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Jun 5, 2021

आलेख- दुःख की गठरी

-अरुण शेखर

नमस्कार कैसे हैं आप सब! इस सवाल के जवाब में हो सकता है आप कहें ठीक है... पर ये समस्या... वो समस्या वगैरह वगैरह। या फिर बिल्कुल नाराज़ हो जाएँ और भड़ककर कहें- कुछ भी ठीक नहीं चल रहा। या यह कह सकते हैं कि-भगवान की कृपा है, जैसे वह रख रहा वैसे हैं

यह सारे जवाब इस बात पर निर्भर करते हैं कि ज़िंदगी को देखने का आपका नज़रिया क्या है। ज़िंदगी को किस तरह से आपने समझा है। अब देखिये परेशानियाँ तो सबके पास हैं चाहे कोई गरीब हो या अमीर। किसी के पास बहुत पैसा है तो हमें लगता है, उसे क्या समस्या हो सकती है, अपनी ज़िंदगी में वह बहुत प्रसन्न होगा, सुखी होगा। वह कहावत आपने सुनी है न दूर के ढोल सुहावने होते है। ऐसा ही कुछ मामला होता है। दूर से सब अच्छा लगता है, पास ग तो पाएँगे दुःखी सभी हैं। फिल्म अमृत का एक गाना है जिसे आनंद बख्शी ने लिखा है-

        दुनिया में कितना ग़म है।

        मेरा ग़म कितना कम है।

        औरों का ग़म देखा तो,

        मैं अपना गम भूल गया।

फिल्मी गाना कहकर आप इसे खारिज नहीं कर सकते। जीवन की बहुत बड़ी सच्चाई है, बहुत बड़ा जीवन दर्शन छिपा है इस गीत में।

सुख- दुःख को लेकर एक बोधकथा याद आ रही है-

एक बार भगवान् बुद्ध एक गाँव में उपदेश दे रहे थे। वहाँ पर एक धनाड्य व्यक्ति बुद्ध के उपदेश सुनने आया। उपदेश सुनकर उसके मन में एक प्रश्न पूछने की जिज्ञासा हुई; परन्तु सबके बीच में प्रश्न पूछने में उसे कुछ संकोच हुआ, क्योंकि उस गाँव में उसकी बहुत प्रतिष्ठा थी और प्रश्न ऐसा था कि उसकी प्रतिष्ठा दाँव पर लग जाती। इसलिए वह सबके जाने की प्रतीक्षा करने लगा। जब सब लोग चले गए, तब वह उठकर बुद्ध के पास आया और अपने दोनों हाथ जोड़कर बुद्ध से कहने लगा

प्रभु मेरे पास सब कुछ है। धन, दौलत, पद, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य किसी चीज की कोई कमी नही है, फिर भी मैं प्रसन्न नही हूँ। हरदम प्रसन्न रहने का रहस्य जानना चाहता हूँ।

बुद्ध कुछ देर तक चुप रहे और फिर बोले, ‘तुम मेरे साथ जंगल में चलो मैं तुम्हें प्रसन्न रहने का रहस्य बताता हूँ।
ऐसा कहकर बुद्ध उसे साथ लेकर जंगल की तरफ बढ़ चले। रास्ते में बुद्ध ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस व्यक्ति को देते हुए कहा, इसे पकड़ो और चलो।
वह व्यक्ति पत्थर उठाकर चलने लगा। कुछ समय बाद उस व्यक्ति के हाथ में दर्द होने लगा, लेकिन वह चुप रहा और चलता रहा। जब चलते हुए काफी समय बीत गया और उस व्यक्ति से दर्द सहा नहीं गया, तो उसने बुद्ध को अपनी परेशानी बताई।
बुद्ध ने उससे कहा– ‘पत्थर नीचे रख दो।’ पत्थर नीचे रखते ही उस व्यक्ति को बड़ी राहत महसूस हुई।
तभी बुद्ध ने समझाया
यही प्रसन्न रहने का  रहस्य है।
उस व्यक्ति ने कहा-‘भगवान मैं कुछ समझा नहीं।
बुद्ध बोले, ‘जिस प्रकार इस पत्थर को कुछ समय तक हाथ में रखने पर थोड़ा सा दर्द, एक घण्टे तक रखने पर थोड़ा अधिक दर्द, और बहुत समय तक उठाए रखने पर तेज दर्द होता है, उसी तरह दुःखों के बोझ को हम जितने ज्यादा समय तक अपने कन्धों पर उठाए रखेंगे, उतने ही अधिक दुःखी और निराश रहेंगे।’ यह हम पर निर्भर करता है, कि हम दुःखों के बोझ को कुछ पल तक उठाए रखना चाहते हैं या जीवन भर। अगर प्रसन्न रहने की आकांक्षा हो तो दुःख रूपी पत्थर को शीघ्र से शीघ्र नीचे रखना सीखना होगा। सम्भव हो तो उसे उठाने से ही बचना होगा।
समझे न आप, हम सभी यही करते हैं। अपने दुःखों के बोझ को ढोते रहते हैं। मैंने अपने जीवन में कई लोगों को कहते सुना है-
उसने मेरा इतना अपमान किया कि मैं जिन्दगी भर नहीं भूल सकता।’

वास्तव में अगर आप उसे नही भूलते हैं, तो आप स्वयं को ही कष्ट दे रहे हैं।
वो तो आप का अपमान करके भूल भी चुका होगा; लेकिन आप उसका बोझ ढो रहे हैं।
दुःखों से मुक्ति तभी सम्भव है जब हम दुःख के बोझ को अपने मन से जल्द से जल्द निकाल दें और इच्छाओं से रहित होकर या जो है उसमें संतोष कर प्रसन्न रहें।
याद रखिये प्रत्येक क्षण अपने आप में नया है और जो क्षण बीत चुका है उसकी कड़वी यादों को मन में सँजोकर रखने से बेहतर है कि हम अपने वर्तमान क्षण का पूर्णरूप से आनन्द उठाएँ; इसलिए हर परिस्थिति में प्रसन्न रहना सीखिए। 

जब तक आप दुःख में डूबे रहते हैं, इसको अपने गले से लगाकर रखते हैं, यह आपसे चिपका रहता है। जिस क्षण आप इससे छुटकारा पाने का विचार कर लेते हैं, उसी क्षण से आप सुख की राह पर अग्रसर हो जाते जाते हैं। जैसे कि अँधेरे की बातें करने से अँधेरा नहीं मिटता। अगर आपको अँधेरा मिटाना है, तो प्रकाश के विषय में सोचना पड़ेगा, उसकी व्यवस्था करनी पड़ेगी। अँधेरा भगाना नहीं प्रकाश को लाना है, अँधेरा स्वयं गायब हो जागा। देखा जाए, तो अंधकार कुछ भी नहीं, प्रकाश की अनुपस्थिति है, उसी प्रकार दुःख कुछ भी नहीं सुख का अभाव है। इसलिये अपनी र्जा दुख से दुःखी होने में लगाने की बजाय सुख को जगाने में लगाइए।

मोबा. 9820160760

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