December 25, 2016

अनकही

सच्चे और खरे
अनुपम जी
     - डॉ. रत्ना वर्मा
अनुपम जी से मैं कभी नहीं मिली हूँ, पर मुझे कभी ऐसा लगा ही नहीं कि मैं उनसे नहीं मिली, पिछले तीन- चार वर्षों में शायद तीन या चार बार फोन पर उनसे बात करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। कभी उनके लेखों के संदर्भ में तो कभी उनकी किताबों के बारे में, तो कभी उनकी पत्रिका गाँधी मार्ग के बारे में। वे हर बार इतनी आत्मीयता और इत्मीनान से बात करते थे कि मैं चकित रह जाती थी। यह सोचकर कि इतने व्यस्त और इतने बड़े- बड़े काम करने वाले अनुपम जी मुझ अनजान से इतनी उदारतापूवर्क कैसे बात कर लेते हैं, ऐसे जैसे उनसे बरसो का नाता हो। और यह सच भी है, वे सबके साथ ऐसे ही आत्मीय नाता बनाकर चलते रहे। उनके जानने वाले उनके इस स्वभाव के बारे में बहुत अच्छे से जानते हैं।
पहली बार अपनी पत्रिका उदंती के लिए उनके लिखे लेखों के प्रकाशन के लिए जब मैंने अनुमति चाही , तो उन्होंने पूछा कि आपने 'आज भी खरे है तालाबपढ़ी है, जब मैंने कहा पुस्तक तो नहीं पर उसके कई अंश मैंने पढ़े हैं; जो विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं और वेब पेजों पर प्रकाशित हुए हैं। तब उन्होंने कहा कि मैं आपको य पुस्तक भिजवाता हूँ और साथ ही गाँधी शांति प्रतिष्ठान की गाँधी मार्ग भी। उदंती में प्रकाशन के संदर्भ में उन्होंने कहा कि मेरी यह किताब तो कॉपी राइ से मुक्त है। आप जो चाहे जितना चाहे प्रकाशित कर सकती हैं। उनके इतना कहते ही मैं अभिभूत हो गई। मुझे कुछ कहते ही नहीं बना, न ही मैं शुक्रिया के दो शब्द ही कह पाई। मेरा शुक्रिया कहना बहुत छोटा शब्द होता। सच कहूँ तो पुस्तकें भेजकर वे मुझ पर आशीर्वाद बरसा रहे थे और मैं नतमस्तक होकर उन्हें स्वीकार रही थी, नि:शब्द।
कुछ समय बाद ये दोनों किताबें मेरे पास डाक से पँहुच गईं। मैंने तुरंत उन्हें फोन करके प्राप्ति की सूचना दी, तब मैं अपने आपको यह कहने से रोक नहीं पाई कि आपने मुझे इस लायक समझा मैं आभारी हूँ आपकी। दोनों पुस्तकें पाकर मैं धन्य हो गई। वे हँ दिए और कहा कि आप अपनी पत्रिका के माध्यम से देश के पर्यावरण को पानी को बचाने की दिशा में काम कर रही हैं ,यह देश के लिए आपका अमूल्य योगदान है। जिस तरह मेरा लिखा आप पढ़ रही हैं और उसे अपनी पत्रिका के माध्यम से लोगों तक पँहुचा रही हैं, वह आपका बहुत बड़ा काम है और इस उपक्रम से यदि एक व्यक्ति भी जागरूक होता है , तो यह देश के प्रति आपका बड़ा योगदान होगा। तब उन्होंने अपनी एक और किताब जो पेंगुइन प्रकाशन की है- साफ माथे का समाजके बारे में भी जानकारी दी, जिसे मैंने बाद में खरीद लिया। फिर एक-दो बार उनसे बात हुई और मैंने आज भी खरे हैं तालाब के अलावा उनके प्रकाशित अन्य लेखों के लिए प्रकाशन की अनुमति चाही तो वे बोले मेरा लिखा आप हमेशा छाप सकती हैं। हम जो लिखते हैं वह ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें यही हमारी मंशा होती है। हम लिखते ही इसीलिए हैं, मना करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। तो ऐसे थे अनुपम जी।
उनकी इन बातों ने मेरे मन में नया उत्साह और नई र्जा भर दी। मैं सोचने लगी -जब अनुपम जी फोन पर बात करके इतनी प्रेरणादायी बाते करते हैं, तो उनसे मिलना, उनसे रूबरू होना कितना उत्साहजनक होता होगा। यूट्यूब में विभिन्न स्थानों पर उनके द्वारा दिए गए व्याख्यानों को सुनने से ही समझ में आ जाता है कि उनके शब्द कितने सच्चे, खरे और प्रेरक होते हैं। उनसे न मिल पाने का असोस तो रहेगा ही, पर इस बात का संतोष भी है कि मैं उन चंद लोगों में से हूँ, जिसे उनसे बात करने का अवसर मिला।
 पर्यावरण और खासकर पानी संरक्षण पर लिखे और बोले गए उनके विचारों ने मुझे हमेशा ही प्रभावित किया है। मैं जितना उन्हें पढ़ती गई ,उतना ही उनके लिए आदर और सम्मान का भाव उठता, कि हमारे पास इतनी अच्छी सोच और इतना अच्छा रास्ता दिखाने वाला व्यक्ति मौजूद है, जो हमें अपने अध्ययन, अपने शोध के आधार पर उस जमाने में ले जाते हैं ,जब आज जैसे न आधुनिक साधन थे न ऐसी तकनीक, पर फिर भी पानी बचाने के जो तरीके और पर्यावरण की रक्षा के जो उपाय हमारे पुरखे करते थे, वे आज के मुकाबले कहीं ज्यादा कारगर और पर्यावरण के संरक्षक उपाय थे। वे हम सबको यही बताने की कोशिश करते रहे कि हम परम्परागत जल- संरक्षण के उपाय को अपनाकर ही पीने के पानी की समस्या से उबर सकते हैं। वे ये सारे काम बिना हो-हल्ला किए चुपचाप करते चले जा रहे थे। जन -चेतना जगाने का उनका तरीका सबसे अलग था।
 जब उदंती के संस्मरण अंक की तैयारी कर रही थी तब, पिता भवानी प्रसाद मिश्र पर उनका लिखा एकमात्र संस्मरण उदंती में प्रकाशित करने की अनुमति हेतु जब मैंने फोन किया ,तो उनसे बात नहीं हो पाई। मुझे उनके सहयोगी ने बताया कि वे बीमार हैं और अस्पताल में हैं। मैंने उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की और उदंती के जनवरी 2016 के संस्मरण अंक  के प्रकाशन के बारे में जानकारी दी।  उन्होंने कहा -आप उनका संस्मरण प्रकाशित कर सकती हैं, हाँ अंक अवश्य भिजवा दीजिएगा। तब मैंने कल्पना भी नहीं कि अनुपम जी की बीमारी इतनी गंभीर होगी और 19 दिसम्बर को उनके न होने की दुखद खबर मिलेगी।  दिल को जबरदस्त सदमा लगा। उन्हें तो अभी बहुत कुछ करना था, आज के युवाओं को बताना था कि अपने देश के पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। अभी बहुत कुछ करना है। अब हम सबके सामने एक प्रश्न खड़ा हो गया है कि कौन अब दिखाएगा रास्ता।
 यह हम सबके लिए बेहद दुख: की बात है कि पर्यावरण के प्रति चिंता व्यक्त करने वाले अनुपम जी असमय ही हम सबको छोड़कर चले गए। पानी का रखवाला चला गया, लेकिन उनके विचार उनकी बातें, पानी और पर्यावरण पर उनकी चिंता उनके शब्दों के रुप में उनके किताबों में अब भी जिंदा हैं, जिनपर अमल करते हुए हमें आगे बढऩा है। पर्यावरण की रक्षा करनी है। अगर हम ऐसा कर पाए तो यही हम सबकी उनके प्रति सच्ची और खरी श्रद्धांजलि होगी। उदंती के इस अंक को सादर नमन के साथ मैं अनुपम जी को समर्पित कर रही हूँ, जो उनके द्वारा लिखे लेखों और वक्तव्यों पर आधारित है।                                                                                                      

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उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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