July 25, 2017

हास्य व्यंग्य:

 भीगा आँगन, एक खिड़की
 और दो उदास चेहरे 
- जवाहर चौधरी
प्रेम जैसे मामलों में स्मृतियों के द्वार तभी खुलते हैं ,जब संभावनाओं के दरवाजे बंद हो जाते हैं । एक उम्र के बाद बारिश के साथ पुरानी प्रेमिकाओं को याद करने का मौसम शुरू हो जाता है। मैं खिड़की के पास बैठा हूँ और बाहर पानी के साथ यादें बरस रही हैं । मन गूँगे का गुड़ हो चला है, किसी को बता भी नहीं सकता कि किस चीज से भीग रहा हूँ । बल्कि अभी कोई आकर ताड़ ले, तो छुपाना मुश्किल। हवाएँ चुगलखोर हैं, वरना बरसात के मौसम को कौन अहमक बेईमान कह सकता है। जाने क्यों गरमी या ठंड के मौसम में प्रेमिकाएँ याद नहीं आतीं। ना सही गरमी में, पर ठंड में तो आ ही सकती हैं। एक बार तो स्मृति के प्रतीक स्वरूप उनके भेंटे स्वेटर में घुसने की कोशिश की, जो बड़े जतन से सम्हालकर रखा हुआ था। पता चला कि स्वेटर के साथ स्मृतियाँ भी टाइट हो गई हैं। दम घुटने लगा, तो तौबा के साथ बाहर निकले और पूरी ठंड वैधानिक स्वेटर में काटी। यों देखा जाए तो गरमी का मौसम इस काम के लिए मुफ़ीद है। उमस भरे दिनों में वैसे भी कुछ और करने का मन नहीं होता। फुरसत से उदास हो पंखे के नीचे बैठो और याद करो मजे में। लेकिन 'संविधानअपनी सारी दफाओं के साथ इस उम्मीद से सामने होती हैं कि आप निठल्ले न रहें, बैठे-बैठे तसव्वुरे-जाना किए रहें। लेकिन पसीना बहुत आता है कमबख्त, कुछ गरमी से और उससे ज्यादा 'दीदार-ए-हुस्न-ए-मौजूदसे । ज्यादातर वक्त सुराही-लोटा बजाते गुजर जाता है । लेकिन बारिश की उदासी मीठी होती है, जैसे हवाओं में आम की मीठी महक घुली हो।
तजुर्बेकार स्मृतिखोर बारिश के चलते खिड़की पर उदास बैठने से पहले हाथ में एक मोटी किताब ले लेता है। मोटी किताब का ऐसा है कि वे पढ़ऩे के काम कम, सिर छुपाने के काम ज्यादा आती हैं।
हाथ में मोटी किताब हो तो ज्यादातर मामलों में होता यह है कि लोग आपसे बात नहीं करते, पत्नी भी नहीं। गोया कि किताब न हो राकेटलांचर हो। कालेजों में प्रोफेसरान मोटी किताब थामें निकल भर जाए, तो भीड़ रास्ता दे देती है। ये तजुर्बे की बात है, चाहें तो इसे राज़ की बात भी समझ सकते हैं। अक्सर मोर्चों से स्थूलांगिंनियाँ मोटी किताब देखकर सिकंदर की तरह लौटती देखी गईं हैं।
हाँ तो मैं बारिश शुरू होते ही हाथ में मोटी किताब ले, बाकायदेक्लासिक उदासी के साथ खिड़की के किनारे बैठ जाता हूँ । अब आगे का काम मधुरा को करना था। 'मधुरा’ ! समझ गए होंगे आप। वो जहाँ भी होगी, उसे अवश्य पता होगा कि बारिश का मौसम है और वादे के अनुसार खिड़की पर उदास बैठा मैं उसे याद कर रहा हो सकता हूँ। ठीक इसी वक्त आकाश  में एक बदली एक्स्ट्रा आ जाती है और साफ दिखाई देता है कि आँगन कुछ ज्यादा भीग रहा है। इसका मतलब कनेक्टिविटी बराबर है! अब फालतू हिलना-डुलना, चकर-मकर होना रसभंग करना है। जैसे एक बार ट्रांजिस्टरबीबीसी पकड़ ले तो जरा सा हिलने खिसकने से आप विश्व समाचारों से वंचित हो जाते हैं । बरसात में ऐसे ही यादों के सिगनल होते हैं, जरा एन्टिना हिला कि गए ।
'सुनो ..... क्या कर रहे हो ?’ इधर कान में शब्दचेंटे उधर आकाश में बिजली कड़की ।
'किताब पढ़ रहा हूँ...... दिखता नहीं है क्या!?’जाने स्त्रियाँ पत्नी बनते ही थानेदार क्यों हो जाती हैं ।
'किताब! .... हाथ में तो भगवद्गीता है !
'हाँ! ..... तो ?’
'आपने उल्टी पकड़ी हुई है ।
'अं .... हाँ , पता है । मैं अभी सीधी करने ही वाला था कि बिजली कड़क गई ।
'झूठ ..... सच-सच बताओ उसी कलमुँही को याद कर रहे थे या नहीं ?’
'नहीं ... मेरा मतलब है कि किस कलमुहीं को !!?’
'तुम्हारे हाथ में गीता है, कसम खाओ कि जो कहोगे , सच-सच कहोगे।
'इसमें कसम खाने वाली क्या बात है !?.... तुम भी बस ।
'ठीक कहते हो, रंगे हाथ पकड़े जाने पर कसम की क्या जरूरत है।
'अब ऐसे बारिश के मौसम में कोई याद आ जाए तो गुनाह थोड़ी है।
'गुनाह नहीं है!? खाओ गीता की कसम।
'हाँ गुनाह नहीं है, गीता की कसम।
'तो ठीक है, थोड़ा उधर खसको, जगह दो। मुझे भी किसी की याद आ रही है। मेरा आँगन भी भीग रहा है। कुछ देर मैं भी उदास हो लूँ।
आँगन लगातार भीग रहा था, खिड़की उतनी ही खुली थी, भीतर दो उदास बैठे थे। लेकिन मेरी उदासी अब उतनी क्लासिक नहीं थी।   

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