूल्यों को सभी शिक्षण संस्थाओं में अनिवार्य विषय बनाया जाए। ताकि माता- पिता अपवाद रुप में भी अपने पवित्र कर्तव्य से विमुख न हों। हमारी परंपरा में तो ईश्वर को माता- पिता के रुप में देखा जाता है। तभी तो ईश्वर वंदना में कहा जाता है कि-  त्वमेव माता, च पिता त्वमेव। 

हमारी भारतीय परंपरा यह कहती है कि माता- पिता का चरित्र इतना उज्ज्वल हो कि वह संतान के लिए अनुकरणीय आदर्श बने।
 - रत्ना वर्मा

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