January 15, 2019

यात्रा संस्मरण

अद्भुत शिल्प का शहर 
महाबलीपुरम्
- भावना सक्सैना
जीवन की अमूल्य निधि है स्मृतियाँ। कभी कभी बरसों पहले का पढ़ा हुआ स्मृति-पटल पर कुछ इस तरह अंकित हो रहता है कि वह सतत एक पथ की ओर धकेलता रहता है।बरसों पहले किसी कक्षा में महाबलीपुरम् की पृष्ठभूमि पर आधारित एक कहानी पढ़ी थी, कौन सी पुस्तक में कहाँ, किस संदर्भ में, यह याद नहीं लेकिन स्मृति में अंकित हो गया था शैल प्रस्तरों से बना एक मंदिर और विस्तृत प्रांगण।  कहानी का शिल्पकार और नर्तकी किस लेखक की कल्पना थे यह आज तक नहीं याद आया लेकिन समुद्र तट पर बने उस अद्वितीय मंदिर और प्रांगण को देखने की तीव्र उत्कंठा समाप्त हुई लगभग एक बरस पहले।
संयोग शायद इसे ही कहते हैं कि योजना थी चेन्नै से अंडमान-निकोबार द्वीप समूह जाने की लेकिन कुछ कारणों से पूरी नहीं हो पाई तो चेन्नै से महाबलीपुरम् जाने का निश्चय किया। लगा बरसों पुरानी साध पूरी होने को है।
तमिलनाडु की राजधानीचेन्नै से लगभग 60 किलोमीटर  दूर बंगाल की खाड़ी में स्थित है महाबलीपुरम्।60किलोमीटर की यह यात्रा टैक्सी से की।तमिल ड्राइवर हमारी बात समझ तो बखूबी रहा था लेकिन अपनी बात तमिल  में ही बोल रहा था और आगे की सीट पर बैठे मेरे पति बिलकुल इस अंदाज़ में प्रतिक्रिया दे रहे थे कि उन्हें सारी बात समझआ रही हो।(बाद में जब उनसे पूछा कि आप कैसे समझ रहे थे तो उनका उत्तर मुझे निरुत्तर कर गया, उनका कहना था कि बात न समझो पर सामने वाले का यह अहसास अवश्य कराओ कि वह कुछ महत्त्व का कह रहा है)। अचानक टैक्सी के बोनेट से निकलते धुएँ को देखकर हम सब के होश उड़ गए। ….. कार को किनारे की ओर  रुकवाकर हम सब नीचे उतरे।  टैक्सी ड्राइवर ने बताया की इंजन गर्म हो गया है क्योंकि उसमें  कूलेंट  कम है।  अभी पानी डालकर काम चला लेते हैं, पहुँचने तक काम चल जाएगा।  आसपास  तो कोई गैराजथा और न ही पानी का स्रोत तो जितनी  बिसलरी की बोतलें थी सब ड्राइवर के सुपुर्द कर दी गई। पानी डालने के बाद धड़कनों को थामे शेष यात्रा निर्विघ्न पूरी हुई। दोनों ओर लगे नारियल व ताड़ के पेड़ोंके बीच शांत सड़क से होते हुए हम पहुँच गए भारत के ऐतिहासिक नगरमहाबलीपुरम् जिसे 'मामल्लपुरम्' के नाम से भी जाना जाता है। तमिलनाडु के कांचीपुरम् जिले में स्थित इस मंदिरों के शहर में पहुँचते ही मनअद्भुत रोमांच से भर उठा ।
होटल में चेक-इन करके दोपहर का भोजन किया और फिरथोड़ा विश्राम करने के बाद  होटल से करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित शोर टेंपल  देखने चल पड़े। होटल के रिसेप्शन पर रास्ता पूछकर छोटे से बाजार से होते हुए हम पैदल ही जा पहुँचे अपने गंतव्य पर। शोर टेंपल का अप्रतिम सौंदर्य दूर से ही आकर्षित कर रहा था, गेट पर पहुँचने पर मालूम हुआ कि मंदिर परिसर में प्रवेश बंद हो चुका था लेकिन सांझ के ढलते सूरज के रंगों में नहाए आसमान में ऊँचा उठता शोर टेंपल एक अनुपम दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। मंदिर के पीछे  फैले अपार सागर से बह कर आती शीतल वायु और सागर की लहरों के शिलाओं से टकराने का स्वरमंत्रमुग्ध कर रहा था।कुछ देर तक दूर से ही इस अकल्पनीय सौंदर्य  का  आनंद लेकर, मंदिर परिसर के साथ से होकर पीछे जाते रास्ते से समुद्र तट पर पहुँचे।सुरमई संध्या के आंचल मेंढलते सूर्य की  सुनहरी चंचल रश्मियाँ मानो अपनी ही काव्य रचनाएँ रच रही थी। लहरें उनपर थिरकते रंगों से होड़ कर रही थीं। लहरें समा लेना चाहती थी हर रंग को अपने भीतर और रंग लहरों पर सवारी करना चाहते थे।अनुपम अलौकिक दृश्य अंतस्तल में उतरता जा रहा था।
अंधेरा होते-होते तट से वापसी के रास्ते पर अच्छा खासा मेला सा लग गया था। गुब्बारे वाले, घोड़े व ऊँट की सवारी कराने वाले, स्थानीय व्यंजनों की छोटी-छोटी दुकाने और कुछ आगे निकलकर स्थायी सी बनी दुकानें थी जिनमें स्थानीय कलाकृतियाँ, शिल्प और बच्चों को आकर्षित करने के  भाँति-भाँति के खेल---खिलौने सुसज्जित थे। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए आवाज़ लगाते दुकानदारों की ध्वनि अपनी ओर खींच रहीं थी, एक दुकान पर रुककर शंख व सीपियों से बनी कुछ वस्तुएँ खरीदी और वापस पहुँच गए अपने विश्राम-स्थल।
अगली सुबह  सूर्योदय के साथ ही शोर टेंपल के दर्शन करने का प्रलोभन प्रातः ही सम्मोहन में बाँध पुनः शोर टेंपल के प्रांगण में ले गया।  इसकी दिशा पूर्व की ओर कुछ यूँ है कि  सूर्य की पहली किरणें पड़ती हैं इस मंदिर पर। सूर्य की किरणों के साथ समुद्र इसे साष्टांग प्रणाम करता मालूम हुआ। यह मंदिर पल्लव कला का आखिरी साक्ष्य है। इसका निर्माण 700 से 728 ई.पू. तक हुआ था। बंगाल की खाड़ी के तट पर होने के कारण ही इसे शोर टेंपल के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिरसात मंदिरों के समूहमें से एक था जिनमें से अब सिर्फ यह एक ही बाकी है, शेष छह समुद्र में विलीन हो चुके हैं। दंतकथाओं के अनुसार इन सात मंदिरों का वास्तुकला सौंदर्य अनुपम था। ऐसा कि देवता भी  ईर्ष्या कर उठे और इसी कारण बाकी के छः  मंदिर तूफान व बाढ़ से समुद्र में डूब गए।
मंदिर में स्थापित भगवान शिव के शिवलिंग के दर्शन कर असीम शांति का अनुभव हुआ, यहीं एक मंदिर भगवान विष्‍णु को समर्पित है जिसमें शेषशायी विष्णु की प्रतिमा है। इसी मंदिर परिसर में देवी दुर्गा का भी छोटा सा मंदिर है जिसमें उनकी मूर्ति के साथ एक शेर की मूर्ति भी बनी हुई है। सभी के दर्शन कर हम बाहर बनी पत्थर की सीढ़ियों पर बैठ गए। काले ग्रेनाइट से बने इस मंदिर की बहुत सी शिल्प व शैल आकृतियों का रेत कणों और, समुद्री हवा से क्षरणहुआ है फिर भी इस संरचनात्‍मक मंदिर को यूनेस्‍को ने विश्‍व विरासत का दर्जा दिया है। यह भारत के सबसे प्राचीन प्रस्तर मंदिरों में से एक है।
मंदिर के शिखर पर पहुँच चुका सूर्य  संपूर्ण परिसर पर अपनी आभा बिखेर रहा था और सामने फैले प्रांगण में नंदी की कतार सम्मोहित कर रही थी। उन कलाकृतियों में ईश्वर, मानव और पशु निर्बाध रुप से एक होते प्रतीत हो रहे थे, जैसे कि सब मिलकर जीवन की एकात्मकता का प्रतीक बन रहे हों। ऐसी असीम शांति कि वहाँ से उठने को दिल ही न करता था। आँखों के सामने बचपन की कहानी में पढ़ी नृत्यांगना अपने नृत्य से सम्मोहित  कर रही थी और एक ओर बैठा शिल्पी निर्विकार भाव से शिला तराश रहा था। आँखे उस शिला को ढूँढने लगी जो उस समय तराशी गई होगी। कल्पना में पुराना शहर अपने लाव-लश्कर के साथ चलते राजा और जहाजों से भरा बंदरगाह साकार हो उठे।
महाबलीपुरम् का इतिहास बताता है कि एक समय पर यह प्राचीन पल्लव राज्य का बंदरगाह था। पल्लवों ने कांचीपुरम् में तीसरी से आठवीं शताब्दी तक राज्य किया था ‘पल्लव वंश’ के शासक कला और स्थापत्य कला के महान संरक्षक थे। शिलालेखों के अनुसार महाबलीपुरम् के स्मारक, पल्लव राजा महेंद्र वर्मन, उनके पुत्र नरसिंहवर्मन और उनके वंशजों द्वारा बनवाए गए थे। कांचीपुरम् में अपनी राजधानी और मामल्लपुरम् में अपने बंदरगाह के साथ, पल्लवों ने दो शानदार शहरों का निर्माण किया जो अपने स्थापत्य के अपार वैभव के लिए विख्यात रहे।चट्टानों को काटकर बनाए गए मंदिरों में सबसे खूबसूरत, मामल्लपुरम् स्थित पल्लव स्मारक देश की सबसे पुरानी संरचनाओं में गिने जाते हैं और पूरे भारत में अपनी तरह के एकमात्र स्मारक हैं।
ताजी स्वच्छ हवा और लंबी सैर से भूख लग आई थी, नाश्ते का समय होने और नाश्ते की माँग से यह सम्मोहन टूटा और हम वापस होटल लौट आए। किसी स्थान को जानने देखने और समझने का सबसे अच्छा तरीका पैदल चलना है। शोर टेंपल से होटल तक के रास्ते में एक छोटा सा बाजार था जिसमें  कई स्थानों पर ताज़े इडली-सांभर और वड़े व पकौड़ोंकी रेहड़ियाँ लगी हुई थी। एक ओर से लाल वस्त्रों में लिपटे स्त्री-पुरुषों व बच्चों का विशाल जनसमूह चला आ रहा था।एक ही रंग में रँगे इतने सारे लोगों को देखते ही उत्सुकता जागृत हुई। रुक कर पूछा कि वह सब लाल कपड़े क्यों पहने हुएभाषाई सीमा के चलते बस इतना समझ आया माता मंदिर दर्शन।बाद में पता लगा दक्षिण में परंपरा है एक गांव के लोग जब तीर्थ यात्रा के लिए निकलते हैं तो वह सब एक ही रंग की कपड़े पहनते हैं ताकि समूह के लोग आसानी से पहचाने जा सके।कुछ अन्य स्थानों पर इसी तरह काले और नीले कपड़ों में भी लोग नजर आए।
बाजार पार होने के बाद पड़ने वाले प्रत्येक घर के द्वार पर बनी सुंदर रंगोलियाँ बेहद मोहक व आकर्षक थीं, चौरस,गोल, मोर, मछली और कमल पुष्प के आकार की यह रंगोलियाँ तमिल परंपरा हैं। किसी-किसी घर के द्वार पर लगे ताले और सिर्फआटे से बनी रंगोली इंगित कर रही थी की गृह-स्वामिनी काम पर जाने से पहले भी अपनी परंपरा को निभानाभूलती नहीं है।
नाश्ता कर  पुनः निकले अपने दूसरे पड़ाव  पंचरथ समूह की ओर जो महाबलीपुरम् का दूसरा आकर्षण हैं। चट्टानों को काटकर रथों के आकार में बने इन मंदिरों का नाम पांचों पांडवों के नाम पर धर्मराज रथ, भीम रथ, अर्जुन रथ, नकुल- सहदेव रथ और द्रौपदी के नाम पर द्रौपदी रथ पड़ा है।  वस्तुतः इन्हें कभी मंदिर का दर्जा नहीं मिला क्योंकि राजा नरसिंह देव बर्मन के देहान्त के कारण यह पूरे नहीं हो पाए और इसी कारण इनमें प्राण-प्रतिष्ठा नहीं हुई। लेकिनइन सभी रथों में भगवान विष्णु, मुरुगन, शिव आदि देवताओं की कई मूर्तियाँ है।चट्टानों पर की गई कलाकारी दृष्टि के साथ-साथ मन को भी बाँध लेती है। चढ़ते सूर्य के साथ पंचरथ परिसर मेंफैली रेत गर्म होने लगी थी। कुछ देर वहीं एक विशाल पेड़ की छाँव में बैठ उन बेनाम शिल्पकारों की अद्भुत शिल्पकला को विस्मयपूर्वक निहारते रहे और फिर पहुँचे लाइटहाउस।
ग्रेनाइट पत्थर से बना लाल टोपी वाला लाइटहाउस, किसी भी अन्य लाइटहाउस के समान ही था। इसका निर्माण अंग्रेजों ने 1889 के आसपास कराया था। हमारी रुचि उसके पास स्थित पुराने लाइटहाउस या ओलक्कान्नेश्वर मंदिर में अधिक थी।कहा जाता है कि भारत का समुद्री व्यापार 13वीं  शताब्दी में फैला हुआ था और तब ओलक्कान्नेश्वर मंदिर के ऊपर आग जलाकर जहाजों को मार्ग दिखाया जाता था। इसकी रोशनी दस मील दूर तक दिखाई देती थी।
पत्थर की सीढ़ियों से होकर ऊपर के तल पर पहुँचकर पूरे मामल्लपुरम् का अद्भुत सौंदर्य हमारे सामने फैला हुआ था। सौंदर्य को निहारने में हम इतना खोए थे कि एक बंदर कब आकर साथ में खड़ा हो गया, पता ही नहीं लगा। जब उसने मेरे छोटे बेटे के हाथ से सॉफ्ट-ड्रिंक की बोतल लेनी चाही तब उसकी ओर ध्यान गया। बोतल लेकर उसने उसका ढक्कन खोला और पास ही के पत्थर पर बैठकरफ्रूटी पीने लगा। यह दृश्य सभी के लिए जितना रोचक था, मेरे बच्चे के लिए उतना ही यातनापूर्ण, उसे अपनी प्रिय फ्रूटी छोड़नी पड़ी थी, अतः हम जल्दी से नीचे उतर आए। नीचे उतरने पर पता लगा कि यह मंदिर महिषासुरमर्दिनी मंडप के ठीक उपर एक चट्टान पर बना है। शिव-पार्वती और स्कंद के चित्रों को दर्शाता महिषासुरमर्दिनीमंडप असीम शांति और शीतलता से परिपूर्ण था। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य के चित्रों की उपस्थिति तत्कालीन राजाओं व जनता की मान्यताओं को उकेरती है। अनाम शिल्पकारों द्वारा तराशी गई आकृतियों को देखते हुए यह अहसास गहरा गया कि नश्वर मनुष्य की कला स्वयं मनुष्य से अधिक स्थायी है। मन एक बेचैन उदासी से घिर आया। प्राचीन मंदिरों और गुफाओं का शिल्प व नक्काशी मुझे बहुत आकर्षित करते हैं। ऐसे स्थानों पर घंटों शांत बैठने और शिल्पाकृतियों से बाते करने को मन चाहता है, लेकिन सदा ही समय पीछे खड़ा ठेलता रहता है।
अगला पड़ाव थाबड़ी-बड़ी शिलाओं पर उकेरे हुए विविध मूर्तिचित्र। इस स्थान को अर्जुन्स पेनेन्स (अर्जुन की तपस्या) और डिस्सेंट ऑफ गैंजेस (गंगा का अवतरण) नाम से जाना जाता है। संभवतः इन कलाकृतियों के मूल नाम कुछ और रहे होंगे जो अंग्रेजों को समझ न आने पर उन्होंने इनका नामकरण इस प्रकार किया और यही प्रचलित हो गया। साथ-साथ बने दो पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियों में अर्जुन की तपस्या(कुछ लोग इसे भगीरथ द्वारा गंगा को धरती पर लाने के लिए की गई तपस्या का चित्रण बताते हैं) नामक शिला-शिल्प है। यह शिल्प दोनों  कहानियों का समर्थन करता हैं। व्हेल मछली के आकार के इस बड़े पत्थर पर  ईश्वर, मानव, पशुओं और पक्षियों कीसौ से अधिक आकृतियाँ उकेरी गई हैं, जिनमें पंचतंत्र की कुछ कथाओं का भी चित्रण है। यहाँ उकेरी कला उस समय के मूर्तिकारों के उत्कृष्ट कौशल के प्रमाण के रूप में हर ओर विराजमान है। पल्लव वंश के वास्तुविदों ने अगम शास्त्र (भवन-निर्माण हेतु संहिता) के सिद्धान्तों को बौद्ध स्थापत्य शैली के साथ मिलाकर अपनी एक अनूठी शैली विकसित की थी और ईंट या लकड़ी के स्थान पर पत्थर का उपयोग किया जिसके कारण पल्लव मंदिर लंबे समय तक टिके रहने वाले, तथा मौसम, क्षरण, और समय पर विजय पाने में सक्षम रहे हैं। कहा जाता है महाबलीपुरम्समुद्रपार जाने वाले यात्रियों के लिए मुख्य बंदरगाह था और ये मूर्तिचित्र मातृभूमि छोड़ते समय उन्हें देश की पुरानी संस्कृति की याद दिलाते थे। ये आज भी हर आगंतुक के मन में बस जाते हैंऔर बसे रहते हैं।

मनुष्य आज तकनीक में बहुत आगे निकल चुका है लेकिन प्रकृति के कुछ अजूबे उसकी समझ से आज भी परे हैं, ऐसा ही एक अजूबा है कृष्णाज़ बटरबॉल (कृष्ण का माखन का गोला) कहा जाने वाला लगभग बीस फुट ऊँचा गोलाकार शिलाखंड जो अर्जुन्स पेनेन्स से थोड़ा आगे जाकर एक ढलान पर स्थिर खड़ा है। गुरुत्वाकर्षण के नियमों को चुनौती देता यह पत्थर अपने आप में एक अजूबा है। कहा जाता है कि एक समय पर शासकों ने कई-कई हाथियों से खिंचवाकर इसे हटवाने का प्रयास किया था लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो पाए। उत्कृष्ट शिल्पियों द्वारा तराशे गए इस शांत शहर में शायद यह प्रकृति का संदेश है कि सर्वशक्तिमान की सत्ता से बड़ा कुछ नहीं।
दो दिन इस शहर में व्याप्त शांति को आत्मसात किया और पत्थरों में तराशे शिल्प को बार-बार निहारते रहे। तीसरा दिन जो वर्ष का अंतिम दिन था वहीं की एक रिसॉर्ट में चेक-इन किया और नववर्ष के स्वागत को समुद्र तट पर आयोजित पार्टी का आनंद लिया। पार्टी खुले बीच पर थी और वहीं से करीब आठ सीढ़ियाँ नीचे उतरकर समुद्र था। रंग-बिरंगी संगीत के संग थिरकती रोशनियाँ समुद्र की आती-जाती लहरों को रहस्यमय आकर्षण प्रदान कर रही थीं और मुझे याद हो आईं ऊर्मियों पर काव्य रचती पहले दिन की रश्मियाँ। सच ईश्वर की कृतियाँ तो बेजोड़ हैं। अगले दिन महाबलीपुरम् से विदा लेने से पहले एक वादा मन ही मन खुद से किया था, लौटकर आने का। किसी रोज़ वो पुकार पुनः प्रबल होगी और मैं लौटूँगी उस रेत और तराशी हुई शिलाओं के बीच।

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