May 10, 2011

वनराज जंगल की सल्तनत छोड़कर बाहर क्यों आते हैं?

-देवेन्द्र प्रकाश मिश्र
केंद्र सरकार बाघों के संरक्षण के लिए दो दशक पूर्व से 'प्रोजेक्ट टाइगर' चला रही है। किंतु प्रोजेक्ट टाइगर को यूं सफल नहीं कहा जा सकता है क्योंकि राजस्थान का सारिस्का नेशनल पार्क बाघों से खाली हो गया। पन्ना टाइगर रिजर्व एवं मध्य प्रदेश के रणथम्भौर नेशनल पार्क के बाघों की दशा दयनीय हो चली है। उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क में बाघों की संख्या आंकड़ेबाजी की भेंट चढ़ी हुई है। इसके बाद भी देश के वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने विगत माह घोषणा की थी कि देश में 1411 से बढ़कर बाघों की संख्या 1700 से ऊपर हो गई है। इसमें पिछली गणना में सुंदरवन को शामिल नहीं किया गया था जबकि इस बार सुंदरवन के बाघ शामिल हैं। फिर बाघों की संख्या कैसे बढ़ गई यह स्वयं में विचारणीय प्रश्न है। आंकड़े भले ही देश में बाघों की संख्या बढ़ा रहे हों किंतु हकीकत एकदम से विपरीत है। भारत में बाघों की दुनिया सिमटती ही जा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि पिछले कुछ सालों में मानव और बाघों के बीच शुरू हुआ संघर्ष। बढ़ती आबादी के साथ प्राकृतिक संपदा एवं जंगलों का दोहन और अनियोजित विकास, वनराज को अपनी सल्तनत छोडऩे के लिए विवश होना पड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो या फिर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा आदि प्रदेशों के जंगल हों उसमें से बाहर निकलने वाले बाघ चारों तरफ अक्सर अपना आतंक फैलाते रहते हैं और बेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। बाघ और मानव के बीच संघर्ष क्यों बढ़ रहा है? और बाघ जंगल के बाहर निकलने के लिए क्यों विवश हैं? इस विकट समस्या का समय रहते समाधान किया जाना आवश्यक है। वैसे भी पूरे विश्व में बाघों की दुनिया सिमटती जा रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय वन क्षेत्र के बाहर आने वाले बाघों को गोली का निशाना बनाया जाता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जब भारत की धरा से बाघ विलुप्त हो जाएंगे।
उत्तर प्रदेश के जिला खीरी एवं पीलीभीत के जंगलों से बाहर निकले बाघों ने विगत साल जिला खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद में करीब दो दर्जन व्यक्तियों को अपना शिकार बनाया था। इसमें मौत का वारंट जारी करके दो बाघों को गोली मारी गयी थी। जबकि एक बाघ को पकड़कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेज दिया गया था। इसके अतिरिक्त उत्तरांचलमें भी जंगल से बाहर आकर मानवभक्षी बनने वाले दो बाघों को गोली मारी जा चुकी है। देहरादून के पास मानवभक्षी एक बेजुबान तेंदुआ को गुस्साई भीड़ ने आग में जिंदा जलाकर वहिशयाना ढंग से मौत के घाट उतार दिया था। इसे हम इंसानों के लिए त्रासदी कह सकते हैं लेकिन जितनी त्रासदी यह इंसानों के लिए है उससे अधिक त्रासदी उन बाघों के लिए जो इंसानों का शिकार कर रहे हैं। बाघ जन्म से हिंसक और खूंखार तो होता है, लेकिन मानवभक्षी नहीं होता। इंसानों से डरने वाले वनराज बाघ को मानवजनित अथवा प्राकृतिक परिस्थितियां मानव पर हमला करने को विवश करती हैं।
उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व परिक्षेत्र में शामिल किशनपुर वनपशु विहार, पीलीभीत और शाहजहांपुर के जंगल आपस में सटे हैं। गांवों की बस्तियां और कृषि भूमि जंगल के समीप हैं। इसी प्रकार दुधवा नेशनल पार्क तथा कतरनिया वन्यजीव प्रभाग का वनक्षेत्र भारत-नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय खुली सीमा से सटा है। साथ ही आसपास जंगल के किनारे तमाम गांव आबाद हैं। जिससे सीमा पर नेपाली नागरिकों के साथ ही भारतीय क्षेत्र में मानव आबादी का दबाव जंगलों पर बढ़ता ही जा रहा है। इसके चलते विभिन्न परितंत्रों के बीच एक ऐसा त्रिकोण बनता है जहां ग्रामवासियों और वनपशुओं को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जाना ही पड़ता है। भौगोलिक परिस्थितियों के चलते बनने वाला त्रिकोण परिक्षेत्र दुर्घटना जोन बन जाते हैं। सन् 2007 में किशनपुर परिक्षेत्र में आबाद गांवों में आधा दर्जन मानव हत्याएं करने वाली बाघिन को मृत्यु दण्ड देकर गोली मार दी गयी थी। इसके बाद नवंबर 2008 में पीलीभीत के जंगल से निकला बाघ खीरी, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी होते हुए सूबे की राजधानी लखनऊ की सीमा तक पहुंच गया था। इस दौरान बाघ ने एक दर्जन ग्रामीणों का शिकार किया था। बाद में इस आतंकी बाघ को नरभक्षी घोषित करके फैजाबाद के पास गोली मारकर मौत दे दी गयी थी। सन् 2009 के माह जनवरी में किशनपुर एवं नार्थ खीरी फारेस्ट डिवीजन के क्षेत्र में जंगल से बाहर आये बाघ ने चार मानव हत्याएं करने के साथ ही कई पालतू पशुओं का शिकार भी किया। इस पर हुई काफी मशक्कत के बाद बाघ को पिंजरें में कैद कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेज दिया गया था। सन् 2010 पीलीभीत के जंगल से निकले बाघ द्वारा खीरी, शाहजहांपुर में आठ ग्रामीण मौत के घाट उतारे गए थे। इस पर वन विभाग ने प्रयास करके बाघ को पिंजरे में कैद करके लखनऊ प्राणी उद्यान में भेज दिया था। उत्तर प्रदेश में ही नहीं वरन उत्तरांचल में भी बाघ जंगल से बाहर भाग रहे हैं। 2011 के माह जनवरी व फरवरी के बीते एक पखवाड़े के भीतर उत्तरांचल के जिम कार्बेट पार्क के ग्रामीण सीमाई क्षेत्रों में दो बाघों को मानवभक्षी घोषित करके गोली मारी जा चुकी है। इस साल भी दुधवा टाइगर रिजर्व से सटे किशनपुर वन्यजीव विहार एवं साउथ खीरी फारेस्ट डिवीजन के जंगल के किनारे शिकारियों ने दो तेंदुओं को फांसी पर लटकाकर क्रूरता पूर्वक मौत के घाट उतार दिया था। दुधवा पार्क के जंगलों के साथ ही उससे सटे जिला बहराइच, पीलीभीत, गोंडा के जंगलों में बाघों का शिकार एवं उसके अंगों का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अवैध कारोबार करने वाले गैंग की कुख्यात महिला सरगना दलीपों को माह मार्च 2011 में खीरी की निचली अदालत ने पांच साल की सश्रम कठोर कारावास एवं दस हजार रुपए के दंड की सजा सुनाई है। चीन में बाघ के अंगों की बढ़ती मांग के कारण पैसों के लालच में भी भारत के वनक्षेत्रों में बाघों का अवैध शिकार किया जा रहा है। अवैध शिकार के कारण ही राजस्थान के सारिस्का नेशनल पार्क और मध्यप्रदेश के रणथम्भौर नेशनल पार्क से बाघ गायब हो चुके हैं। देश में संकटापन्न दशा से गुजर रहे बाघों की दुनिया को एक तरफ जहां शिकारी समेट रहे हैं वहीं दूसरी तरफ वनक्षेत्रों से बाहर आने वाले बाघों को आतंकी या मानवभक्षी घोषित करके मौत के घाट उतार देना न समस्या का समाधान है और न ही यह बाघों के हित में है।
जन्म से खंूखार होने के बाद भी विशेषज्ञों की राय में बाघ इंसान पर डर के कारण हमला नहीं करता। यही कारण है कि वह इंसानों से दूर रहकर घने जंगलों में छुप कर रहता है। मानव पर हमला करने के लिए परिस्थितियां विवश करती हैं। विश्वविख्यात बाघ विशेषज्ञ जिम कार्बेट का भी कहना था कि बाघ बूढ़ा होकर लाचार हो जाये अथवा जख्मी होने से उसके दांत, पंजा, नाखून टूट गये हों या फिर प्राकृतिक या मानवजनित उसके लिए विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तभी बाघ इंसानों पर हमला करता है। उनका यह भी मानना था कि जन्म से खंूखार होने के बाद भी बाघ मानव पर एक अदृश्य डर के कारण हमला नहीं करता और यह भी कोई जरूरी नहीं है कि नरभक्षी बाघ के बच्चे भी नरभक्षी हो जायें।
बाघ अथवा वन्यजीव जंगल से क्यों निकलते हैं इसके लिए प्राकृतिक एवं मानवजनित कई कारण हैं। इनमें छोटे- मोटे स्वार्थो के कारण न केवल जंगल काटे गए बल्कि जंगली जानवरों का भरपूर शिकार किया गया। आज भी नेशनल पार्क का आरक्षित वनक्षेत्र हो या संरक्षित जंगल हो उनमें लगातार अवैध शिकार जारी है। यही कारण है कि वन्यजीवों की तमाम प्रजातियां संकटापन्न होकर विलुप्त होने की कगार पर हैं। इस बात का अभी अंदेशा भर जताया जा सकता है कि इस इलाके में बाघों की संख्या बढऩे पर उनके लिए भोजन का संकट आया हो। असामान्य व्यवहार आसपास के लोगों के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। मगर इससे भी बड़ा खतरा इस बात का है कि कहीं मनुष्यों और जंगली जानवर के बीच अपने को जिन्दा रखने के लिए खाने की जद्दोजेहाद नए सिरे से किसी परिस्थितिकीय असंतुलन को न पैदा कर दे। जब तक भरपूर मात्रा में जंगल रहे तब तक वन्यजीव गांव या शहर की ओर रूख नहीं करते थे। लेकिन मनुष्य ने जब उनके ठिकानों पर हमला बोल दिया तो वे मजबूर होकर इधर- उधर भटकने को मजबूर हो गए हैं।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने हाल ही में चार साल के बजाय एक साल में बाघों की गणना करने की बात कही है उनका मानना है कि इससे बाघों की सही ढंग से निगरानी हो सकेगी, पर्वेक्षण की दृष्टि से यह बात ठीक है। किंतु सरकार इस तरह की कोई भी दीर्घकालिक योजना बनाने में असफल है जिसमें वन्यजीव जंगल के बाहर न आए। इधर प्राकृतिक कारणों से जंगल के भीतर चारागाह भी सिमट गए अथवा वन विभाग के कर्मचारियों की निजस्वार्थपरता से हुए कुप्रबंधन के कारण चारागाह ऊंची घास के मैदानों में बदल गए इससे जंगल में चारा की कमी हो गई है। परिणाम स्वरूप वनस्पति आहारी वन्यजीव चारा की तलाश में जंगल के बाहर आने को विवश हैं तो अपनी भूख शांत करने के लिए वनराज बाघ भी उनके साथ पीछे- पीछे बाहर आकर आसान शिकार की प्रत्याशा में खेतों को अस्थाई शरणगाह बना लेते हैं। परिणाम सह अस्तित्व के बीच मानव तथा वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है। इसको रोकने के लिए अब जरूरी हो गया है कि वन्यजीवों के अवैध शिकार पर सख्ती से रोक लगाई जाये तथा जंगल के भीतर अनुपयोगी हो रहे चारागाहों को पुराना स्वरूप दिया जाए ताकि वन्यजीव चारे के लिए जंगल के बाहर न आयें। इसके अतिरिक्त बाघों के प्राकृतिक वास स्थलों में मानव की बढ़ती घुसपैठ को रोका जाये साथ ही ऐसे भी कारगर प्रयास किये जाएं जिससे मानव एवं वन्यजीव एक दूसरे को प्रभावित किये बिना रह सकें। ऐसा न किए जाने की स्थिति में परिणाम घातक ही निकलते रहेंगे, जिसमें मानव की अपेक्षा सर्वाधिक नुकसान बाघों के हिस्से में ही आएगा।
(www.dudhwalive.com से )
पता : हिन्दुस्तान ऑफिस, पलिया कला, जिला- खीरी (उप्र) मो. 09415166103, ईमेल- dpmishra7@gmail.com

2 Comments:

aneeta said...

bada saaf suthara blog laga aapka.

Aneeta

Devendra Prakash Mishra said...

ANEETA ZE
AAPKO DHANYAVAD

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
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