July 10, 2020

ललित निबन्ध

जब दोस्त पुराना मिलता है
-ख़्तर अली
पुराने दोस्त से मिलना सिर्फ दोस्त से मिलना नहीं होता है। यह उन लम्हों से मिलना होता है जो बीत गए है, यह उन दृश्यों में विचरण करना होता है जो बदल गए है, यह उन बुजुर्गो से बतियाना होता है जो गुजऱ गए है।
बरसो का बिछड़ा दोस्त जब पीछे से आवाज़ देता है तब वह शब्द कानो में रस घोल देता है, वह शब्द ऐसी झंकार पैदा करता है कि पूरा व्यक्तित्व झूमने लगता है। फिर रे, तू , बे जैसे शब्द दुनिया की सबसे शालीन भाषा बन जाते है। उस वक्त तो खुशियों की बारिश हो जाती है, जब वह उसी पुराने लहज़े में गाली देकर पूछता हैये बता इतने सालों से था कहाँ?
इस एक प्रश्न के जवाब में पिछले बीस पच्चीस तीस वर्षो का लेखा जोखा शामिल होता है। दोस्त की गाली सुन कर पहली बार अहसास होता है कि गाली इतनी मीठी, इतनी पौष्टिक, इतनी रूमानी, इतनी रसीली, इतनी नशीली, इतनी चुम्बकीय होती है। दोस्ती के बही खाते में सिर्फ आय ही होती है, व्यय का इसमें कोई काँलम नहीं होता। दुनिया जिसे हानि मानती है, दोस्ती में वही शुद्ध लाभ कहलाता है।
रोज़ी रोटी दोस्त को दोस्त से दूर कर देती है, वरना दो दोस्त के बीच एक ज़माना ऐसा भी गुजऱा होता है, जब लोग एक दोस्त के हाल चाल की जानकारी दूसरे दोस्त से लिया करते थे।
हर उस्ताद अपने दोस्त का शागिर्द होता है। बिछड़े दोस्त से मिलते ही मदरसे का भूला सबक याद आ जाता है। दोस्त जब गले में हाथ डालकर पूछता हैकैसा है? तब जीवन सार्थक हो जाता है, बढ़ती उम्र घट जाती है, जून दिसंबर लगने लगता है। जब दोस्त पुराना मिल जाता है, तब जि़ंदगी के चौराहे पर खड़ी साँसों की गाड़ी को उमंग का ग्रीन सिंग्नल मिल जाता है। जब दोस्त की कमर में हाथ डालकर पथरीली ज़मीन पर भी चलो,  तो नर्म कालीन पर चलने का अहसास होता है।
जीवन के प्रात:काल वाले मित्र के साथ जब जीवन के संध्याकाल में घूमते हुए शहर के बाहर किसी छोटी सी बस्ती में किसी टपरीनुमा होटल में फूटे कप में चाय पियो, तब जो आनंद मिलता है वह कश्मीर, शिमला, मसूरी और नैनीताल की वादियों में भी नसीब नहीं हो सकता। वहाँ चुप बैठे जब दो दोस्त एक दूसरे को देख रहे होते है तब होठ तो चुप रहते है लेकिन आँखों ही आँखों में सवाल जवाब, शिकवे शिकायत की तकऱीर जारी रहती है।
मित्रता का जो रसायनशास्त्र है, उसके भूगोल ने जो इतिहास रचे है, उससे गणित के सभी सूत्र विल हो  गए  हैं। ढाई अक्षर से बने इस शब्द पर वर्णमाला भी गर्व करती होगी। बोलने वालो की भीड़ में दोस्त ही कमात्र ऐसा शख्स है, जो सुनता है। दोस्त एक रूहानी रिश्ता है, इसका कोई बाहरी आवरण नहीं होता। दोस्त बनाने की कोई रेसिपी है, न कोई मन्त्र है। किसी कारखाने में दोस्ती का निर्माण नहीं किया जा सकता। इस ब्रह्माण्ड में किसी का किसी का दोस्त हो जाना, फूल खिलने, चाँद चमकने और बारिश होने जैसी प्राकृतिक घटना है।
मै हर पल हर घड़ी पर वाले से यही दुआ माँगता रहता हूँ कि या अल्लाह इस दुनिया में हर शख्स को एक दोस्त ज़रूर देना। जिसका कोई दोस्त न हो किसी को भी इतना दरिद्र इतना निर्धन नहीं रखना।

सम्पर्क: निकट मेडी हेल्थ हास्पिटल, आमानाका, रायपुर (छत्तीसगढ़) मो.न. 9826126781  

3 Comments:

प्रगति गुप्ता said...

सच लिखा आज के माहौल में वही धनी है जिसका सच्चा मित्र है।

प्रगति गुप्ता said...

सच लिखा आज के माहौल में वही धनी है जिसका सच्चा मित्र है।

Sudershan Ratnakar said...

जीवन में सच्चे मित्र का होना अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण होता है।यह अलग बात है कि आज के समय में सच्चा मित्र मिलना कठिन है ।

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष