September 27, 2012

अनकही

पर्यटन संस्कृति

मानव प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य के करीब जाकर तृप्ति और पूर्णता का अनुभव करता है। इसी पूर्णता को पाने के लिए वह प्रकृति के और करीब जाना चाहता है। प्रकृति को समझना, मानव सभ्यता के विकास को जानना, अपनी संस्कृति पर गर्व करना मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। इन्हीं जिज्ञासाओं के कारण ही पर्यटन-संस्कृति ने जन्म लिया है।
 सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक महत्व को समझने के लिए 27 सितंबर, 1980 से विश्व पर्यटन दिवस मनाने की शुरूआत हुई। 1979 में स्पेन में आयोजित तीसरे अधिवेशन के विश्व पर्यटन महासभा में यह निर्णय लिया गया था। बताने की आवश्यकता नहीं कि पर्यटन से जहां संस्कृति का विकास होता है, सभ्यताओं के बीच संवाद अदायगी होती है, वहीं पर्यटन से जुड़े उद्योगों से रोजगार के नए रास्ते खुलते हैं।
भारत के संदर्भ में देखें तो हम पाते हैं कि हमारे यहां पर्यटन का शुभारंभ तीर्थयात्रा के रूप में हुआ था। धर्म प्रधान भारतीय अपनी धार्मिक आस्था से वशीभूत होकर मोक्ष की प्राप्ति के लिए चारों धाम की यात्रा पर निकला करते थे। मोक्ष प्राप्ति की इस धार्मिक मान्यता ने लोगों को यात्रा के लिए प्रेरित किया। इस तरह लोग एक स्थान से दूसरे स्थान आने-जाने लगे। इन यात्राओं से विभिन्न संस्कृतियों का मेल हुआ, साथ ही व्यापार और व्यवसाय के क्षेत्र में भी वे आपस में भागीदारी करने लगे।
भारत में धार्मिक यात्राओं का चलन आज भी जारी हैं, परंतु इसके साथ ही भागदौड़ वाली जिंदगी से सुकून पाने, आराम करने और प्रकृति की खूबसूरती को देखने के लिए लोग पर्यटन पर निकलने लगे। छुट्टियों का मौसम चाहे वह गर्मी का हो या दशहरा-दीपावली का, पर्यटन स्थलों की ओर जाने वाली रेल गाडिय़ों में आरक्षण के लिए लंबी कतारें महीनों पहले ही लगने लगती हैं। अब तो पर्यटन को बढ़ावा देने हवाई यात्रा करने वालों के लिए लुभावने पैकेज ऑफर मिलने लगे हैं और यही हाल पहाड़ी स्थलों, ऐतिहासिक स्थलों, प्राचीन धरोहर वाले स्थानों के होटलों में बुकिंग का भी होता है।
इन सबका परिणाम यह है कि भारत के अनमोल धरोहरों की ओर जब विदेशी सैलानियों का ध्यान आकर्षित होने लगा और वे बड़ी संख्या में भारत आने लगे तथा भारत को विदेशी मुद्रा के रूप में आय का एक बड़ा स्रोत मिलने लगा तब राज्य सरकारों ने पर्यटन व विदेशी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए नए-नए उपाय शुरु कर दिए। लेकिन इन सबके बाद यह भी सत्य है कि हमारी सरकार पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था के साथ रहने-खाने की पर्याप्त सुविधा मुहैय्या करवाने की दिशा में उतनी सफल नहीं हो पा रही है। हमारे देश में पर्यटन के लिए इतने अधिक और बड़ी संख्या में अनोखे स्थान उपलब्ध हैं यदि उन छिपे हुए स्थानों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए तो पर्यटक उन नए स्थलों में जाने के लिए उत्सुक बैठें हैं, परंतु अफसोस उन स्थलों तक पहुंचने व रहने की पर्याप्त व्यवस्था न हो पाने के कारण पर्यटक वहां तक पहुंच ही नहीं पाते।
इसी प्रकार जिन स्थलों पर निजी व्यवसायियों ने अपना जाल फैलाया है वहां उनकी मनमानी पर्यटकों को निराश करती है। चाहे वे टैक्सी वाले हों, होटल वाले हों अथवा व्यापारी हों, हर जगह ऐसी लूट-खसोट मची होती है कि पर्यटक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि वे यहां जिंदगी के कुछ पल आराम पाने, शांति से समय बिताने और कुछ अच्छा देखने व जानने आए हैं या और अधिक मुसीबत झेलने?
पांच सितारा होटलों के एयरकंडीशंड कमरे में बैठकर योजनाएं सिर्फ पांच सितारा पर्यटकों के लिए बनती हैं यानी जो पांच सितारा खर्च वहन कर सकता है उसके लिए पर्यटन सुकून भरा, बाकी के लिए मुसीबत। अक्सर पढऩे व सुनने में आता है कि विदेशी सैलानी भी यहां आकर बहुत अच्छा अनुभव लेकर नहीं लौटते। अतिथि देवो भव: के लिए प्रसिद्ध भारत देश में अतिथि को इतना लूटा जाता है कि वे दोबारा भारत आने से डरने लगते हैं।
पर्यटन को जब विदेशी मुद्रा के आय के एक बड़े स्रोत के रूप में देखा जाता है तो फिर हमारी सरकार कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती? आजादी के इतने बरस बाद भी हम पर्यटन को एक प्रमुख उद्योग के रूप में स्थापित नहीं कर पाएं हैं यह अफसोस-जनक है।
 यह तो सर्वविदित है कि मैसूर व कुल्लू का दशहरा, जयपुर का पतंग मेला, पुष्कर मेला, सोनपुर मेला, गोवा कार्निवल, आदि कई भारतीय उत्सव देशी-विदेशी सभी पर्यटकों को हर वर्ष अपनी ओर खींच कर लाते हैं इसके बाद भी हम कहीं कमजोर से पड़ जाते हैं। 
पर्यटन से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण बात है जिस पर बात करना जरूरी है- हम पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए चाहे जितने उपाय कर लें चाहे जितनी योजनाएं क्यों न बना लें यदि हम इसके दूसरे पहलू की ओर ध्यान नहीं देंगे तो सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी। और यह जिम्मेदारी आती है स्वयं पर्यटकों पर। पर्यटन के नाम पर यदि हम अपनी संस्कृति अपनी परंपरा अपनी धरोहर को विकृत करेंगे, प्रदूषित करेंगे, गंदगी फैलाएंगे तो ऐसे पर्यटन को बढ़ावा देने से तो अच्छा है कि उन्हें वे जिस हाल में हैं, उसी हाल में छोड़ दें। हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी प्रकृति को स्वच्छ रखें, अपने ऐतिहासिक, पुरातात्विक धरोहरों को सुरक्षित रखें, अपनी संस्कृति को प्रदूषित न होने दें। यदि हम इस दूसरे पहलू का ध्यान रखते हुए उतनी ही गंभीरता से योजना बनाएंगे, तभी अपने देश के इन अनमोल धरोहरों, सौंदर्य स्थलों को संजोकर रख पाएंगे और अपनी स्वर्ग जैसी धरती पर गर्व कर सकेंगे।
    -डॉ. रत्ना वर्मा

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