August 12, 2015

मृत्यु को रख मन में

जियो तो ऐसे...

सीखो तो ऐसे जैसे...

  - विजय जोशी

महात्मा गाँधी ने कहा था - जियो तो ऐसे जैसे कल मर जाना हो और सीखो तो ऐसे जैसे- अनंतकाल तक जीना हो ( Live as if you have to die tomorrow and learn as if you have to live for ever )
प्रबंधन के संदर्भ में यह शीर्षक कुछ अटपटा लग सकता है, पर इसमें बहुत सार छुपा है। जीवन एक स्टेज है जिस पर ऊपरवाले ने हमें भेजा है तमाम बुद्धि, विवेक, संस्कार की दौलत के साथ यह देखने के लिये कि हम अपना पार्ट कैसे अदा करते हैं। समय सीमा समाप्त हो जाने के बाद पर्दा गिर जाता है, तब ईश्वर फैसला करता है जिसे इतनी शिद्दत से संवार कर ढेर सारी खूबियों के साथ भेजा था वह धरती पर क्या करके आया। और तब हमारा फैसला होता है। एक बात और- विवेक की थाती सौंपने के साथ ही ईश्वर ने हमें परखने के लिए मोह, माया का जाल भी साथ ही सौंपा है। यह देखने के लिये हम अंदर से कितने ईमानदार तथा मजबूत हैं।
इंसान के जीवन में जन्म के बाद का एक मात्र शाश्वत सत्य यदि कोई है तो वह है मृत्यु। जीवन एक अनिश्चितता है। एक बार ईश्वर ने देह त्याग पश्चात् स्वर्ग हुँचे ऋषि से धरती पर गुजरे जीवन के अनुभव के बारे में पूछा तो ऋषि ने बेहद सटीक उत्तर दिया कि धरा पर उनके पल कुछ ऐसे बीत गए ,जैसे वे एक कमरे में प्रथम द्वार से प्रवेश कर दूसरे से निकल गए हों। इसके बाद भी हम जीवन के अस्थायित्व से मोहग्रस्त होकर जुड़े रहते हैं।
हम सब जानते हैं कि शरीर एक न एक दिन समाप्त हो जाना है। सभी कुछ यहीं छूट जाना है, केवल अच्छे कामों की दौलत हमारे साथ जाएगी, फिर भी आदमी ताउम्र लोभ, मोह, लालच में मशगूल होकर धन दौलत जोडऩे में लगा रहता है।
यक्ष से प्रश्नोत्तर प्रसंग के दौरान युधिष्ठिर ने इसकी   श्रेष्ठ व्याख्या की। जब उनसे पूछा गया कि धरती पर सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है तो धर्मराज ने कहा- इस मूढ़मति मानव के अतिरिक्त भला क्या हो सकता है, जो हर दिन किसी न किसी को मृत्यु के मुख में जाता देखकर भी सोचता है कि मृत्यु टाली जा सकती है। और जैसे- जैसे समय कम होता जाता है उसकी लालसा तीव्रतर होती जाती है। सब कुछ छोड़कर जाना है यह सत्य एवं तथ्य जानते हुए भी वह येन केन प्रकारेण संग्रह में लिप्त बना रहता है। अत: इतने बड़े सत्य से नेत्र होते हुए भी अन्धे बने रहने वाले मानव से बड़ा आश्चर्य भला क्या हो सकता है।
हिंदू दर्शन में संन्यास का एक प्रकार श्मशान वैराग्य है। आदमी जब भी अपने किसी अंतरंग की अंतिम यात्रा हेतु वहाँ पहुँचता है तो उसके मन में एक वीतराग और वैराग्य का भाव पूरी शिद्दत के साथ उभरता है। जीवन की क्षण भंगुरता से भिज्ञ हो वह उस पल से पाप कर्म त्यागकर सन्मार्ग पर चलने की प्रासंगिकता को पूरे मनोयोग से स्वीकारता है, किंतु उसकी स्मृति इतनी अल्पकालीन है कि वहाँ से बाहर निकलते ही वह फिर उसी जोड़ -तोड़ और हेरा -फेरी में लिप्त हो जाता है.
अनेक महापुरुषों ने सत्य के मार्ग के अनुसरण हेतु हमें ज्ञान प्रदान किया, किंतु व्यर्थ। सिकंदर महान ने मृत्यु पूर्व अपने अनुयायियों को बुलाया और उन्हें मृत्योपरांत तीन आज्ञा पालन हेतु आदेश दिया।
पहली यह कि उनका निजी उपचारकर्ता शव के साथ साथ चले, दूसरी यह कि युद्ध द्वारा अर्जित सारे माणिक, मोती, रत्न, हीरे, जवाहरात इत्यादि मार्ग में बिखेर दिये जाएँ।
और आखरी यह कि अंतिम यात्रा के दौरान  सिकंदर के दोनों हाथ ताबूत से बाहर निकाल कर रखे जाएँ।
आश्चर्यचकित अनुयायियों ने इन सबका कारण पूछा तो सिकंदर उन्हें गूढ़ बात समझाई। सर्व प्रथम यह कि मृत्यु सुनिश्चित एवं अवश्यंभावी है। उसके आने पर अच्छे से अच्छा डॉक्टर या वैद्य भी लाचार हो जाता है. दूसरी बात यह कि  जो माणिक, मोती, रत्न, हीरे, जवाहरात आदि मैंने लोगों को लूटकर, युद्ध में मार काट कर पूरी निर्ममता के साथ एकत्र किये उनका मोल भी इस मृत्यु बेला में कंकड़ पत्थर से अधिक नहीं है, और अंतिम यह कि मेरे दोनों हाथ ताबूत से बाहर निकाल कर रखना, ताकि लोग जान सकें कि अंतिम पल में मनुष्य को खाली हाथ ही प्रयाण करना होता है। वह खाली हाथ ही इस धरती पर आता है तथा खाली हाथ ही जाता है।
याद रखें मृत्यु जीवन की अंतिम परिणिति नहीं है, यह तो जन्म जन्मांतर की अगली यात्रा का प्रवेश द्वार है।
राज कुमार सिद्धार्थ ने रोग, वृद्धावस्था व मृत्यु रूप में जब दुख एवं जीवन की निस्सारता को देखा तो वे अंदर तक हिल गए। जीवन की प्रासंगिकता के प्रति जागरूक होकर शेष जीवन संन्यास के माध्यम से दीन दुखियों की सेवा हेतु समर्पित कर दिया। जीवन एक चुनौती है तो मृत्यु कर्म की पराकाष्ठा अर्थात जो भी अच्छा या बुरा हमने ताउम्र किया उसका आकलन।
कालांतर में गौतम बुद्ध रूपी सिद्धार्थ ने मोह को दुख व पीड़ा का एकमात्र कारण बतलाया। जब एक महिला अपने मृत बालक को पुनर्जीवित करने की कामना लेकर उनके समक्ष उपस्थित हुई तो तथागत ने उसकी मनोकामना पूर्ति हेतु वचन भी दिया, लेकिन इस शर्त के साथ कि वह उन्हें केवल एक मुट्ठी चावल उस घर से लाकर दे जिस घर में कभी कोई मृत्यु को प्राप्त न हुआ हो।
दर असल मोह ही आदमी को मारता है। जब आप स्वार्थ में लिप्त होते हैं,तो केवल अपने फायदे की बात सोचता है। सामने वाला केवल आपके ऊँचे चढऩे में सहायक सीढ़ी के समान होता है, जिसे काम निकलते ही हम हटा देते हैं। यह ठीक नहीं, जिन सहयोगियों की मेहनत के दम पर आप प्रगति की सीढ़ी चढ़ते हैं, उनके उपकार रूपी ऋण को जीवन भर याद रखना तथा मुसीबत के समय उनका साथ देना आपका नैतिक कर्तव्य है। पर अमूमन आगे बढ़ते समय हम पीछे मुड़कर नहीं देखते तथा आदमी को वस्तु मात्र मान उसका पूरा दोहन या शोषण करते हैं। तब उनके मन में भी आपके लिये श्रद्धा नहीं उपजती ; बल्कि वे काम को मन लगाकर करने के बजाय एक तटस्थ भाव से करते हैं। इससे संस्था को अपने कर्मचारियों का श्रेष्ठ योगदान नहीं मिलता। यह नेतृत्व का दोष है। बड़े आदमी को उदार बनना ही चाहि। कहा भी गया है-
मुखिया मुख सो चाहिये, खान पान में एक
पाले पोसे सकल जग, तुलसी सहित विवेक
सिख धर्म के प्रवर्तक गुरुनानक को एक बार गरीबों के शोषण से अर्जित संपदा के स्वामी एक घमंडी मींदार ने अपने निवास पर स्वयं के वैभव प्रदर्शन हेतु आमंत्रित किया। नानक अपने साथ कुछ कंकड़, पत्थर ले गए तथा उस मींदार के हाथ में इस शर्त के साथ देकर बोले कि इन्हें दूसरी दुनिया में लौटाना होगा। इस पर मींदार को हँसी आ गई और बोला- भला यह भी कहीं संभव है।
गुरुनानक ने तुरंत उतार दिया- तो फिर गरीब मासूम लोगों को कष्ट देकर उनकी हया से अर्जित इस म्पत्ति का भी भला क्या मूल्य है।
 रेगिस्तान निवासी  एक सूफी संत के दरवाजे एक दिन मौत ने दस्तक दी और कहा तेरा वक्त आ गया है। फकीर ने उत्तर दिया - स्वागत है तुम्हारा, लेकिन मैं अधनंगा फकीर हूँ और नहीं चाहता कि मौत के बाद नंगा पड़ा रहूँ। अत: मुझे तीन दिन की मोहलत दो,ताकि अपने कफन का इंतज़ाम कर सकूँ।
मौत ने कहा - तूने तमाम उम्र खुदा की इबादत की है- जा तूझे मोहलत दी।
कहते हैं वह बुज़ुर्ग फकीर पास के एक शहर से तीन गज लंबा चोगा खरीद लाया और शांतचित्त होकर मौत की प्रतीक्षा करने लगा। तय समय मौत आई और प्राण लेकर चली गई। मृत शरीर वहीं पड़ा रहा। तभी एक काफिला हाँ से गुजरा। लोगों ने लाश देखकर उसे दफनाना चाहा, लेकिन समस्या कफन की आ गई।  तभी किसी की नज़र उसके सर पर लिपटे कपड़े पर पड़ी, जो खोलने पर पूरे तीन गज निकला। लोग वाह वाह कर उठे कि फकीर को अपनी मौत का इल्हाम  था तभी उसने तो कन का इंतज़ाम पहले से कर लिया था।
कहते हैं तभी से अरब का हर आदमी अपना सिर तीन गज कपड़े से ढककर रखता है। लोग उसे लिबास या धूल, धूप व आँधी से बचने का साधन समझते हैं, लेकिन वस्तुत: वह उसे मौत की असलियत से वाकि रखता है।
सुकरात ने कहा था मृत्यु से बड़ा कोई सत्य नहीं है। इसे याद रखना बहुत सी बुराइयों से दूर रहना है।
एक बहुत ही सिद्ध और सच्चे भक्त थे। वे सदैव प्रसन्न रहते थे। एक दिन उनके एक शिष्य ने जब उनसे प्रसन्नता के मूलमंत्र के बारे में पूछा तो संत ने अगले सात दिनों में शिष्य की मृत्यु को प्राप्त हो जाने की घोषणा कर दी।
भविष्यवाणी सुनकर शिष्य सन्न रह गया। गहरे अवसाद से उसके व्यवहार में आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया। वह छोटी-मोटी बातों से ऊपर उठ गया और सभी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करने लगा। उसके मन में उदारता ने जन्म ले लिया।
ठीक एक सप्ताह बाद संत ने उसे बुलाकर पूछा- कहो कैसा लग रहा है।
शिष्य ने कहा - पूरे सप्ताह मुझे किसी पर क्रोध नहीं आया। किसी को कड़वा नहीं बोला और सबके साथ प्रेमपूर्वक रहा। क्यों थोड़े समय के लिये बुराई का टोकरा सिर पर उठाऊँ
संत ने कहा - मैंने यह भविष्यवाणी केवल इसलि की थी ; ताकि तुम जान सको कि मन में मृत्यु की अवधारणा को धारण करने वाला क्रोध, र्ष्या, लोभ इत्यादि सब बुरायों से ऊपर उठ जाता है। यही मेरी प्रसन्नता का भी कारण है। जाओ प्रसन्न रहो। तुम्हारी काफी आयु अभी शेष है।
अत: यह अत्यावश्यक है कि हमारा जीवन निष्पाप हो। धन याम्पदा केवल जीने के साधन मात्र हैं, उसका उद्देश्य नहीं। महात्मा गाँधी ने तो कहा ही है कि- मेरे लिये साधन की पवित्रता भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी कि साध्य की। अपावन साधन साध्य की गरिमा को भी नष्ट कर देता है।
इसलि साधन को साध्य मत बनने दीजि। यह सत्य है कि हमें जीने के धन चाहि, लेकिन केवल धन के लिये जीना तो एक अपराध। धन को यह अवसर कदापि न दें कि वह आपके उद्देश्य का अपहरण ही कर ले। मन में मृत्यु का भाव न केवल हमें जीवन यात्रा में सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है ; अपितु हमारे ह्रदय को भी स्वच्छ एवं निर्मल रखता है।
याद रखि मन में मृत्यु की सच्चाई को जिंदा रखना भी एक प्रकार का वरदान है। असुरक्षा की यह भावना आपको बुरा काम करने से रोकेगी। समस्त विद्वानों ने हमें इस सत्य से अवगत कराया है कि जीवन मात्र एक रंगमंच है, जिस पर हमारे द्वारा किये गये क्रिया -कलाप को ईश्वर देख रहा है। एक दिन पर्दा गिर जाएगा और हम अपने कर्मों की थाती के साथ लौट जाएँगे अपना हिसाब देने के लि। याद रखिये मृत्यु एक अटल सत्य है।  यह एक न एक दिन अवश्य आएगी और हमारे लि परम आनंद के संसार की द्वार खोलेगी। 
इसलि यह याद रखना आवश्यक है कि स्नेह एवं उदारता का यही भाव आपको दयालु बनाता है। इसको आचरण में ढाल लेने के बाद आप पाएँगे कि आपके संगी, साथी और सहयोगी न केवल आपके प्रति समर्पित होंगे वरन सौंपे गए कार्य को भी पूरी मेहनत, लगन तथा ईमानदारी के साथ सम्पन्न करेंगे। नेतृत्व को सफलता के साथ ही साथ जीवन की सार्थकता के लिए ये गुण आपके लिये आवश्यक हैं। इनसे आपका व्यक्तित्व और निखरेगा तथा सब ओर आपका नाम आदर के साथ लेकर आपके कदम चूमेगी। आमीन।

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