May 15, 2018

संस्मरण

पेपर लीक
- डॉ॰ बलराम अग्रवाल
ग्यारहवीं कक्षा की बात है। शिव कुमार गुप्ता जी हमें भौतिक शास्त्र पढ़ाया करते थे। वह युवा थे और एम एस-सी पास करने के तुरन्त बाद ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षाओं को पढ़ाने के काम में लग गए  थे। हम किंचित शरारती थे, लेकिन पढ़ने-लिखने में ज्यादा बुरे नहीं थे; सो कुछ ही समय में शिव कुमार जी से रिश्ता छात्र और शिक्षक मात्र का न रहकर मित्र-जैसा बन गया था।
वह ट्यूशन नहीं पढ़ाते थे। क्लास में कह रखा था--जिसे कोई परेशानी हो, घर आकर भी उनसे पूछ सकता है। न्युमरिकल आदि के हल पूछने के लिए हम यानी मैं और मेरा दोस्त किशन (इन दिनों वह सुप्रसिद्ध कर्मकांडी व ज्योतिषाचार्य पं. कृष्ण कुमार शर्मा के रूप में ख्यात है), अक्सर जाते ही रहते थे। परीक्षा के दिनों में किसी सूत्र से पता चला कि पेपर इस बार शिव कुमार जी ने सेट किया है। बस, किताब उठाकर एक शाम जा पहुँचे उनके घर और उनके स्टडी रूम में जा बैठे। खबर अन्दर पहुँचा दी।
''पूछो, क्या पूछना है।'' अपने कमरे में हमें बैठा देखते ही शिव कुमार बोले।
''इस बार का पेपर तो आपने सेट किया है।'' हमने सीधे-सीधे अपनी बात कही।
''हाँ, किया तो है, लेकिन याद नहीं है कौन-कौन से सवाल पेपर में लिखकर दिए हैं।'' उन्होंने सहज भाव से कहा।
''कोई बात नहीं, आप अपनी तरफ से 5 सवालों पर निशान लगा दीजिए,बस।'' अपनी किताब उनके आगे सरकाकर हमने कहा।
''और, उनमें से एक भी नहीं आया तब।'' किताब की ओर देखे बिना उन्होंने पूछा।
''ऐसा हो नहीं सकता कि उनमें से एक भी न आए। आप निशान लगा दीजिए।''
हमारी जिद से हारकर उन्होंने किताब अपनी ओर खिसका ली और पन्ने पलट-पलटकर निशान लगा दिए। फिर कहा, ''इन 5 के ही भरोसे मत रहनाअपनी तरफ से भी कुछ पढ़ लेना।''
''जी।'' हमने कहा और उछलते-कूदते घर वापस आ गए । देर रात तक बैठकर हमने उन पाँच प्रश्नों को अच्छी तरह खरल किया और घोंटकर पी गए । अगली सुबह हम दोनों जितना तरोताजा कोई तीसरा लड़का नहीं रहा होगा, यह निश्चित है।
दही-पेड़ा खाकर स्कूल गए। क्लास-रूम में पहुँचे। कॉपी ली। नाम और रोल नम्बर वाले कॉलम भरे। पर्चा पकड़ा। पढ़ा और बेहोश होकर डेस्क पर ढह गए ।
शिव कुमार जी द्वारा बताया हुआ एक भी सवाल उसमें नहीं था।
भला हो उनकी उस सलाह का कि 'इन 5 के ही भरोसे मत रहनाअपनी तरफ से भी कुछ पढ़ लेना।' हमने अपने अनुमान से भी कुछ इम्पोर्टेंट चीजें पढ़ ली थीं, सो पास हो गए।
परीक्षा-काल के बाद, अकेले में शिव कुमार जी को इस दुर्घटना से परिचित कराया। चिर-परिचित सहज स्वर में बोले--''क्लास में जो पढ़ाता हूँ, उसे ध्यान से सुना करो। इम्पोर्टेंट पर निशान लगवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।''
उनके जितना सरल अध्यापक आज भी भुलाए नहीं भूलता, जो हम जैसे चपल छात्रों के मुँह से अपनी शिकायत सुनकर लेशमात्र भी क्रोधित नहीं हुआ था। जिसे अपना ही बनाया पेपर लीक करना नहीं आता था। भूल जाता था कि उसने लिफाफे में बन्द करके प्रिंसिपल को क्या दिया है। भूल तो आज के अध्यापक भी जाते होंगे, लेकिन रख-रखाव वाली मशीनरी अब काफी विस्तार पा गई है, उसका क्या किया जाए।
इधर हमने बारहवीं पास करके स्कूल छोड़ा, उधर एकाध साल बाद उन्होंने भी नौकरी छोड़कर घर का कारोबार सँभाल लिया था और बुलन्दशहर छोड़कर लुधियाना जा बसे थे। निरी अध्यापकी में उन दिनों रखा भी क्या था।
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