October 24, 2017

बगुला पत्नी

             बगुला पत्नी 

             - डॉ. अर्पिता अग्रवाल
एक गड़रिया  था। सीधा-सीधा, भोला-भाला। प्रतिदिन वह अपनी भेड़-बकरियाँ चराने पहाड़ी पर जाता था।  गड़रिया  अत्यंत मुश्किल से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाता था। जीवन कठिनाई से बीत रहा था लेकिन  गड़रिया  खुश रहता था। एक दिन उसे रास्ते में एक घायल बगुला मिला। बगुले को एक तीर लगा हुआ था। दयालु  गड़रिया  उस बगुले को अपने घर ले आया। उसका उपचार किया और धीरे-धीरे बगुला ठीक हो गया।
वह बगुला स्वर्ग की अप्सराओं का था। ठीक हो जाने पर बगुला अपने देश जाने की सोचने लगा लेकिन जाने से पहले वह अपने ऊपर किये गए उपकार का बदला चुकाना चाहता था।
एक दिन जब  गड़रिया  अपनी भेड़ बकरियाँ चरा कर घर लौटा तो उसे घर में एक सुंदर स्त्री मिली। बगुले जैसे उजले रंग वाली स्त्री को देखते ही गडरिये ने पूछा- तुम कौन हो और यहाँ कैसे आयी हो?’ स्त्री ने बताया कि वह बहुत दूर से आयी है। उस स्त्री ने गडरिये से विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे गडरिये ने स्वीकार कर लिया और दोनों ने विवाह कर लिया। एक दिन गडरिये की पत्नी ने गडरिये को बताया कि वह बहुत सुंदर रेशम का कपड़ा बना सकती है और उस रेशम को बेच कर बहुत पैसे कमाये जा सकते हैं।
गडरिये ने कहा- क्या तुम सचमुच ऐसा कर सकती हो?’ स्त्री बोली-हाँ, लेकिन एक शर्त है कि मैं रात को एक अलग कमरे में कपड़ा बुनूँगी और मुझे रेशम बनाते हुए कोई न देखे। यदि ऐसा हुआ तो मैं वापिस अपने देश चली जाऊँगी।गड़रिया  मान गया। उस रात पत्नी ने एक अलग कमरे में रेशम का कपड़ा बुनना आरम्भ किया। सुबह उसने गडरिये को रेशम का अत्यंत सुंदर कपड़ा दिया। वह कपड़ा बाज़ार में ऊंचे दामों पर बिका। गडरिये को बहुत पैसे मिले। इस तरह प्रत्येक दिन गड़रिये की पत्नी गड़रिये को रेशम का कपड़ा देती और  गड़रिया  उसे बाज़ार में बेच आता।
 गड़रिया  धीरे-धीरे बहुत अमीर बन गया। उसने भेड़- बकरी चराने के लिए कई आदमी रख लिए। अब वह एक महलनुमा घर में रहने लगा। एक दिन गड़रिये की इच्छा हुई कि वह देखे कि पत्नी रेशम कैसे बनाती है।
उसने रात को छुपकर कमरे में एक झरोखे से देखा तो दंग रह गया कि एक बगुला अपने परों से धागा निकालकर रेशम बुन रहा था ,लेकिन तभी बगुले ने रेशम बनाना छोड़ दिया और बोला- आज तुमने मुझे देख लिया मैं ही तुम्हारी पत्नी बनकर रह रहा था अब मैं अपने देश चला जाऊँगा। मैंने तुम्हारे उपकार का बदला चुकाने के लिए ही स्त्री का रूप धारण किया था।
गडरिये ने बगुले को बहुत रोकना चाहा ;लेकिन बगुला अपने देश उड़ चला मानो बगुला इस इंतज़ार में ही था कि कब  गड़रिया  गलती करे और कब उसे अपने देश लौटने का मौका मिले।
सम्पर्क: काकली भवन’, 
20-बी/2, साकेतमेरठ- 250003,
Email- fca.arpita.meerut@gmail.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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