January 29, 2011

खतरे में है सुंदरवन

- नरेंद्र देवांगन

आज हर तरफ ग्लोबल वार्मिंग को लेकर बहस चल रही है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से उत्तर दक्षिण ध्रुवों पर जमी बर्फ बड़े पैमाने पर गल रही है और दुनिया भर के समुद्रों में पानी का स्तर बढ़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने ग्लोबल वार्मिंग से खतरे में पड़े 27 देशों की सूची जारी की है। भारत उनमें से एक है। बंगाल सहित भारत के तटवर्ती प्रदेशों में यह खतरा बढ़ रहा है। इसका असर बंगाल की खाड़ी पर भी पड़ रहा है। आशंका है कि सुंदरवन के बहुत सारे द्वीप डूब जाएंगे।
बंगाल की खाड़ी में फैले सुंदरवन को वल्र्ड हेरिटेज का दर्जा दिया गया है। बंगाल की खाड़ी से जुड़े इलाके का पर्यावरण संतुलन सुंदरवन पर निर्भर करता है। यहां के विश्व प्रसिद्ध रायल बंगाल टाइगर, सुंदरी पेड़ के जंगल या मैन्ग्रोव के जंगल, इलाके के पर्यावरण संतुलन से लेकर मानसून के आगमन तक में इन तीनों का भारी योगदान है। लेकिन इन दिनों सुंदरवन पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।
हो सकता है आने वाले समय में भारत के मानचित्र से विश्व धरोहर सुंदरवन का नामोनिशान ही मिट जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ के एक सर्वे से पता चला है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते सुंदरवन के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच 10 हजार वर्ग कि.मी. में फैला सुंदरवन इस समय दो तरह की समस्याओं से घिरा हुआ है।
पहली समस्या के पीछे धरती का तापमान का बढऩा और ग्लेशियरों का पिघलना जैसे कारण हैं। दूसरी समस्या मानव निर्मित है- प. बंगाल और बांग्लादेश की आबादी बढऩे से डेल्टा क्षेत्र में मैन्ग्रोव के जंगल काटकर रिहाइशी बस्तियों का बसते जाना। अगर इन दोनों समस्याओं से सुंदरवन नहीं उबर पाया तो उसके अस्तित्व को मिटने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा।
आज हर तरफ ग्लोबल वार्मिंग को लेकर बहस चल रही है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से उत्तर व दक्षिण ध्रुवों पर जमी बर्फ बड़े पैमाने पर गल रही है और दुनिया भर के समुद्रों में पानी का स्तर बढ़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने ग्लोबल वार्मिंग से खतरे में पड़े 27 देशों की सूची जारी की है। भारत उनमें से एक है। बंगाल सहित भारत के तटवर्ती प्रदेशों में यह खतरा बढ़ रहा है। इसका असर बंगाल की खाड़ी पर भी पड़ रहा है। आशंका है कि सुंदरवन के बहुत सारे द्वीप डूब जाएंगे। वैसे भी सुंदरवन के कुछ द्वीपों को पहले ही बंगाल की खाड़ी का काला पानी निगल चुका है।
इसके अलावा, सुंदरवन को सीधे तौर पर इंसानों से भी खतरा पैदा हो गया है। यहां पाए जाने वाले सुंदरी पेड़ के कारण इसका नाम सुंदरवन पड़ा। सुंदरी पेड़ के अलावा इसका एक बहुत बड़ा इलाका मैन्ग्रोव जंगलों से घिरा हुआ है। ये मैन्ग्रोव जंगल इस क्षेत्र में एक तरफ बंगाल की खाड़ी पर बांध का काम करते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण को इनसे संतुलन भी मिलता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से सुंदरवन के मैन्ग्रोव के एक बहुत बड़े हिस्से की अवैध रूप से अंधाधुंध कटाई हो रही है।
सुंदरवन इलाके के मूल निवासियों के लिए मछली पकडऩा और जंगल से शहद जमा करना जीविका का प्रमुख साधन है। जीविका के लिए समुद्र और जंगल में गए ज़्यादातर पुरुषों की जान को खतरा होता है रायल बंगाल टाइगर से या समुद्री तूफान में नौका के डूब जाने से या मगर के निगल जाने से। इसी कारण यहां महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या बहुत कम है। महिलाएं यहां जंगलों से शहद जमा करने का काम करती हैं।
पर्यावरण के जानकारों का मानना है कि प्रदूषण के जहर से समुद्रों के अलग- अलग हिस्से में ऑक्सीजन की मात्रा शून्य के करीब जा पहुंची है जहां पेड़- पौधे और वनस्पतियां पैदा नहीं हो सकती। यही स्थिति मृत क्षेत्र बनने की है। गौरतलब है विभिन्न समुद्रों में लगभग 150 मृत क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों की परिधि बढ़ती जा रही है। सुकून की बात यह है कि बंगाल की खाड़ी में अभी तक मृत क्षेत्र नहीं बने हैं मगर बढ़ते प्रदूषण के चलते इस आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
संयुक्त राष्ट्र के सर्वे के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के कारण बंगाल की खाड़ी का जलस्तर अगले 10 सालों में अगर 45 सें.मी. भी बढ़ता है तो सुंदरवन का 75 फीसदी भाग खाड़ी में समा जाएगा। जाहिर है इससे यहां पनपने वाले मैन्ग्रोव भी खाड़ी में समा जाएंगे। सुंदरवन के मैन्ग्रोव न सिर्फ बंगाल की खाड़ी से उठने वाले तूफान से होने वाली तबाही को रोकते हैं बल्कि मुहाना में नदी के जल को भी परिशोधित करते हैं। मैन्ग्रोव कटने से अब समुद्र का खारा पानी आसानी से तटीय क्षेत्र की ओर बढऩे लगा है। बाढ़ और चक्रवाती तूफान जैसी प्राकृतिक आपदा के समय भी खाड़ी का खारा पानी क्षेत्र की मिट्टी को प्रभावित कर रहा है। इससे कृषि भूमि को नुकसान और भूमि का क्षरण भी हो रहा है। मैन्ग्रोव के वृक्षों से पटे ये जंगल रॉयल बंगाल टाइगर का आश्रय स्थल हैं। इनके नष्ट होने से बाघ अपने भोजन की तलाश में रिहाइशी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं। सुंदरवन के कई गांव बाघ के उपद्रव से प्रभावित हैं। अभयारण्य से सटे 25 गांवों में हर साल बाघों के हमले में बहुत सारे लोगों की जानें जाती हैं।
राष्ट्र संघ के सर्वेक्षण के बाद बिधानचंद्र राय कृषि विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय सेमीनार में राज्य पर्यावरण विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि धरती का तापमान बढऩे से बंगाल की खाड़ी का जलस्तर बढ़ रहा है, और सबसे अधिक जलस्तर डायमंड हार्बर क्षेत्र में बढ़ा है। जहां भारत के तटीय क्षेत्र में समुद्र का जलस्तर हर साल 1-2 मि.मी. बढ़ा है वहीं डायमंड हार्बर में 5.78 मि.मी. बढ़ा है। कोलकाता तथा आसपास की पूरी आबादी पर भी खतरा मंडरा रहा है।
2050 तक जलवायु में व्यापक परिवर्तन का अंदेशा है। उससे तटीय क्षेत्र में तूफान उठने से गांव के गांव डूब जाने का खतरा है। तबाही के मंजर की एक झलक तूफान आइला में देखी जा चुकी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस डेल्टा क्षेत्र का 5वां हिस्सा, जो कि सुंदरवन के बाघों का अभयारण्य है, जल समाधि ले चुका है।
गर्मी में सुंदरवन की नदियां सूख जाती हैं और खाड़ी का खारा पानी यहां की कृषि को प्रभावित करता है। कुल मिलाकर अब तक 15 फीसदी कृषि भूमि और राष्ट्रीय अभयारण्य का 250 वर्ग कि.मी. क्षेत्र अगले दो साल में खाड़ी में समा जाएगा। कोलकाता विश्वविद्यालय के समुद्र विज्ञान विभाग के एक प्रोफेसर का कहना है कि सुंदरवन में ऊपरी जलस्तर का तापमान हर साल बढ़ रहा है। पिछले तीन दशकों में प्रति दशक यह 0.5 डिग्री सेल्सियम की दर से बढ़ा है। यह ग्लोबल वार्मिंग की दर से भी अधिक है। ग्लोबल वार्मिंग की दर प्रति दशक 0.06 डिग्री सेल्सियस है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में भारतीय डेल्टा क्षेत्र में बारिश की मात्रा भी बढ़ेगी और इसका असर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूरे देश पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संस्था फ्रेंड्स ऑफ अर्थ के कार्यकारी निदेशक का कहना है कि प्रदूषण इतना बढ़ चुका है कि बंगाल की खाड़ी में कभी भी मृत क्षेत्र बनना शुरू हो सकता है। इससे इस पूरे क्षेत्र का पर्यावरण संतुलन बिगड़ जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

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