November 27, 2010

बूंदें संजोकर बुझाई प्यास

- भारत डोगरा

राजस्थान में पेयजल के अभाव से त्रस्त लगभग 600 स्कूलों में परंपरागत टैंकों के निर्माण का सराहनीय कार्य भी केन्द्र ने किया है। अजमेर जिले के टिकावड़ा गांव में बच्चे प्यास से त्रस्त रहते थे तो पढ़ाई में ध्यान कैसे लगाते? केंद्र ने स्कूल की छत के पानी के भूमिगत स्टोरेज के लिए साफ टैंकों का निर्माण किया।
राजस्थान प्राय: सूखे से त्रस्त रहता है, पर इस वर्ष राज्य के अनेक क्षेत्रों में अच्छी वर्षा हुई है। सवाल यह है कि क्या वर्षा की इन अमूल्य बूंदों को सूखे समय के लिए बचाने का पर्याप्त प्रयास हो रहा है? राजस्थान की एक संस्था सामाजिक कार्य व अनुसंधान केन्द्र वर्षा जल के संरक्षण का भरपूर प्रयास कर रही है। अजमेर जिले के सलोरा- किशनगढ़ ब्लॉक व आसपास के कुछ क्षेत्रों में इस संस्था ने बूंद- बूंद पानी बचाने का काम अनेक गांवों व स्कूलों में किया है।
संस्था ने जल- संरक्षण कार्य की शुरुआत अपने गांव स्थित कैंपस से ही की है। परिसर में जगह- जगह गड्ढे खोदकर जल रोकने का काम किया गया व पहाडिय़ों पर हरियाली भी पनपाई गई। इसके चलते पहाड़ पर ही काफी पानी रुक जाता है। जो पानी परिसर की ओर बहता है उसे कुएं में एकत्र किया जाता है। सिंचाई में पानी की बचत के लिए ड्रिप सिंचाई का उपयोग होता है। सभी भवनों की छत पर गिरने वाले वर्षा जल को पाइप के माध्यम से टैंकों में एकत्र किया जाता है।
इन जल- संरक्षण संग्रहण प्रयासों का परिणाम यह है कि गर्मी के दिनों में जब पास के गांव के हैंडपंप सूख जाते हैं, यहां के हैंडपंप में पानी आता रहता है। यह एक उदाहरण बन गया है। अनेक गांवों में संस्था के सहयोग से वर्षा के जल को उपयोग में लाने के लिए कुओं की ओर मोडऩे का कार्य किया गया है जिससे भूजल ऊपर उठे और सूखे कुओं व हैंडपंप में फिर से पानी आने लगे।
कदमपुरा गांव में इस कार्य से लोगों को बहुत राहत मिली। खारे व फ्लोराइड युक्त पानी के कारण गांव के लोगों को 3 कि.मी. दूर से 300-400 रुपए प्रति टैंकर की दर से पानी मंगवाना पड़ता था। जल संरक्षण के बाद पानी खरीदने की यह मजबूरी बहुत कम हो गई है। इस प्रयास के अन्तर्गत एक नाडी (छोटा तालाब) बनवाई गई व उसके बाद एक छोटा कुआं भी। नाडी में वर्षा का जल एकत्र किया गया व कुएं ने बेहतर व शीघ्र रीचार्ज की भूमिका निभाई। पशु तो सीधे नाडी से ही पानी पी लेते हैं, पर एक प्रमुख लाभ यह हुआ कि मीठे पानी के एक कुएं में भी फिर से पानी आ गया।
पहले दलित परिवारों के पानी लेने पर कुछ रोक थी, पर संस्था का सिद्धांत तो पूरी समानता का है। अत: उनकी सहायता प्राप्त योजना में ऐसी कोई रोक- टोक सहन नहीं की जाती है। इससे सबसे गरीब परिवार तक लाभान्वित होते हैं। फलौदा गांव में जहां पाइप से पानी पहुंचाने में संस्था ने सहायता की, वहां भी दलित व निर्धन परिवारों की जरूरतों का विशेष ध्यान रखा गया।
कोटडी जैसे गांव में जहां खारे पानी की समस्या बहुत विकट है, वहां सामाजिक कार्य व अनुसंधान केन्द्र व सहयोगी संस्था मंथन ने रिवर्स ऑस्मोसिस संयंत्र लगाया है। इस संयंत्र में प्रति मिनट 10 लीटर मीठा पानी प्राप्त किया जा सकता है। मीठा पानी पीने के काम आता है व शेष पानी का उपयोग बर्तन धोने आदि कामों में हो जाता है।
राजस्थान में पेयजल के अभाव से त्रस्त लगभग 600 स्कूलों में परंपरागत टैंकों के निर्माण का सराहनीय कार्य भी केन्द्र ने किया है। अजमेर जिले के टिकावड़ा गांव में बच्चे प्यास से त्रस्त रहते थे तो पढ़ाई में ध्यान कैसे लगाते? केंद्र ने स्कूल की छत के पानी के भूमिगत स्टोरेज के लिए साफ टैंकों का निर्माण किया। पाइप के जरिए बारिश के पानी को यहां तक पहुंचाया जाता है। शुरू में जो मिट्टी भरा पानी आता है, उसे बाहर कर दिया जाता है। फिर जो साफ पानी आता है उसे फिल्टर लगी इनलेट के माध्यम से टैंकों में स्टोर किया जाता है। टैंक के ऊपर हैंडपंप लगा है। फरवरी- मार्च में जब इनमें जल समाप्त होने लगता है तो टैंकर मंगवा कर इन्हें भरवा लिया जाता है। पानी उपलब्ध होने पर छात्राओं व महिला अध्यापिकाओं के लिए शौचालय बनवाना भी संभव हो पाया।
अजमेर- नागौर जिलों की सीमा के पास प्रवासी मजदूरों के बच्चों का एक स्कूल भी हमने देखा जो बिना भवन के ही चल रहा है। जब स्कूल की बिल्डिंग ही नहीं है तो छत से पानी एकत्र कैसे हो? इस स्थिति में धरती पर जल ग्रहण क्षेत्र या कैचमेंट तैयार कर वर्षा के पानी के स्टोरेज की व्यवस्था की गई है। खारे पानी का क्षेत्र होने के कारण यह इन बच्चों के लिए विशेष तौर पर उपयोगी है। टैंक का उपयोग कई बार बच्चे चबूतरे के तौर पर भी कर लेते हैं या सर्दी में यहां छोटी सी क्लास भी लग सकती है। टैंक पर एक ब्लैक बोर्ड भी लगा दिया गया है। केंद्र ने अन्य सार्वजनिक स्थलों व प्रशिक्षण केंद्रों में भी जल- संग्रहण का उपयोगी कार्य किया है। पहले सलोरा- किशनगढ़ ब्लॉक के आसपास केंद्रित यह काम अब बाड़मेर, राजसमंद, सीकर जिलों के अलावा पश्चिम बंगाल व सिक्किम में भी फैल गया है। अब तक वर्षा जल संग्रहण के 4 करोड़ लीटर क्षमता के टैंक बने हैं। लगभग 60 करोड़ लीटर पानी संग्रहण क्षमता के तालाब- नाडी बनाए गए हैं। लगभग 50 कुओं में छतों से पाइप द्वारा वर्षा का पानी पहुंचाया जाता है। यह पूरा कार्य गांव समुदाय के सहयोग से होता है व कमजोर वर्गों, दलितों व महिलाओं को जोडऩे का विशेष प्रयास किया जाता है।
गांवों में जल व सफाई की योजना तथा वैज्ञानिक ढंग से जानकारी इकट्ठे करने का प्रयास नीरजल परियोजना के माध्यम से हो रहा है। ग्रामीण युवाओं को जल की गुणवत्ता की जांच के लिए प्रश्ििक्षत किया गया है और वे अपनी यह जिम्मेदारी भलीभांति निभा रहे हैं।
सबसे अधिक चर्चा में कोरसीना वर्षा जल संग्रहण बांध का कार्य रहा है। यह वर्षा जल संग्रहण के एक परंपरागत स्थान पर बनाया गया जहां सैकड़ों वर्ष पहले किया गया निर्माण टूट चुका था और अवशेष ही बचे थे। यह स्थान सांभर झील के पास है जहां खारे पानी से नमक बनाया जाता है। जयपुर के दूधू ब्लॉक के ये गांववासी खारेपन की समस्या से त्रस्त रहे हैं। यह पानी अब झील के खारे पानी में मिलने के स्थान पर गांव में बचा कर रखा जाएगा। इस पानी को बहुत से पशु पी सकेंगे व लगभग 20 गांवों में पानी रीचार्ज होगा जिससे कई हैंडपंप, कुएं नया जीवन प्राप्त करेंगे जिससे लगभग एक लाख लोगों की पेयजल स्थिति बेहतर होगी। जल- संग्रहण व संरक्षण कार्यों से अनेक गांवों में पेयजल समस्या हल होगी और पानी की कमी के चलते पलायन को मजबूर बहुत से गांववासी चैन से अपने ही गांव में रह सकेंगे।
वनीकरण व वृक्षारोपण के प्रयासों से भी यहां जल संरक्षण के कार्य में बहुत सहायता मिली है। आज से करीब 20 साल पहले, अजमेर के सिलोरा ब्लॉक के टिकावड़ा गांव में 127 बीघा जमीन बेकार- बंजर पड़ी थी। हरियाली के नाम पर यहां नीम का सिर्फ एक पेड़ था। आज यहां नीम, शीशम, बबूल, कीकर, खेजड़ी और अन्य प्रजातियों के करीब 40 हजार पेड़- पौधे लहलहा रहे हैं। दो दशक में यह बदलाव हुआ कैसे?
करीब बीस साल पहले केंद्रीय परती भूमि विकास बोर्ड ने इस जमीन को हरा- भरा बनाने की जिम्मेदारी सामाजिक कार्य व अनुसंधान केंद्र को सौंपी। इसने गांववासियों के सहयोग से यहां सिंचाई के लिए कुआं बनाया। इसमें पानी इकट्ठा करने के लिए जगह- जगह कंटूर बंधों की श्रृंखला बनाई गई, एनीकट बनाए गए। बारिश के पानी को रोककर एक- एक बूंद का उपयोग हरियाली बढ़ाने के लिए किया गया। गांववासियों को ही पौधों की नर्सरी तैयार करने का काम दिया गया। हर पौधे को पनपाने के लिए मेहनत की गई। जड़ के पास मटका गाड़कर उसमें छेद करके धागा लटकाकर बूंद- बूंद पानी पौधों को पिलाया गया।
पशु चराने का सवाल सामने आया तो गांववालों से कहा गया कि कुछ जमीन को चराई के लिए खोला जाएगा तो कुछ जगह मनाही होगी। सब काम गांववासियों के सहयोग- सहमति से हुआ। इसलिए सबने निर्णय का पालन किया। पहले गाय- बैल और भैंसों को चराई की इजाजत मिली। जब पेड़ कुछ बड़े हो गए तो बकरी चराने की इजाजत मिल गई। अब तो गांववासी चारे की पत्ती के अलावा सब्जी और गोंद भी यहां से मुफ्त प्राप्त करते हैं।
केंद्र को ऐसी ही सफलता नालू व बांसीसीदरी गांवों में भी मिली। नालू में तो अब घास- चारे आदि की बिक्री से पंचायत को एक लाख रुपए की सालाना आय होती है। (स्रोत फीचर्स)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
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