October 04, 2008

संस्मरण / उफनती कोसी को देख : याद आई शिवनाथ नदी की वह बाढ़

- संजीव तिवारी

कोसी की तबाही का मंजर टीवी व समाचार पत्रों पर देखकर स्वाभाविक मानवीय संवेदना जाग उठी है देश भर से लोग मदद के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग कर रहे हैं। उफनती कोसी को टीवी में देख कर उसकी भयावहता को मैं महसूस कर रहा हूं । ऐसी ही एक बाढ़ (पर कोसी की बाढ़ से बहुत छोटी) की स्थिति से एक बार मेरा भी सामना हुआ था उसकी यादों को मैं आप लोगों के साथ बांटना चाहता हूं- मेरा गांव छत्तीसगढ़ में शिवनाथ नदी के एकदम किनारे बसा है, घरों से नदी की दूरी बमुश्किल 100 मीटर होगी । शिवनाथ छत्तीसगढ की दूसरे नम्बर की बड़ी नदी है, इसमें खारून, हांफ, आगर, मनियारी, अरपा, लीलागर, तान्दुला, खरखरा, अमनेरा, खोरसी व जमुनियां आदि नदियां मिलती हैं एवं शिवनाथ शिवरीनारायण में जाकर महानदी से मिल जाती है । मेरे गांव से दो किलोमीटर पूर्व ही शिवनाथ व खारून का संगम है। इन दोनों नदियों के मिलने के कारण यहां से शिवनाथ अपने वृहद रूप में बहती है।
वर्ष 1994 में छत्तीसगढ की नदियों में अतिवृष्टि के कारण भीषण बाढ़ आई थी, महानदी, शिवनाथ व खारून नें समूचे छत्तीसगढ के पठारी हिस्से को जलमग्न कर दिया था। मैं इस अवधि में भिलाई में अपने संस्थान में कार्यरत था, दुर्ग-भिलाई में लगातार बारिश हो रही थी जिससे कामकाज प्रभावित हो रहे थे। मैं लगभग खाली था रोज शाम को भिलाई से दुर्ग जाकर शिवनाथ के बढ़ते कदमों को नाप आता था । बचपन से मेरी आदत रही है, बारिश के दिनों में समय मिलते ही नदी के किनारे जाना एवं पानी की सीमा में दो चार लकडिय़ां गड़ा कर निशान बनाना, फिर एकाध घंटे बाद पुन: वहां जाकर जलस्तर को बढ़ते या घटते देखना फिर गांव भर ढिंढोरा पीटना कि गंगरेल से पानी छोड़ा गया है बाढ़ तेजी से आ रही है गुणा भाग करते हुए बताता कि इतने समय में इतनी दूर तक पानी चढ़ जायेगा। सो यहां भी प्रत्येक शाम जाकर ऐसा ही निशान लगा आता था जो निरंतर मिट रहा था।
बढ़ते पानी को देखकर मन गांव के बचपन के दिनों को याद करने लगा, तीन चार दिन बाद मैं अपने गांव जाने के लिये तैयार हो गया, सडक़ मार्ग से रायपुर तक गया वहां से सिमगा के बीच पडऩे वाले नालों में पानी उफान पर था अत: रेलमार्ग से तिल्दा गया वहां से पुन: सडक़ मार्ग से सिमगा पहुंचा । मेरे बड़े भाई साहब परिवार सहित सिमगा में रहते हैं जो तहसील प्लेस है यहां से मेरा गांव जबलपुर रोड शिवनाथ पार कर अंदर भाग में लगभग आठ किलोमीटर दूर है ।
गांव तक पहुंच पाना संभव नहीं था क्योंकि सिमगा शिवनाथ पुल में लगभग दस फुट पानी था। भाभी नें बताया कि गांव में मां-बाबूजी बीमार हैं और यहां आ पाना अब संभव नहीं है। पिछले बीस सालों में इतनी भीषण बाढ़ नहीं आई थी, गांवों में लोग फंसे थे सरकार द्वारा हेलीकाप्टर से राहत सामाग्री गिराई जा रही थी । सेना के जवान नावों के साथ सिमगा में कैंम्प कर रहे थे और गांवों से दूर पेंड़ों एवं इक्का दुक्का घरों के छप्परों के ऊपर फंसे लोगों को निकालने व राहत सामाग्री पहुचाने में लगे थे।
उत्सुकता मुझे पुन: नदी के किनारे पर ले आया, पर किनारा गायब था शिवनाथ सिमगा शहर तक पहुंच चुकी थी। मन में पुन: बचपन भर आया क्योंकि कई बार बढ़ते शिवनाथ के पानी को मैंने छूकर माथे में लगाया फिर पैर छुआया और अगले कुछ ही घंटों में शिवनाथ वापस अपने किनारों में सिमटने लगी, दादा मजाक में कहते थे कि 'तोर चरन धोवाये बर आये हे रे गंगा मईया हा, पांव पर अउ चरन धो, चल दिही’ । शायद यही सोंचकर पानी को माथे से लगाया हाथ पांव धोया और वापस भईया के घर आ गया। दूसरे दिन शिवनाथ वापस जाने के बजाय और आगे बढ़ आई। सुबह नहानें और बाढ में मस्ती करने के लिये गया तो वहां सैनिक दल में भिलाई का मेरा एक मित्र सहपाठी मिल गया। दुआ सलाम के बाद पता चला कि वह सेलर है, मैंने मजाक में ही कह दिया कि मुझे मेरे गांव ले जाओगे क्या, उसने तुरंत अपने आफीसर से पूछ लिया कि यह मेरा दोस्त है और इधर के गांव का रहने वाला है इसे क्षेत्र का अनुभव है और हमें उधर ही जाना है यह भी हमारे साथ जाना चाहता क्या हम इसे अपने साथ ले चलें। उसका आफीसर किंचित ना नुकुर के बाद मान गया क्योंकि नाव में आस- पास के गांव के दो कोतवाल भी थे जो मुझे जानते थे। इतने सहज रूप से भ्रमण का कार्यक्रम बनने पर मैंने आनन- फानन साथ आये भतीजे को वापस भेजकर संदेशा भेजा और मन ही मन प्रफुल्लित होने लगा।
चार बड़ी नावों की टीम तैयार थी, हम लोग इस बड़ी नाव को 'मलगी डोंगा’ कहते हैं। इसकी संख्या यहां गिनतियों में है यहां छोटी डोंगियां ज्यादा हैं, इन बड़े नावों को सेना ही लेकर आई थी। मैं 'मलगी’ नाव में चढ़ गया, हम सिमगा से दक्षिण पश्चिम में लहरों व भंवरों को पार करते हुए, नदी के उस पार पहुंचे। नदी के पार का तो मात्र अनुमान ही था क्योंकि पानी की धार का पार अत्यंत विस्तृत था। उस दिन बारिश बंद थी सूर्यनारायण लुक छिप रहे थे। कुछेक जगहों पर पेड़ों के उपरी हिस्से नजर आ रहे थे बाकी चारो तरफ जहां तक नजर जाती पानी ही पानी, पूर्ण वेग के साथ बहती व भंवर मारती धारा। इधर बंबूल के वृक्ष बहुतायत हंै जिनकी उंचाई औसतन पंद्रह बीस फुट होती है पर ये उपर से घने होते हैं इस कारण पानी में भारी खलबली मचा रहे थे । पेंड़ों के शेष हिस्सों में सांप, बंदर व अन्य छोटे जानवर जगह जगह चिपके सांसों के साथ जद्दोजहद कर रहे थे, चींटिंयों का तो बोझा बोझा लगभग पांच सात फीट व्यास बराबर के टुकड़े कहीं कहीं पेड़ों में अटके थे तो कहीं कहीं पानी में बह रहे थे ।
हमारे साथ चले रहे एक सैनिक नें हमें बतलाया कि कल ऐसा ही एक छोटा चींटी का टीला बचाव दल के नाव से टकरा गया था जिससे करोड़ों चींटिंयां नाव में आ गई थी, सैनिकों की सहनशक्ति व बहादुरी के कारण नाव डूबते डूबते बची। उस नाव में सवार पांचों सैनिकों को चीटियों नें जगह जगह काट लिया है और उनका शरीर सूज गया है जिनका कैम्प में इलाज चल रहा है । उसने बतलाया था कि नाव जब चीटिंयों के बहते ढेर से टकराई तो वह ढेर टुकड़ों में बंट गया और एक हिस्सा उछलकर नाव में सैनिकों के उपर आ गिरा था, सैनिकों नें अपने आप पर संयत रखते हुए शरीर में हलचल नहीं होने दी, जिसके कारण चीटिंया नाव में एक जगह इकत्र हो गईं बाद में फावड़े से उन्हें पानी में फेंका गया ।
आगे ऊंचे पीपल, बरगद, इमली, कौहा आदि के बड़े व फैले हुए पेंड़ पानी में डूबे थे जिसके बाजू से नाव के गुजरने से दिल धक से करने लगता था क्योंकि पानी में डूबे पेड़ों के आजू बाजू तेज बहाव के कारण भंवर पैदा होती है जो नांव को अपने ओर खींचती है। इधर बीच बीच में चार पांच इंट भ_ले थे पानी में डूबे होने के कारण इनकी चिमनियां व खपरैल अपना ठिकाना बता रहे थे साथ ही भूमि का कुछ पठारी हिस्सा भी नजर आ रहा था जिसमें कुछ मजदूर परिवार फंसे थे। पिछले तीन दिनों में सैनिक इन भ_लों से चार-पांच की संख्या में क्रमश: बहुतायत मजदूरों को सुरक्षित निकाल कर कैम्पों में ले गये थे पर कुछ हठी मजदूर अब भी वहां से बाहर नहीं आये थे उनकी जिद के कारण सैनिकों को उनकी सेवा के लिये खाने के पैकेट ले जाकर वहां देना था। नाव जब वहां पहुंची तब मजदूरों नें मुझे नाव पर देखकर आश्चर्य प्रकट किया। मैनें उन्हें समझाने की कोशिश की कि कैम्प में चले जाओं तुम लोगों के कारण नाहक प्रशासन को तुम्हारी चिंता करनी पड़ रही है, कैम्प में सारी व्यवस्था है पर वे नहीं माने। उनमें से एक मेरे हम उम्र ने तो यह कह कर बात समाप्त कर दी कि फोकटउवा गरमा गरम खाये ल मिलत हे दाउ, उंहा कैम्प के गिद्ध मसानी ले तो बने हे, हम जानत हन हमर डीह नई बूडय़ ।
यहां से होते हुए हम आगे बढ़े लगभग पांच किलोमीटर पानी में सफर उसके बाद मेरा गांव था हमारे नाव को अगले कैम्प तक लगभग दस गांव के लोगों तक सीमित खाने के पैकेट पहुंचाने थे एवं गस्त कर वापस जेवरा में कैम्प कर रही पार्टी से मिलकर वापस आना था । नाव में बैठे कोतवाल नें बताया कि मेरे गांव में उस समय लगभग 200 परिवारों की आबादी रही होगी जिसमें से लगभग बीस परिवार ही गांव में रह गये थे बाकी पानी के बढऩे के पहले ही मवेशियों व पालतू जानवरों के साथ पास के कीरितपुर कैम्प में चले गये थे। हम आगे बढ रहे थे, चारो तरफ फैले पानी के महासागर के बीच गांव का कुछ हिस्सा नजर आ रहा था जो धीरे धीरे नजदीक आ रहा था और मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी, अपनों से ऐसी विषम परिस्थिति में मिलने की उत्कंठा चरम में थी।
दोपहर लगभग बारह बजे हम गांव के किनारे पहुंचे । दूर से नावों को आते देखकर गांव वाले उन छप्परों पर चढक़र इक_ले हो गये थे जहां पर नावों को धाराओं से बचाते हुए खड़ा किया जा सकता था। भीड़ में बुजुर्ग और लीडर मेरे बाबूजी ही थे, मुझे देखकर सबने आश्चर्य किया कि इतनी बाढ़ में कहां 'मरे बर गांव आ गेस’ । मैनें उन्हें बतलाया कि मैं तो सिर्फ आप लोगों के लिये दवाई लेकर आया हूं, मैं नावों के साथ ही वापस चला जाऊंगा। गांव में मेरे चचेरे भाई और भतीजे थे जो हम उम्र थे और मेरे लंगोटिया थे। उन लोगों नें मुझसे अनुरोध किया कि नावों की टीम अमोरा कैम्प से वापस इधर से होते हुए ही सिमगा जायेगी अत: तुम यहीं उतर जाओ वापसी में चले जाना, किंचित ना नुकुर के बाद मैं गांव में ही रूक गया और चारो नाव आगे की ओर बढ़ गए ।
अब मेरे साथ मेरा गांव था एवं मेरे मित्र थे, गांव चारो ओर से बाढ़ से घिरा हुआ था जिसमें तेज बहाव था। गांव की लगभग बीस डोंगियों का प्रभार बीस नवयुवकों के हाथ में था जिसमें से एक मुझे मिल गया था, बरसों से यह मेरे गांव की परिपाटी रही है कि जब गांव में बाढ़ आती है तो नदी के किनारे बसे मछेरे कुछ प्रतिष्ठित घरों के दरवाजों में एक एक डोंगियां बांध आते हैं ताकि हमें गांव में कहीं आने- जाने एवं दैनिक क्रियाकलापों से निवृत्ति के लिये आसानी हो, खतरा ज्यादा बढऩे से इन्हीं घरों के निर्देशों पर गांव वाले सुरक्षित स्थानों पर निकल जाते थे। पानी बढऩे पर गांव के मवेशियों एवं बुजुर्ग व बीमार व्यक्तियों को पास के ही पानी से अप्रभावित गांव किरितपुर में पैदल चलने लायक पानी को पार कर शिफ्ट कर दिया जाता रहा है। एक दो बार तो पानी ज्यादा बढऩे के बाद ही हमारी गायें वापस हमारे घर आ गई थीं जिन्हें हमने नाव से सूखे जगह में पुन: खदेड़ा था।
जिस स्थान से हमारे गांव के लोग किरितपुर जाते हैं उस स्थान में लगभग 200 मीटर का ऐसा स्थान है जहां गांव में पानी चढ़ जाने के बाद ही पानी चढ़ता है। बाढ़ के दिनों में इस स्थान पर दो नालों का पानी एक दूसरे से मिलने के लिये जिस तरह से आतुर नजर आते हंै उसे मैं सदैव याद करता हूं क्योंकि इस दृश्य को देखने के लिये मैंने घंटों वहां बैठकर इस क्षण का इंतजार किया है। दोनों नालों को धीरे धीरे अपना जलस्तर बढ़ाते हुए इंच इंच बढ़ते, फुट से मीटर तक का फासला तय करते, सदियों से दो बिछड़ों के मिलन की इस दौड़ को मैंने देखा है जो पूरे वेग के साथ एक- दूसरे को आलिंगनबद्ध करती हैं, इन रोमांचकारी क्षणों को मैं ताउम्र विस्मृत नहीं कर पाता हूं ।
दोनों के आलिंगनबद्ध होने और उस सुरक्षित स्थान पर जलस्तर कमर तक भरने के बाद वहां से गुजरना मुश्किल हो जाता है उसके बाद ही नदी गांव को अपने आगोश में लेते हुए बहने लगती है फिर खतरा बढ़ जाता है, पर हमने बरसों इसे यूंही उफान में आते और दो चार दिन में वापस जाते देखा है, इस कारण इससे भय नहीं लगता ।
जब मैं गांव पहुंचा तब स्थितियां इससे भी आगे निकल गई थी। गांव के सभी दो तीन पक्के मकानों में शरण लिये हुए थे जिसमें एक मेरा घर भी था। एक एक कमरों में पचास पचास लोग रह रहे थे, सामुहिक रसोई पकाई जा रही थी। मेरे घर का सब सामान अस्त व्यस्त था, लोगों को जमीन ज्यादा उपलब्ध कराने के लिये कुर्सियां व पलग हटा ली गई थी। बंद पड़े बिजली के बोर्ड को गांव के बच्चे 'टूडूडूंडूं.......’ करते हुए इस तेजी से ऑफ- ऑन कर रहे थे जैसे वे बैंजों या हारमोनियम बजा रहे हों। इन सबके लिये गरियाना वक्त के अनुसार उचित नहीं था। इतना तो मैं बचपन से देखते आ रहा हूं कि जब जब बाढ़ आती है तब तब गांव भेदभाव छोडक़र एक हो जाता है, दिल से दिल मिल जाते हैं और हमें अपना दायित्व पूरा करने का भी पूरा अवसर मिल जाता है जिसमें हमारा पूरा परिवार बरसों तक आत्मिक संतुष्टि महसूस करता है। यह हमें परंपरा से मिलती आई सीख है जिसे हमने स्वाभाविक तौर से ग्रहण किया है ।
मेरे गांव में अधिकांश घर मिट्टी के हैं एवं 200 घरों की संख्या वाले गांव के सभी घरों का ग्राउंड लेबल गलियों से लगभग चार पांच फुट ऊपर है, नींव में पत्थरों की जुड़ाई है ऊपर मिट्टी, खपरैल व फूस के छप्पर हैं। अपनी- अपनी औकात व पसंद के अनुसार सभी के घर हैं किन्तु सभी घरों में एक चीज अवश्य है और वह है दो घरों के बीच के दीवालों पर एक तीन-चार फुटा मिट्टी का आला जिसे आलमारी के रूप में लकड़ी से पार्टीशन कर बनाया गया है। बचपन में जब मैं अपने बाबूजी से एक समान होने पर प्रश्न करता था तो बाबूजी कहते थे कि यह इमरजेंसी एक्जिट है जैसे बसों और ट्रेनों में होती है, तब मुझे समझ में ही नहीं आता था कि इस इमरजेंसी एक्जिट की घरों में क्या आवश्यकता है किन्तु जैसे- जैसे मैं बड़ा होता गया इस इमरजेंसी एक्जिट का कमाल देखता गया। जैसे ही बाढ़ का पानी गलियों में भरकर आवाजाही को बाधित कर देता है, घरों-घर इस इमरजेंसी एक्जिट को फोड़ दिया जाता है और एक-दूसरे के घरों से होते हुए पूरा गांव एक संयुक्त आवास में तब्दील हो जाता है। जब मैं वहां पहुंचा तब यह इमरजेंसी एक्जिट ओपन था, कहीं कहीं पानी का स्तर दीवार में लगे पत्थरों से भी उपर चढड गया था इसलिये मिटटी के दीवार ढह रहे थे फलत: मिट्टी के घर वालों ने पक्के मकानों को अपनी शरणस्थली बना लिया था, जिसको जो समेटते बना समेट कर एक जगह सिमट गये थे, अनाज की बोरियों को यहां से वहां शिफ्ट किया जा रहा था, कईयों का रोना भी चल रहा था कि वे तो अनाज को सुरक्षित जगह पर रख ही नहीं पाये थे कि पानी चढ़ आया।
मैं अपने मित्रों के साथ अपनी डोंगी में गांव की गलियों के भ्रमण के लिये निकल गया, ऐसे जैसे पेरिस की सडक़ों पर भ्रमण कर रहा हूं। पर यह भ्रमण बहुत खतरनाक था क्योंकि गलियों में भरे पानी व बहाव से दीवारें धाड़- धाड ़गिर रहीं थीं और पानी में भीषण हलचल मचा रहीं थीं। नाव चलाने में मैं अपने भाईयों से कम प्रवीण हूं इसलिये मेरे मित्र व भाई मुझे नाव नहीं चलाने देते। गांव के ही किसी लडक़े को मेरी सेवा में लगा देते हैं और कहते हैं कि तू बस बैठा रह ड्राईवर सहित कार मिला है तूझे क्योंकि तू बड़े दाऊ (मेरे पिताजी मेरे मालगुजार दादाजी के बड़े बेटे हैं) का छोटा बेटा है ना 'छोटे दाऊ’। मैं उनकी बातों को खूब समझता हूं और जिद कर पतवार उनके हाथों से छीन कर नाव चलाता हूं। मेरे इसी जिद के कारण मेरी नाव उस दिन पलटते पलटते बच गई और मैं पानी में कूद गया, नाव के सामान्य होते ही मैं पुन:उस पर आ गया। बड़े देर तक हा हा ही ही चलते रही तब तक आसमान में हेलीकाप्टर मंडराने लगा था। छतों में पहुचकर बच्चे हाथ हिलाने लगे। देखते ही देखते हेलीकाप्टर से बोरियों में कुछ गिराया जाने लगा जो लोगों के छप्परों को फोड़ते हुए गिर रहा था। कई बोरे सीधे पानी में भी गिर रहे थे। लोग इमरजेंसी एक्जिट से 'बुलुंग बुलुंग’ दौड़ दौड़ कर बोरों को 'सकेलने’ लगे। यहां मैनें पहली बार सरकारी सहायता पाने के बाद लोगों के मनों में वैमनुष्यता को पनपते देखा और उन बोरों को छुपाते, छीनते-झपटते देखा। इन बोरों में पूरी-सब्जी, इलेक्ट्राल पाउडर व दवाईयों के पैकेट थे जिसकी आवश्यकता सभी को थी किन्तु राहत सामाग्री सीमित थी। हमने लोगों से कहा भी कि सभी बोरियों को एक जगह इक_ला कर मिल बांट कर खाओ पर लोग नहीं माने। यह क्रम अगले चार दिनों तक चलता रहा।
शाम को सैनिकों के नाव गांव नहीं आये, शायद वे नदी के उस पार से होते हुए सिमगा की ओर निकल गए थे। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा, मुझे इस बाढ़ में गांव वालों के साथ, अपने मित्रों के साथ रहने को जो मिल रहा था। मेरी मॉं बता रही थी कि शिवनाथ नें लगभग बीस वर्ष पहले इतने जल स्तर को छुआ था उस वक्त मैं लगभग पांच-छ: वर्ष का था, वे बताती हैं तब मैं गलियों में, बाढ़ के पानी में बहते और अपनी प्राण रक्षा के लिये घरों में घुसते सांपों व चूहों को छोटे से लकड़ी के डंडे से पानी में वार कर भगाता था। उस समय की बातें तो मुझे याद नहीं हैं किन्तु इसके बाद के इससे कुछ कम जलस्तर के कई बाढ़ों का सामना मैंने किया है । तीन दिन बाद जलस्तर कम होने लगा और चौथे दिन नदी अपने किनारों में सिमट गई पर उसके बाद जो मंजर हमने देखा वो दिल दुखाने वाला था, हालांकि किसी भी प्रकार से जान की क्षति नहीं हुई थी किन्तु माल की क्षति सामने नजर आ रही थी। 90 प्रतिशत घरों का नामों- निशान मिट गया था । गांव के नाम पर सिर्फ कुछ मकान बचे थे बाकी सब सफाचट था। खपरैल व फूस के छप्पर गांव से दूर बहकर कहीं कहीं जमीन में पसरे पड़ थे। मवेशियों की फूली हुई लाशे यहां वहां अटकी पड़ी थीं, किसानों की गाडिय़ां भी इधर उधर बह कर अटकी पड़ीं थीं। चारो ओर फसल और घांस के सडऩे की तेज गंध फैली थी। इंट- भ_ले वाले का एक ट्रक भी बहुत दूर नाले में बहते हुए धंसा-फंसा था। मैं स्थिति सामान्य होते तक दो दिन और गांव में रहा, इस बीच पटवारी, गांव में हुए सम्पत्ति के नुकसान का आकलन करने आ पंहुचा था और जुगाड़- तोड तथा लेन देन की बातें तय होने लगी थी । मैं गांव वालों के चेहरों पर दुख की अमिट छाप के बावजूद फिर से उठ खड़े होने की ललक को देखकर वापस भिलाई आ गया ।
हालांकि मेरे गांव वालों को उठ खड़े होने में लगभग दो तीन साल लगे किन्तु किसी भी की जान नहीं गई। कोसी नें तो हजारों को लील लिया है भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे एवं बाढ़ में फंसे या प्रकोप से पीडि़त लोगों को इस विभीषिका से निबटने की शक्ति प्रदान करे ।

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