March 18, 2010

चुटकियों में बड़ी- बड़ी गणनाएं

भारत में कम ही लोग जानते हैं, पर विदेशों में लोग मानने लगे हैं कि वैदिक विधि से गणित के हिसाब लगाने में न केवल मज़ा आता है, उससे आत्मविश्वास मिलता है और स्मरणशक्ति भी बढ़ती है।

वैदिक गणित के माध्यम से हम गणित को रोजमर्रा की जिंदगी में मौज मस्ती की तरह शामिल कर सकते हैं। वैदिक गणित हमारी अपनी प्राचीन गणित है जिसके माध्यम से हम मात्र कुछ क्षणों में अपने कठिन से कठिन सवाल का हल पा सकते हैं, लेकिन हम किसी भी तरह की गणना के लिए पूरी तरह से कैल्कुलेटर के आदी हो गए हैं, जो कि पश्चिम जगत की खोज है। अगर हम अतीत में जाएं, तो वह काल न तो कंप्यूटर का था न कैल्कुलैटर का, आज से सैकड़ों साल पहले के समय की जो बात हमारे दिमाग में सबसे पहले आती है वह है वैदिक काल। हमारे चार वेद हैं, और वैदिक गणित अथर्ववेद का ही एक भाग है।
जर्मनी में सबसे कम समय का एक नियमित टेलीविजऩ कार्यक्रम है- विसन फ़ोर अख्त। हिंदी में अर्थ हुआ 'आठ के पहले ज्ञान की बातें। देश के सबसे बड़े रेडियो और टेलीविजऩ नेटवर्क एआरडी के इस कार्यक्रम में हर शाम आठ बजे होने वाले मुख्य समाचारों से ठीक पहले, भारतीय मूल के विज्ञान पत्रकार रंगा योगेश्वर केवल दो मिनटों में ज्ञान- विज्ञान से संबंधित किसी दिलचस्प प्रश्न का सहज- सरल उत्तर देते हैं। रंगा योगेश्वर कहते हैं कि भारत की क्या अपनी कोई अलग गणित है? वहां के लोग क्या किसी दूसरे ढंग से हिसाब लगाते हैं?
भारत में भी कम ही लोग जानते हैं कि भारत की अपनी अलग अंक गणित है, जी हां वैदिक अंकगणित। पर भारत के स्कूलों में वह शायद ही पढ़ायी जाती है। भारत के शिक्षा शास्त्रियों का भी यही विश्वास है कि असली ज्ञान-विज्ञान वही है जो इंग्लैंड- अमेरिका से आता है।़
हमारे बुजुर्ग बताते हैं कि बगदाद के राजा ने उज्जैन के एक विद्वान को अपने यहां विज्ञान और गणित पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया था। उस राजा ने कई भारतीय पुस्तकों का अरबी में अनुवाद भी करवाया। इसके बाद यही पध्दति 11 वीं शताब्दी में यूरोप जा पहुंची। एक इस्लामिक विद्वान अल-बरुनी भारतीय विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारत आया। भारत में वह तीस साल तक रहा और उसने कई किताबें भी लिखी, जिसमें से हिसाब-ए-हिंदी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक है। जगतगुरू शंकराचार्य भारती कृष्ण तीर्थ महाराज ने वर्ष 1911 से 1918 तक वैदिक गणित पर शोध किया और इसे पुर्नस्थापित किया।
हमारे यहां एक प्रसिद्ध कहावत है न कि घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध। लेकिन आन गांव वाले अब भारत की वैदिक अंक गणित पर चकित हो रहे हैं और उसे सीख रहे हैं। बिना कागज़- पेंसिल या कैल्क्युलेटर के मन ही मन हिसाब लगाने का उससे सरल और तेज़ तरीका शायद ही कोई है। रंगा योगेश्वर ने जर्मन टेलीविजऩ के दर्शकों को एक उदाहरण से इसे समझाया:
'मान लें कि हमें 889 में 998 का गुणा करना है। प्रचलित तरीके से यह इतना आसान नहीं है। भारतीय वैदिक तरीके से उसे ऐसे करेंगे: दोनों का सब से नज़दीकी पूर्णांक एक हजार है। उन्हें एक हज़ार में से घटाने पर मिले 2 और 111। इन दोनों का गुणा करने पर मिलेगा 222। अपने मन में इसे दाहिनी ओर लिखें। अब 889 में से उस दो को घटायें, जो 998 को एक हज़ार बनाने के लिए जोडऩा पड़ा। मिला 887। इसे मन में 222 के पहले बायीं ओर लिखें। यही, यानी 887 222, सही गुणनफल है।'
अब यह तो माना ही जाता है कि यूनान और मिस्र से भी पुराना है हमारे भारत का गणित- ज्ञान। शून्य और दशमलव तो भारत की देन है ही, कहते हैं कि यूनानी गणितज्ञ पिथागोरस (पाइथागोरस) का प्रमेय भी भारत में पहले से ज्ञात था।
यह दुर्भाग्य की बात है कि भारत में 90 प्रतिशत लोग इस जादुई गणित से परिचित नहीं है। वैदिक विधि से बड़ी संख्याओं का जोड़- घटाना और गुणा- भाग ही नहीं, वर्ग और वर्गमूल, घन और घनमूल निकालना भी संभव है। अब आप चौंकिएगा मत भारत भले ही अपने इस गणित को भूल गया हो पर इंग्लैंड, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बच्चों को वैदिक गणित सिखाने वाले स्कूल भी खुल गये हैं।
वैदिक गणित की तुलना अगर यूसी मैथ्स से की जाए तो हम पाते हैं कि विद्यार्थी एबैकस की मदद के बिना यूसी मैथ्स नहीं सीख सकते। एबैकस वह उपकरण है जिसका आविष्कार चीन में हुआ है और इसमें कुछ बिंदुओ का प्रयोग किया जाता है। दूसरी बात इसको सीखने में ज्यादा समय (कुछ सप्ताह) लगता है। इसको विस्तार से सीखने में यानि भाग देना, गुणा करना, आदि सीखने में कई और सप्ताह लग जाते हैं। जबकि वैदिक गणित में तो किसी भी विद्यार्थी को इसके बुनियादी सिध्दांतों को ही सीखना होता है और उसे गणित के सवाल के अनुसार जोड़, घटाव, गुणा भाग से लेकर वर्ग, वर्गमूल, और घनमूल निकालने में प्रयोग में लाना होता है।
ऑस्ट्रेलिया के कॉलिन निकोलस साद वैदिक गणित के रसिया हैं। उन्होंने अपना उपनाम 'जैन' रख लिया है और ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स प्रांत में बच्चों को वैदिक गणित सिखाते हैं। उनका दावा है: 'अमेरिकी अंतरिक्ष अधिकरण नासा गोपनीय तरीके से वैदिक गणित का कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले रोबोट बनाने में उपयोग कर रहा है। नासा वाले समझना चाहते हैं कि रोबोट में दिमाग़ की नकल कैसे की जा सकती है ताकि रोबोट ही दिमाग़ की तरह हिसाब भी लगा सके... उदाहरण के लिए कि 96 गुणे 95 कितना हुआ....9120Ó। कॉलिन निकोलस साद ने वैदिक गणित पर किताबें भी लिखी हैं। बताते हैं कि वैदिक गणित कम से कम ढाई से तीन हज़ार साल पुरानी है। उस में मन ही मन हिसाब लगाने के 16 सूत्र बताये गये हैं, इन सूत्रों को आप चाहें तो एक तकनीक या ट्रिक भी कह सकते हैं। कई लोग तो इसे जादुई ट्रिक भी कहते हैं। हम इसे दूसरे शब्दों में इस तरह कह सकते हैं वैदिक गणित वह विधा है जिसकी मदद से हम सवाल में ही छुपे जवाब का पता लगा सकते हैं।
साद अपने बारे में कहते हैं- 'मेरा काम अंकों की इस चमकदार प्राचीन विद्या के प्रति बच्चों में प्रेम जगाना है। मेरा मानना है कि बच्चों को सचमुच वैदिक गणित सीखना चाहिये। भारतीय योगियों ने उसे हजारों साल पहले विकसित किया था। आप उनसे गणित का कोई भी प्रश्न पूछ सकते थे और वे मन की कल्पनाशक्ति से देख कर फट से जवाब दे सकते थे। उन्होंने तीन हजार साल पहले शून्य की अवधारणा प्रस्तुत की और दशमलव वाला बिंदु सुझाया। उनके बिना आज हमारे पास कंप्यूटर नहीं होता।' साद उर्फ जैन ने मानो वैदिक गणित के प्रचार- प्रसार का व्रत ले रखा है: 'मैं पिछले 25 सालों से लोगों को बता रहा हूं कि आप अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छा काम यही कर सकते हैं कि उन्हें वैदिक गणित सिखायें। इससे आत्मविश्वास, स्मरणशक्ति और कल्पनाशक्ति बढ़ती है। इस गणित के 16 मूल सूत्र जानने के बाद बच्चों के लिए हर ज्ञान की खिड़की खुल जाती है'।
यह बात तो मानी हुई है कि किसी समस्या का समाधान खोजने का तरीका जितना सरल होगा, आप उतनी ही जल्दी उसे हल कर सकेंगे और इसमें गलती होने की संभावना भी कम से कम होगी। (उदंती फीचर्स)

1 Comment:

कौशलेन्द्र said...

वैदिक गणित की आज हिन्दी और अंग्रेज़ी में कई पुस्तकें उपलब्ध हैं । वैदिक गणित के सूत्र श्लोक के रूप में हैं जो गेय होने के कारण सरलता से कण्ठस्थ किये जा सकते हैं । इतना ही नहीं लीलावती टीका में तो गणित के कुछ सूत्र श्रंगार रस में भी हैं । वास्तव में बैदिक गणित के प्रचार-प्रसार से हम इस नीरस विषय(कुछ लोगों के लिए)को भी रुचिकर बना सकते हैं ।

लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही साथी समाज सेवी संस्थाद्वारा संचालित स्कूलसाथी राऊंड टेबल गुरूकुल में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है।
शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से साथी राऊंड टेबल गुरूकुलके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है।
अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर,तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में),क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर,पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर,जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ।
सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी,रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबाइल नं.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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