December 10, 2014

अनकही

बाधाओं को पार करते हुए
- डॉ. रत्ना वर्मा
उदंती के प्रकाशन की रुपरेखा जब बन रही थी तब पत्रिका की विषयवस्तु के बारे में मैंने बहुत लम्बी चौड़ी रुपरेखा नहीं बनाई थी और न ही कुछ वादा किया था, कम शब्दों में इतना ही कहा था कि-  पत्रिका मानव और समाज को समझने की एक सीधी सच्ची कोशिश होगी।  पत्रिका में समाज के विभिन्न मुद्दों जिनमें राजनीतिक, सामाजिक, औद्योगिक एवं आर्थिक विषयों से संबंधित सम- सामयिक आलेखों का समावेश तो होता ही रहा है साथ ही भारत की संस्कृति, परंपरा, लोककला, पर्यटन एवं पर्यावरण जैसे विभिन्न विषयों को भी प्रमुखता से शामिल किया जाता रहा है।
आरंभ के अंकों में इसमें साहित्य की सभी विधाओं को शामिल नहीं किया गया था। कविता, गीत, ग़ज़ल, लघुकथाएँ, व्यंग्य के साथ कहानी को भी उदंती का हिस्सा बना लिया गया। उदंती के प्रत्येक अंक पर पाठकों की प्रतिक्रिया और रचनाकारों से मिलने वाले सुझाव और सलाह पर समय -समय पर पत्रिका की विषयवस्तु में बदलाव किए जाते रहे हैं।
कालजयी कहानियों का प्रकाशन ही कुछ इसी तरह के सलाह व सुझाव के बाद आरंभ हुआ। फिर बाद में और भी विभिन्न विषयों पर अनेक स्तंभों की शुरूआत हुई। जैसे 21 वी सदी के व्यंग्यकार, प्रेरक कथा, यादगार कहानियाँ,  मिसाल, मुझे भी आता है गुस्सा, आदि... धीरे धीरे विभिन्न विषयों पर  विशेषांक भी निकलने लगे जिनमें दीपावली, होली, नवरात्रि, जैसे पर्व त्योहारों के अलावा पर्यावरण, पर्यटन, प्रदूषण जैसे सामाजिक जनजागरण और जनजीवन से जुड़े मुद्दे।
पिछले कुछ माह से कुछ विशेषांकों की तैयारी की चर्चा के दौरान यह भी तय किया गया कि क्यों न उदंती में अब तक प्रकाशित कुछ विशेष विषयों को एक ही अंक में संग्रहीत कर लिया जाए। इसी सोच के तहत कालजयी कहानियों का यह विशेष अंक आपके हाथों में है। उदंती में अब तक प्रकाशित महान रचनाकारों की कुछ यादगार कहानियों को एक ही अंक में पिरोने का हमारा यह प्रयास आपको अवश्य पसंद आएगा।
आर्थिक व्यवधान और अन्य कई कारणों से उदंती का नियमित प्रकाशन इधर कुछ माह से नहीं हो पा रहा था। उदंती के पाठकों के लगातार मिल रहे पत्र इस बात के गवाह हैं कि उन्हें उदंती की प्रतीक्षा रहती है। उम्मीद तो यही है कि अब इसके प्रकाशन में आने वाली बाधाएँ दूर होंगी और हम अपने पाठकों तक नियमित इसके अंक पँहुचा पाएँगे।
विश्वास है हमेशा की तरह आप सबका सहयोग और प्रोत्साहन मिलता रहेगा।

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लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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