November 13, 2019

कविता

ज़मीर
-विजय जोशी

 कल रात मेरा ज़मीर मर गया
मर तो शायद काफी पहले गया था
पर किसी आशा में -
मैंने इस अहसास को,
आत्मा तक उतरने नहीं दिया
और फितरत से भरा जीवन जिया.

नर्म नर्म दूबवाली हरी-भरी धरती
सतपुड़ाविंध्या के बियावान जंगल
बीच में बहती माता सी नर्मदा
चाहे जो बच्चों का भला सर्वदा
स्कूल के पीछे इमली का पेड़
खेतों की कोरों परमिट्टी की मेड़
सब गुम हो गया है
कहाँ ढूँढूँ खो गए बचपन को
यादों मे रचे बसे प्यारे से मधुवन को
अब तो
यदि पंचवटी भी होती तो
सरकार नीलाम करके ठेकेदारों की जेब भर देती
और राम की सीतापट्टे के लिये भोपाल में होती
कल रात ..........

मेरे बच्चों मैं तुमसे शर्मिंदा हूँ
विरासत के नाम पर छोड़कर जाऊँगा
उजड़ी सी धरतीस्याह आकाश
डीजली हवा में मरता विश्वास
तरस तरस जाओगे ढूँढ नहीं पाओगे
गेहूँ की बाली / हरिया का गाँव
सावन के झूले / पीपल की छाँव
अंबुआ की डाली / मोरों की छाँव
तुलसी का चौरा / कागज की नाव
शेष रह जाएगा बस -
बोतल में आम !
माजा है नाम !!
कल रात ..........

समय के साथ सारे मूल्य बदल गए
शिवाप्रताप इतिहास होकर रह गए
आज़ादभगत अपनी महत्ता खो गए
और गाँधी सिर्फ वोट लेने की वस्तु रह गए
अब किसे फुर्सत है लकीर पीटने में
समय है कम पाना है ज्यादह
और उसके लिये साधन की पवित्रता का क्या सोच
चढ़ने के लिये सीढ़ी न हो
तो तुम्हारा कँधा भी चलेगा
और हमारे किये को आगे चलकर देश भरेगा 
कल रात ..........

v.joshi415@gmail.com

3 Comments:

Anonymous said...

एक कटु सत्य कविता में जैसे सिसकियाँ भरते हुए कह रहा है कि पर्यावरण की विरासत में हम छोड़ जाएंगे भारी हवा ,गंदी नदियाँ और शोर.....एक जागरूक बन अपना दायित्व समझने को रह कविता हमें मजबूर करती है।
साधना मदान

विजय जोशी said...

धन्यवाद मित्र हौसला बढ़ाने के लिये। यह तो संपादकीय मेहरबानी है जो मुझ पर बरसी है।
सादर

विजय जोशी said...

दिल के सच्चे लोग कुछ एहसास लिखते है
अपने दरियादिल शब्दों से कुछ खास लिखते है

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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