October 05, 2020

क्षणिकाएँः ज़िन्दगी आड़ी तिरछी सी लकीरें...

- प्रियंका गुप्ता
1
आदमी
जब भी कभी
चोला उतारता
इंसानियत का
जानवर बन जाता ।
2
जो सदा
दम भरते थे दोस्ती का
वक़्त पड़ा तो
मुँह फेरकर चल दिए ।
3
यादें
कभी यूँ भी होती हैं
मानो ,
किसी सर्द रात में
बर्फ़ हो रहे बदन पर
कोई चुपके से
एक गर्म लिहाफ़ ओढ़ा जाए ।
4
यादें
कभी दर्द होती हैं
और कभी
किसी ताज़ा घाव पर
रखा कोई ठंडा मरहम ।
5
यादें
मानो,
कभी जल्दबाज़ी में
सर्र से छूटती कोई ट्रेन
भागकर पकड़ो
वरना फिर
जाने कब पकड़ पाएँ ?
6
यादें-
कभी सर्दी में
बदन पर पड़ा बर्फ़ीला पानी;
या फिर
किसी हड़बड़ी में
जल गई  उँगली पर
उगा एक फफोला;
तकलीफ तो होती है-
है न ?
7
हम जीवन भर
जलते रहे जिनके लिए
लट्टुओं की रोशनी में
वही
मौका पड़ा तो
दिए बुझा चल दिए ।
8
जब से छिनी
होंठों से हँसी
मन से खुशी
ज़िन्दगी
जल बिन मछली बनी ।
9
फुदकती धूप
जाने कब
गोद में आ बैठी
दुलराया कित्ते प्यार से
ज़रा-सी आँख लगी
और ये जा, वो जा;
चंचल खरगोश कब एक जगह टिके हैं भला...?
10
ज़िन्दगी
कभी बेरंग से कैनवास पर  खिंची
कुछ आड़ी-तिरछी सी लकीरें
ऐसी कि
रंग भरना भी चाहो
तो भरा न जा सके ।
11
ज़िन्दगी
कभी एक खुली किताब
हर कोई पढ़े
या फिर कभी
कोने में पड़ी / धूल खाती
दीमक लगी
झरझराए से पन्ने
जो पढ़े न जा सकें ।
12
ज़िन्दगी
कभी एक पहेली सी
अनसुलझे सवालों की
एक लड़ी सी...।
13
ज़िन्दगी
पता नहीं क्या...
अलग सी
मेरे लिए / तुम्हारे लिए ।
14
ज़िन्दगी
शायद एक साया / या परछाई
वक़्त पड़ने पर
दग़ा दे जाए ।

2 Comments:

प्रीति अग्रवाल said...

बहुत सुंदर रचनाएँ प्रियंका जी, विशेषतः..ज़िन्दगी पता नहीं क्या...यादें कभी यूँ भी होती हैं....आपको मेरी ओर से बधाई!

विजय जोशी said...

बहुत सुंदर. बधाई

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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