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Dec 6, 2020

किताबें- जाबाज़ वीरों की सत्य कहानियाँ

- स्वराज सिंह

पुस्तकः निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ

लेखिका: शशि पाधा

 प्रकाशक: प्रतिभा प्रतिष्ठान

नई दिल्ली, पृष्ठ: 150,मूल्य: 300/-

भारतीय जनमानस को प्रेरित करने वाली, देश के प्रति देशवासियों को उनका कर्तव्य याद दिलाने वाली जाबाज़ वीरों की सत्य कहानियाँ जो आज की पीढ़ी के लिए किसी भी धर्म ग्रंथ से बढ़कर है। देश धर्म से कहीं ऊपर होता है इसलिए मैं ऐसा कह रहा हूँ। निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ लिखने वाली लेखिका श्रीमती ‘शशि पाधा’ जी, जिनकी रगों में ही देश भक्ति रची बसी है। श्रीमती शशि पाधा जी हिंदी की जानी मानी हस्ताक्षर हैं। ‘निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ’ से पहले इनकी पुस्तक ‘शौर्य गाथाएँ’ बहुत ही लोक प्रिय रही। लेखिका के पति पैरा स्पेशल फोर्स में उच्च पद पर रहे। इन्होंने इन सभी योद्धाओं को बहुत नजदीक से देखा। ऐसे योद्धाओं की कहानियों को जन-जन तक पहुँचाना इनका जुनून बन चुका है। ऐसे वीरों की कहानियाँ लिखकर लेखिका, आधुनिक पीढ़ी को देश के प्रति उनके दायित्व को याद दिलाना और उनमें नैतिक मूल्यों का समावेश करना चाहती है।

इस पुस्तक में पहली ही कहानी ‘एक अंतहीन प्रेमकथा’ अशोक चक्र से सम्मानित एक जांबाज़ योद्धा लांसनायक मोहन गोस्वामी की कथा है जिसने सितंबर 2015 में कुपवाड़ा में 10 दिन के अंदर 11 आतंकवादियों को दोज़ख में पहुँचा दिया और अंत में अपने घायल साथियों की जान भी बचाई। इसी दौरान आतंकवादियों की गोलियाँ इस जाबांज़ की जांघ और पेट मे आकर लगती है और यह योद्धा वीर गति को प्राप्त हो जाता है।लेखिका मोहन गोस्वामी के परिवार से मिलती है। उनकी पत्नी ‘भावना’ जो बहुत ही दृढ़ निश्चय वाली महिला है। उनकी जिजीविषा और दृढ़ता, जीवन में आगे बढ़ने की उनकी ललक प्रेरणा दायक और अनुकरणीय है।

‘अपनी आत्मा का कप्तान’ एक ऐसे योद्धा और उसके परिवार की कथा है जिसको सुनकर रौंगटे खड़े हो जाते है। कीर्ति चक्र से सम्मानित शहीद कैप्टन दविंदर जस्स पैरा स्पेशल फोर्स का जवान था जो आतंकवादियों का खात्मा करते हुए शहीद हो गया। बहुत अल्प समय के लिए ही यह सेना में अपनी सेवाएँ दे सका। इनका सपना भी सेना में जाना था और कमांडो बनना था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद एम बी ए किया और डिलाइट कंपनी में बहुत अच्छी नौकरी पर थे, तभी उसे आई एम ए  से ट्रेनिंग के लिए पत्र आया। वह सब कुछ भूलकर अपना सपना साकार करने के लिए ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया। कैप्टन दविंदर जस्स  की कथा के साथ-साथ उनके परिवार की कहानी भी प्रेरणा देने वाली है।

‘मिट्टी का मोह’ 1965 भारत पाकिस्तान युद्ध की एक ऐसी कथा है, जो लेखिका के पति केशव पाधा से जुड़ी है। इस कथा में बर्की गाँव में रहने वाले चिरागदीन है ,जो वृद्ध और पत्नी के बीमार होने के चलते अपना गाँव नहीं छोड़ सके। 1965 के युद्ध मे बर्की गाँव भारत के कब्जे में आ गया था। काफी दिन इस गाँव में भारतीय सेना रही। इन बुजुर्ग लोगों से भारतीय सैनिकों की आत्मीयता बढ़ गई। आखिर हैं तो इंसान ही। लेखिका के पति ने एक दिन चिरागदीन से उनकी इच्छा पूछी। उन्होंने कहा मेरा जन्म जालंधर के पास एक गाँव मे हुआ था। उसने कहा आप मुझे मेरे गाँव ले जाइए। मरने से पहले अपना जन्म स्थान देखना चाहता हूँ। कैप्टन केशव पाधा ने उनकी इस इच्छा को पूरा किया। बाद में ताशकंद समझौते के कारण भारतीय सेना को वापस आना पड़ा। इस वृद्ध ने लेखिका के पति कप्तान पाधा को एक कटोरा मिट्टी औए एक कुरान की प्रति भेंट की लेखिका ने इस अमूल्य भेंट को सदा  सँभाल कर रखा।‘मिट्टी का मोह’ कथा मर्म को छू लेने वाली है। यह भावनाओं को छूने वाली एक ऐसी कथा जिसको पढ़ने के बाद कोई भुला नहीं सकेगा।

‘उद्यम से अधिकार तक बढ़ते कदम’ नियति से लड़ने वाले और उसे परास्त करने वाले ऐसे संकल्पी सैनिक की प्रेरक कथा है, जिसका विद्यालयी पाठ्यक्रम में होना बहुत जरूरी है। नवीन गुलिया ने तीन साल एन डी ए की तैयारी की और  परीक्षा पास कर इंडियन मिलिट्री अकादमी में ट्रेनिंग के लिए देहरादून चला गया। नियति देखिए कि पासिंग आउट परेड की पूर्व संध्या पर एक बाधा दौड़ पार करते समय अपने किसी साथी का हल्का -सा धक्का लगने से संतुलन बिगड़ने से नौ फिट की दीवार से सिर के बल नीचे गिरे। गिरने से गर्दन के पास मस्तिष्क से जुड़ने वाली रीढ़ की हड्डी टूट गई। उसका शरीर पूरी तरह से पक्षाघात का शिकार हो चुका था। इलाज के लिए देहरादून से दिल्ली और फिर इन्हें पुणे के सैन्य अस्पताल ले जाया गया। शल्य चिकित्सा के द्वारा डाक्टर्स ने उनकी रीढ़ की हड्डी को जोड़ा। लगभग दो वर्ष तक सैन्य अस्पताल में रहने के बाद नवीन गुलिया को सेना से सेवानिवृत्त कर दिया गया। उनके सेवानिवृत्ति के प्रमाणपत्र पर लिखा था-100 प्रतिशत Disabled for life । पुणे में रहते हुए ही इन्होंने 99 प्रतिशत अंको के साथ दो साल का कम्प्यूटर कोर्स पास कर लिया था। इनकी संकल्प शक्ति का कमाल है कि इन्होंने 18632 फिट ऊँचे मार्सिमिक दर्रे पर टाटा कंपनी द्वारा उपलब्ध कार से पहुँचकर ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड’ में अपना नाम दर्ज कराया। ( यह कार कुछ इस तरह बनाई गई थी कि जिसे विकलांग नवीन गुलिया जी चला सके)  इनके साथ इस अभियान में कई पत्रकार भी थे। इनकी यह कथा बहुत ही प्रेरणा दायक है। ऐसे जीवट वाले व्यक्ति समाज के लिए अनुपम उदाहरण है जो हताश निराश व्यक्तियों में आशा का संचार कर सकते हैं।आज भी ये गुरुग्राम के पास अपने ग्राम ‘बरहाना’ सामाजिक कार्यो में लगे है और अनेक युवाओं को भावी जीवन के लिए तैयार कर रहे हैं। इनका मानना है-‘मैं एक सैनिक हूँ। मैं फौजी सैनिक न बन सका,किन्तु एक सामाजिक सैनिक तो हूँ।आज की सबसे बड़ी लड़ाई समाज सुधार की लड़ाई है और इस लड़ाई के मैदान में मैं एक अथक योद्धा हूँ।’

‘वीर स्थली का सिंह नाद’ में लेखिका ने 1 जुलाई 2016 को 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस के 50 वें स्थापना दिवस का वर्णन किया। इस समारोह सेना में सेवानिवृत्त हुए अधिकारी और इस यूनिट के शहीद हुए सैनिकों के परिवार भी आए हुए थे। लेखिका भी सपरिवार समाहरोह में आमंत्रित थी। लेखिका ने 9 पैरा स्पेशल फोर्सेस के योगदान और इससे जुड़ी स्मृतियों को सुंदरता से उकेरा है। जिससे ये क्षण और भी यादगार बन गए।

‘अनाम सैनिक’ में लेखिका ने पूर्वोत्तर फैले उग्रवाद को समाप्त करने के लिए चलाए गए अभियान का उल्लेख किया है। के1 पैरा स्पेशल फोर्सेस की कमान लेखिका के पति ‘कर्नल पाधा’ ने सँभाल रखी थी। इन सभी सैनिकों को हैलीकॉप्टर द्वारा जंगल में उतारा गया। रात्रि को विश्राम करने के लिए इन्होंने एक टीले को चुना। वहाँ रात गुजारने के लिए ज़मीन खोदते है तो उन्हें वहाँ दो हैलमेट,अस्थि अवशेष और दो जापनी रायफल्स मिली। जाँच करने पर अनुमान लगाया  कि ये द्वितीय विश्व युद्ध में किसी हमले में मारे गए दो जापानी सैनिकों के अस्थि अवशेष हैं और उन्हीं की ही ये रायफल्स हैं। बाद में यूनिट से धर्म गुरु को बुलाकर उनका संस्कार किया गया और वहाँ एक चिह्न लगाया-‘विश्व युद्ध में शहीद हुए दो गुमनाम जापानी सैनिकों का स्मृतिस्थल।’

लेखिका ने युद्ध और युद्ध के बाद के अनेक पक्षों को अपनी इस पुस्तक में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। इस प्रकार की रचनाएँ आज के समाज के लिए प्रेरक और मार्गदर्शक है।

Email- swarajharipur@gmail.com)

6 comments:

Sudershan Ratnakar said...

‘निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ’ शशि पाधा जी की पुस्तक की स्वराज सिंह द्वारा अच्छी समीक्षा।

Sudershan Ratnakar said...

शशि जी ‘निर्भीक योद्धाओं की कहानियाँ ‘पुस्तक के लिए प्राप्त पुरस्कार के लिए आपको बहुत बहुत बधाई।

पूनम सैनी said...

ये तो पूरी की पूरी पुस्तक ही पाठ्यक्रम में शामिल करने योग्य है। बहुत ही प्रेरणादायक पुस्तक है और स्वराज जी ने बहुत उम्दा समीक्षा की है इसकी।समीक्षा पढ़कर तो विस्तार में पुस्तक पढ़ने को जी कर रहा है।आप दोनों को बधाई।शशि जी को मिले पुरस्कार के लिए शुभकामनाएंँ।

शिवजी श्रीवास्तव said...

सुंदर समीक्षा हेतु स्वराज जी को बधाई।समीक्षा के माध्यम से पुस्तक में वर्णित निर्भीक योद्धाओं की गाथाएँ रोमांच पैदा करती हैं,साथ ही गर्व का अनुभव होता है।शशि पाधा जी की लेखनी को नमन।

ऋता शेखर 'मधु' said...

बहुत अच्छी समीक्षा। पढ़कर पुस्तक तक पहुंचने की ललक जागृत हुई। आदरणीया शशि पाधा जी को पुरस्कार हेतु हार्दिक बधाई। समीक्षाकार को साधुवाद।

नीलाम्बरा.com said...

बहुत सुन्दर। आदरणीया शशि पाधा जी को पुरस्कार हेतु हार्दिक बधाई। समीक्षक को हार्दिक शुभकामनाएँ।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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