August 25, 2010

हिन्दी गजल को भारतीय काव्य की मुख्य धारा बनाने का जज्बा

- रामेश्वर वैष्णव

अब महत्वाकांक्षा का अर्थ शायद है यही लोग अपने मन में हाहाकर लेकर आ गए
तमाम विरोधों विसंगतियों एवं विद्रूपताओं के हिन्दी गजल ने जन मानस में अपना स्थान बनाने में सफलता पाई है। छंद विरोधी मानसिकता ने हिन्दी गजल को रिजेक्ट करने की हर संभव कोशिश की मगर अपनी सहज संप्रेषणीयता, लघुशिल्प में विराट अभिव्यक्ति की क्षमता एवं नई कविता के तेवर से लैस होने की सजगता ने हिन्दी गजल को युगीन काव्य की मुख्य धारा के आस-पास ला खड़ा किया है। जहीर कुरेशी इसी धारा के भागीरथी हैं। दुष्यंत कुमार के बाद जिन गजलकारों ने हिंदी गजल को सहज सरल स्वरूप प्रदान करने में कामयाबी पाई उनमें विनोद तिवारी, जहीर कुरेशी, अशोक अंजूम आदि का नाम अग्रणी है। 'पेड़ तनकर भी नहीं टूटा' जहीर कुरेशी की एक सौ एक गजलों का छठवां और ताजा संकलन है। हिन्दी जैसी स्वाभिमानी भाषा को गजल के शिल्प में ढालना कोई सहज कार्य नहीं था मगर अपनी 45 वर्षों की साधना से हिन्दी सोच, हिन्दी कहन एवं हिन्दी मुहावरों को दिशा देने में कुरेशी जी की अथक मेहनत स्पष्ट झलकती है।
ऐसे मोती करोड़ों में हैं
जो समंदर से निकले नहीं।
'स्वागतम' से भी अधिक
मूल्य होता है मुस्कान का।
युगीन सच्चाइयों को अभिव्यक्ति देने में जहां व्यंग्य ही कारगर है वहीं गजलों में विसंगतियों को स्वर देने का कुरेशी जी का तरीका अलग है।
घर लौटते ही, सीधा गया संगिनी के पास
मां और बूढ़े बाप से बेटा नहीं मिला।
खुशी मुख पर प्रवासी दिख रही है,
हंसी में भी उदासी दिख रही है।
इसी तरह आधुनिक जीवन की जटिलताओं को अभिव्यक्त देने में छंदों को रोड़ा समझने वाले शायद ऐसे शेरों से रूबरू नहीं हो पाए हैं।
कभी वो मन मुताबिक बह न पाए
जो जल की तेज धाराओं में उलझे।
प्रवेश रात में किसको दिया था माली ने।
बलात् झेल चुकीं क्यारियां बताती हैं,
हिन्दी गजल को नई कविता के तेवर देने में जहीर भाई पीछे नहीं रहे -
वो अब रहते हैं सीली कोठरी में
हैं वंचित घर के उत्सव से पिता जी।
उन्हें कविता में बौनी वेदना को
कुतुब मीनार करना आ गया है।
सूर्य की कोशिशें हुई नाकाम
हिम के पर्वत पिघल नहीं पाए।
कुरेशी जी का यह कहना कि 'मुझे लगता है अभी बहुत कुछ कहा जाना शेष है' उनकी चूकने तथा संभावनाओं की निस्सीमता का प्रतीक है। सजग और सही रचनाकार की यही पहचान है। हर भाषा की अपनी प्रकृति होती है और कोई भी शिल्प वह अपने अनुसार चयन करे तो उसमें ज्यादा निखार आता है।
जहीर कुरेशी अपने शेरों में अंग्रेजी शब्द का प्रयोग भी करते हैं। कुछ लोगों को यह नागवार गुजर सकता है परंतु यह भी तय है उसका विकल्प वे नहीं सुझा सकते। बहरहाल हिन्दी गजल की शानदार यात्रा जारी है और इसमें बहुत सारे सहयात्री अपनी तान छेड़ते हुए शामिल है।
पता: 62/699 प्रोफेसर कालोनी, सेक्टर-1, सड़क-3 रायपुर- 492001
फोन. नं. 0771-2272789

1 Comment:

सुरेश यादव said...

ज़हीर कुरैशी की ग़ज़लों पर रामेश्वर कम्बोज हिमांशु ने जितनी बेवाकी और ईमानदारी से बात की है वह हिंदी ग़ज़ल के लिए रचना के स्तर पर भी और समीक्षा के स्तर पर भी बहुत महत्वपूर्ण है .बधाई .

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