August 25, 2011

हिन्दी नाटकों के मंचक पंडित राधेश्याम बरेलवी

- डॉ. दीपेन्द्र कमथान

अहिल्या उद्धार स्थान से वापसी में सैकड़ों लोगों की भीड़ देखकर पंडित जी को बहुत आश्चर्य हुआ। स्टेशन मास्टर ने बताया कि यह सब आपके दर्शन एवं आपके श्रीमुख से रामायण सुनने आए हैं, पंडित जी ने कथा शुरु की और जिस टे्रेन से जाना था। वो भी गई। सैकड़ों पैसेंजर, ड्राइवर और गार्ड भी राम चर्चा के रसिक बन गए। टे्रन पूरे 45 मिनट स्टेशन पर खड़ी रही।
आये सखी री फागुन के दिन, फूली है कैसी ये बगिया आज... (शकुन्तला 1931), तू ही आधार सकल जल थल का, संचालक त्रिभुवन मंडल का... (श्री सत्यनारायण 1935), ये सुना है मैंने जादू है, राजा जी के पद पकंज में (खुदाई खिदमतगार 1937), उषा हरण (1940 कथा लेखन), हर हर महादेव का नारा, धरती से अम्बर तक छाया... (झांसी की रानी 1953), रतन हैं दो अनमोल हमारे, इधर सुदामा उधर कन्हैया... (कृष्ण सुदामा 1957) जैसे प्रसिद्ध हिन्दी फिल्मी गीतों, कथा, पटकथा एवं संवाद लेखक पंडित राधेश्याम कथावाचक उर्फ पं. राधेश्या बरेलवी का जन्म 25 नवम्बर 1890 को उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में हुआ था। उनके पिता पं. बांके लाल जी तुलसी रामायण बांचते थे। छोटी उम्र में ही पिता के साथ कथा बांचते- बांचते पं. राधेश्याम महर्षि वाल्मीकि एवं गोस्वामी तुलसीदास के समान अपनी राधेश्याम रामायण लेकर देश के प्रख्यात कथावाचक बन गए। आज पंडित जी की रामायण तो हर जगह उपलब्ध है परंतु उस समय तकनीकी अभाव के कारण पंडित जी का मधुर कंठ देशवासियों को उनके निधन के बाद सुनने को ना मिल सका।
विशुद्ध हिन्दी को रंगमंच पर लाने का श्रेय नाटकों को ही जाता है और पंडितजी द्वारा लिखित वीर अभिमन्यु नाटक से पहले शुद्ध हिन्दी भाषा में कोई भी नाटक रंगमंच पर नहीं खेला गया था। वीर अभिमन्यु के बाद परिवर्तन (1925 जिसमें एस डी बातिश ने साभिनय गायन किया था), मशरिकी नूर 1927, श्रवण कुमार 1928, ईश्वर भक्ति 1929, द्रौपदी स्वयंवर 1929, शकुन्तला, महर्षि वाल्मीकि, सती पार्वती आदि नाटकों से दर्शकों का मनोरंजन ही नहीं अपितु उनको भारतीय आदर्श एवं संस्कृति से भी रूबरू कराया।
नाटकों से प्रेम एवं फिल्म जगत की ओर पंडित जी के रुझान को देखते हुए उनके पिताजी ने उन्हें न्यू अल्फ्रेड कंपनी, जो उन दिनों अक्सर बम्बई से बरेली नाटक खेलने आया करती थी में भर्ती करा दिया। तब तक पं. राधेश्याम स्वयं गीत भी बांचने लगे थे। एक मुकदमे के सिलसिले में पं. मोतीलाल नेहरू एक बार बरेली पधारे। उन्होंने अपने मित्र राम स्वरूप वकील से किसी अच्छे कंठ वाले तुलसी रामायण कथावाचक की आवश्यकता जताई, उनकी पत्नी श्रीमती स्वरूप रानी जो उन दिनों बीमार थीं का मनोरंजन कर सके। तदस्वरूप मित्र के आग्रह पर दोनों पिता- पुत्र एक माह तक आनंद भवन इलाहाबाद में उनके निवास पर रहे। श्रीमती स्वरूप रानी आशीष देने के बाद बोलीं- जवाहर की भांति राधेश्याम भी मेरा बेटा है। एक देश भक्त है तो दूसरा राम भक्त। विजयलक्ष्मी पंडित जो उन दिनों छोटी थीं, कथा के बाद पं. राधेश्याम से अपनी पसंद का एक गीत अवश्य सुनती थीं। जवाहर लाल, जो पंडित जी से एक साल बड़े थे, ने कथा समाप्ति के बाद रामेश्वर भट्ट जी की टीका वाली तुलसी
रामायण पंडित जी को अपनी ओर से भेंट की। 1910-11 में पंजाब की नाटक कंपनी न्यू अल्बर्ट के मालिक बाबू नानक चंद खत्री ने उनकी ख्याति सुनकर उनसे भेंट की एवं अपने नाटक रामायण को संशोधित करने कहा पंडित जी के संशोधन के बाद न्यू अल्बर्ट की रामायण ने चारों ओर सफलता के झंडे गाड़ दिए। पंडित जी का लिखा यह गीत- अवध में है आनंद छाया, पुत्र कौशल्या ने जाया... तो घर- घर पहुंच गया था। इस रामायण नाटक में तत्कालीन मशहूर हीरो मास्टर निसार ने सीता का रोल किया था।
सन् 1911-12 में अपने बरेली प्रवास के दौरान पं. मदन मोहन मालवीय जी की आपसे भेंट हुई जो उन दिनों बनारस हिन्दू यूनीवर्सिटी के लिए धन एकत्रित करने के उद्देश्य से बरेली आए थे। तब पंडित जी ने अपनी सारी रायल्टी इस विश्वविद्यालय के लिए दान कर दी। पंडित जी के लिखे नाटक प्रहलाद एवं वीर अभिमन्यु का रंगमंच पर अद्भुत अभिनय देखकर गद्गद् कंठ, सजल नेत्रों एवं पुलकित हृदय से महामना मालवीय जी (जो बाद में पंडित जी के गुरु बने एवं गुरु दक्षिणा दी) ने आशीर्वाद देते हुए पंडित जी के लिए 'धन्य- धन्य होÓ कहा।
सन 1913 में आपकी मुलाकात न्यू अल्फ्रेड कंपनी के मालिक सोराब जी केरावाला से हुई। उन्होंने पंडित जी से उनका नाटक वीर अभिमन्यु ले लिया। वीर अभिमन्यु की प्रसिद्धी का आलम यह रहा कि इस नाटक का एक लाख बार से ज्यादा मंचन हो चुका है एवं यह नाटक पंजाब यूनिवर्सिटी में एम.ए. के कोर्स में शामिल किया गया।
नाटक प्रहलाद की सफलता ने पंडित जी को अहमदाबाद पहुंचा दिया। उन्होंने अपने नाटक वीर अभिमन्यु की एक प्रकाशित प्रति महात्मा गांधी को भेंट की। उसे लेकर गांधी ने कहा कि बीमारी में यह खूब मिली। इसे आज ही पढूंगा। साबरमती आश्रम में माता कस्तूरबा ने पंडित जी के बार- बार क्षमा मांगने पर भी वहां से भोजन कराके ही विदा किया।
पंडित जी की ख्याति, प्रेम एवं स्नेह का आलम यह था कि एक बार दरभंगा से जनकपुरी रोड जाते हुए कमतोल स्टेशन आया। कमतोल स्टेशन के करीब ही एक स्थान, जहां अहिल्या उद्धार हुआ था को देखने की इच्छा पंडित जी की धर्मपत्नी ने प्रकट की। फलस्वरूप वेटिंग रूम में सामान रखकर स्टेशन मास्टर को अपना परिचय दिया। इत्तेफाक से स्टेशन मास्टर के घर में पंडित जी की रामायण थी। अहिल्या उद्धार स्थान से वापसी में स्टेशन लौटने पर सैकड़ों लोगों की भीड़ देखकर पंडित जी को बहुत आश्चर्य हुआ। स्टेशन मास्टर ने बताया कि यह सब आपके दर्शन एवं आपके श्रीमुख से रामायण सुनने आए हैं, हाई स्कूल की छुट्टी कर दी गई है, दुकाने बंद करके लोग आ रहे हैं। बालहठ की जीत हुई, कथावाचक की कथा शुरु हो गई। जिस टे्रेन से जाना था वो भी आ गई। सैकड़ों पैसेंजर, ड्राइवर और गार्ड भी राम चर्चा के रसिक बन गए। टे्रन पूरे 45 मिनट स्टेशन पर खड़ी रही। पंडित जी की भक्ति से ही सराबोर हो जयपुर की संस्कृत रत्नाकर समिति ने उन्हें कीर्तन- कला निधि, गोवर्धन मठाधीश शिवलोकवासी वृद्ध स्वामी शंकराचार्य ने कवि रत्न और नेपाल सरकार ने कथा वाचस्पति से अलंकृत किया। हिन्दी नाटकों के मंचन से पंडित जी की ख्याति जब चारों ओर फैल रही थी, उस समय कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों ने पंडित जी को पूरी तरह विशुद्ध हिन्दी नाटकों तक सीमित बताते हुए उनके मर्म पर चोट की। पंडित जी ने तब एक नया नाटक मशरिकी नूर लिख कर प्रस्तुत किया जो बेहद सफल रहा था। पंडित जी ने इस नाटक में मुरादाबाद उत्तर प्रदेश के फिदा हुसैन नाम के लड़के को शामिल किया जो बाद में सुप्रसिद्ध गायक अभिनेता मास्टर हुसैन नरसी के नाम से विख्यात हुए और ताउम्र पंडित जी को अपना गुरु मानते रहे।
पंडित जी के नाटक ईश्वर भक्ति का उद्घाटन तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पं. मोतीलाल नेहरू ने किया था। इसी नाटक को देखकर मुंशी प्रेमचंद ने अपने उपन्यास गबन में राधेश्याम जी के बारे में लिखा है। रांची में पंडित जी की श्रीराम और भरत व्याख्यानमाला के दौरान वहां के एक उद्योगपति राधा बाबू (राधाकृष्ण बुधिया) ने पंडित जी से संपर् कर राधेश्याम रामायण को चलचित्र के रूप में पेश करने की इच्छा जाहिर की। पंडित जी ने उनकी इच्छा का आदर करते हुए अपनी रामायण की रामजन्म नाम से पटकथा तैयार की। इसी संबंध में पंडित जी ने श्री पृथ्वीराज कपूर से मिलकर फिल्म में रोल अदा करने की सहमति ली परंतु जो लागत जोड़ी, वो 6-7 लाख की थी। निर्देशक श्री केदार शर्मा से वार्ता के बाद लागत 1 लाख कम हो पाई। इसी क्रम में सुप्रसिद्ध निर्माता- निर्देशक श्री विजय भट्ट ने अपने नाम की गुडविल जोड़ते हुए खर्चा 15 लाख बताया। रोशनी की किरण उस समय दिखाई दी जब स्व. चंद्र मोहन ने इसमें रावण की भूमिका स्वीकार करते हुए अपना पारिश्रमिक फिल्म की रिलीज होने के बाद लेने को कहा एवं अपने रसूख से फिल्म को श्री चंदूलाल शाह के स्टूडियो में कम दामों में निकलवाने को कहा। फिर भी रकम का 4 लाख होना जरूरी था।
कुछ समय बाद पंडित जी ने कोल्हापुर पहुंच कर पूर्व परिचित श्री भालजी पेण्ढारकर से इस योजना पर चर्चा की परंतु खर्चा वही सामने आया। पूना पहुंचने पर पंडित जी ने दादा साहब तोरणे (सरस्वती सिनेटोन) से मिलकर दादा के माध्यम से श्री फत्तेलाल (प्रभात) से सारे प्रसंगों पर चर्चा की पर नतीजन खर्चा वही 6-7 लाख आंका गया। सन् 1947 में अपने शिष्य फिदा हुसैन को लेकर इसी संदर्भ में पंडित जी कलकत्ता रवाना हुए। वहां अपने परिचित बाबूलाल चौखानी (भारत लक्ष्मी पिक्चर्स), देबकी बोस एवं श्रीयुत लाहिड़ी जी से भी इसी विषय पर मिलना हुआ। चर्चा के बाद तय हुआ कि डायरेक्टर श्री रामेश्वर शर्मा इस फिल्म को 3 लाख में निकाल सकता है परंतु होनी को कौन टाल सकता है। अचानक पंडित जी की उखड़ी सांस एवं बरेली में पुत्र घनश्याम की लम्बी चली आ रही बीमारी ने पंडित जी को बरेली लौटने पर मजबूर कर दिया। नियति को शायद यह भी मंजूर न था, 3 अक्टूबर 1947 को प्रिय पुत्र घनश्याम का साथ छूट गया। पुत्र वियोग में पंडित जी का अधिकांश समय गंगा तट पर गुजरने लगा। अचानक श्री रामेश्वर शर्मा की देहांत की खबर आई और उधर श्री राधाबाबू भी शिवलोक को पलायन कर गए। पुत्र घनश्याम, डायरेक्टर रामेश्वर एवं फाइनेन्सर राधा बाबू के यकायक साथ छोडऩे के कारण पंडित जी की ऐतिहासिक एवं यादगार तस्वीर (फिल्म) को देखने का भारतवासियों का सपना अधूरा ही रह गया। गोल्डमोहर कंपनी ने पंडित जी का एक गाना- निर्बल के प्राण पुकार रहे ... गवाकर शूट किया। उस समय इस गीत को सुनने जद्दनबाई मय नरगिस आईं थीं। उल्लेखनीय है कि सहगल साहब और जद्दनबाई पंडित जी के कंठ को सुनने अक्सर उनके पास आया करते थे। परंतु ना तो वो फिल्म बन पाई, ना ही वो कंपनी रही। और इस तरह उनकी कोई भी स्मृति शेष नहीं रही।
यहां पाठकों को बताना चाहेंगे कि पुत्र वियोग को भुलाने एवं श्री सोहराब मोदी के बुलावे पर पंडित जी जब बम्बई पहुंचे तो मोदी साहब ने फिल्म झांसी की रानी के संवाद लिखने का आग्रह पंडित जी से किया। यद्यपि सोहराब मोदी इस फिल्म में कोई गीत नहीं रखना चाहते थे। फिर भी पंडित जी के कहने पर वो इसके लिए तैयार तो हो गए परंतु गीत बैकग्राउण्ड में ही रखे। नतीजा यह रहा कि फिल्म के गानों ने पूरे देश में अलख जगा दी। श्री मोदी से निकटता के कारण पंडित जी ने इस फिल्म के लिए कोई भी मेहनताना स्वीकार नहीं किया। ताउम्र पंडि जी अपने उसूलों से बंधे रहे। न्यू अल्फ्रेड कंपनी से जुड़े रहने के कारण उन्होंने प्रख्यात फिल्मकार हिमांशु राय के साथ बतौर लेखक जुडऩे के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था। पैसे को ठोकर मार कर नाट्य- लेखन विधा की सच्ची धुन और लगन लिए पं. राधेश्याम बरेलवी दिनांक 26 अगस्त 1963 को स्वर्ग सिधार गए। 1908 में राधेश्याम प्रकाशन एवं 1921 में राधेश्याम प्रेस पूर्ण रूप से कायम हुई थी। उनके द्वारा स्थापित राधेश्याम प्रकाशन की जिम्मेदारी वर्तमान में उनके उद्योगपति पौत्र पं. काशीनाथ शर्मा (सुपुत्र स्व. घनश्याम) बखूबी संभाले हुए हैं। पंडित जी को शत्- शत् नमन।

लेखक के बारे में :
भारतीय सिनेमा का इतिहास (फिल्मोग्राफी) के संग्रहकत्र्ता डॉ. दीपेन्द्र कमथान की शिक्षा एमएससी, पीएचडी, पीजीडीजेएमएस। संप्रति- प्रशासनिक अधिकारी, लाल बहादुर शास्त्री इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी, बरेली (उप्र)
संपर्क
: जे-10, रामपुर गार्डेन, बरेली- 243001 मो. ९८३७०४२८२७

1 Comment:

कुमार सौवीर said...

भाई, बहुत अच्‍छी प्रस्‍तुति है। बेहद रोचक।
बधाई।
कुमार सौवीर, यूपीन्‍यूज, लखनऊ

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