July 05, 2014

तीन लघुकथाएँ

1. गंगाजल

- रचना गौड़ 'भारती

  हरिद्वार में हरकी पेड़ी पर संध्या समय गंगा आरती के लिए काफी भीड़ जमा होती है। असंख्य श्रद्धालुओं और पण्डों से दृश्य काफी मनोरम था। गंगा तट पर थडिय़ों का बाज़ारगंगाजल ले जाने के लिए हर साइज़ की प्लास्टिक के डब्बे वहाँ उपलब्ध थीं। बहती गंगा में लोग अपने पाप धोने आए थे। गंगा जी की आरती के वक्त चारों ओर आध्यात्मिक माहौल और उसपर असंख्यों जलते हुए दीपों की छवि गंगा में इस दिव्य वातावरण की शोभा बढ़ा रही थी। भीड़ अधिक होने के कारण सबने एक दूसरे का हाथ पकड़ा था कि खो नहीं जाएँ। मगर वहाँ पलक झपकते ही कब जेब कट गई पता ही नहीं चला। यह तभी हुआ होगा जब हाथ ऊँचे कर ताली बजा रहे थे। अब जेब में एक भी पैसा नहीं था। अम्माँ ने गंगाजल मंगवाया था। बिना पैसेबिना प्लास्टिक के डब्बे किसमें गंगाजल भरते। अपने मन को जैसे-तैसे समझा लिया कि शायद गंगा का असर अब कम हो गया है। गंगा मैली हो गई है। लोग पाप धोने के बदले जब अपने पाप बढ़ा रहे हैं तो गंगा बोतल में बंद हो दूसरे शहर पहुँच क्या कर पाएगी। गेट से निकलते वक्त तख्ती पर निगाह पड़ीजिसपर लिखा था-'जेब कतरों से सावधान।

2. एक नया सफर

घर में रोज़ का कोहराम शुरू हो चुका था। बाबूजी की पेंशनअम्माँ  की बीमारीलेनदारों की लम्बी लाइन एक कमरे में चूहों की तरह इधर से उधर भागते छ: भाई बहन। गिरधर रेल की पटरी के पीछे बनी बस्ती में रात दिन यही चिल्ल-पों देख रहा था। मगर उसकी आँखें कुछ और ही सपना सँजोए थीं। चमकती गाड़ीअच्छी नौकरीएक अदद बीवी और दो प्यारे बच्चे। हर तरह की परिक्षाएँ दे डालीं मगर पढ़ाई होगी तभी तो सफलता मिलेगी। घर में लगी इंसानी मण्डी में रह पाना ही मुश्किल थापढ़ाई तो दूर की चीज़ है। घर की खस्ताहाल गाड़ी चरमराने लगी तो आखिरकार गिरधर को कुछ करने का फैसला करना ही पड़ा। क्या करेकहाँ जाएएक भी तो कपड़ा साबुत नहीं बचाहर जगह छेद पैबन्द या झाँकती लाचारी बची थी। रोज़ पटरी देख-देख कर जीने वाले ने सोचा भी नहीं था कि यही पटरी एक दिन उसके लिए जीवन दायिनी बन जाएगी। किसी के मार्गदर्शन से रेल्वे की नियुक्तियों में उसे पेन्ट्रीकार में जगह मिल गई। आज चलती टे्रनों में लाल नीली चैक की शर्ट पहनेंहाथ में चाय का कंटेनर ले चाय-चाय करता वो एक बोगी से दूसरी में आ-जा रहा था। यहीं से शुरू हो गया था एक नया सफर।

3. पाप का घड़ा

महिमा बच्चों को प्रेक्टिकल तरीके से जीवन का पाठ पढ़ाया करती। पिहू दौड़ते हुए आई और मेहमानों के साथ बैठी महिमा से कहने लगी- 'दादी! दादी! मैंने आज मटकी में एक सफेद पत्थर डाला। मैंने लपककर उसका माथा चूम लिया।-  'वाह! मेरी रानी बेटीये तो आपने बहुत अच्छा काम किया।’ मेहमान मेरा मुँह देखने लगे। अचकचाकर मुझे उन्हें पूरी बात बतानी पड़ी। दरअसल मैं अपनी पोती को कभी-कभी भागवत सुनने आश्रम ले जाती हूँ। उसने एक दिन मुझसे पूछा- 'दादी! ये पाप और पुण्य क्या होते हैं। ’  हमें तो याद ही नहीं कि हमने कितने अच्छे और कितने बुरे काम किए हैं। यह समझाने के लिए मैंने मेले में से उसे दो छोटी मटकियाँ लेकर दीं। बाज़ार से दो किलो गोल लोढ़ीनुमा पत्थर भी दिलाए। आधे पत्थरों को काला व आधों को सफेद रंग कर दिया। मटकियाँ भी सफेद व काली हो गईं। फिर उससे कहा- 'पिहु! बेटा जब आप कोई अच्छा काम करोगुडगर्ल वाला तो ये सफेद पत्थरसफेद मटकी में डाल देना। और यदि किसी से झगड़ा करोमारो या गन्दा काम करोकोई तुम्हें पनिशमेन्ट दे तो काला पत्थर काली मटकी में डालना। बालमन को यह बात प्रभावित कर गई। अब उसे इस बात की चिन्ता रहने लगी कि कौन सी मटकी भर रही है। मैंने उसे डराने के लिए उनपर 'गुड’ और 'बैड ’ लिख दिया। लोगों का मुंह मेरी बात सुन खुला हुआ था। मैंने तो बच्चों के लिए एक खेल रचा थाबस।

सम्पर्क: 304, रिद्धि सिद्धि नगर प्रथम कोटा, (राजस्थान) Email- racchu68@yahoo.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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