May 16, 2014

बाल कथा


बुढ़िया 

और 
 बंदरिया 
एक थी बुढ़िया। उसके एक लड़का था। आंगन में पीपल का एक पेड़ था। पेड पर एक बंदरिया रहती थी। बुढ़िया और उसका बेटा दोनों खा-पीकर चैन से रहते थे।
खाते-पीते उसके सब पैसे खर्च हो गए। लड़के ने कहा, "मां! मैं कमाई करने परदेस जाऊं?"
बुढ़िया बोली, "बेटे! तुम चले जाओगे तो मैं यहां बहुत दुखी हो जाऊँगी। यह बंदरिया मुझको आराम से रोटी नहीं खाने देगी।"
बेटे ने कहा, "मांयह बंदरिया तुम्हारा क्या बिगाड़ेगीतुम एक लकड़ी अपने पास रखना और जब भी बंदरिया आएतुम उसे मारना। माँ ! कुछ दिनों में तो मैं वापस आ ही जाऊँगा।" ऐसा कहकर लड़का परदेस चला गया।
माँ बूढ़ी थीं मुँह में एक भी दाँत नहीं था। कुछ भी चबा नहीं पातीथी ; इसलिए वह रोज़ खीर बनाती और ज्यों ही वह उसे थाली में ठण्डा करने रखतीपेड़ से नीचे कूदकर बंदरिया घर में पहुँच जाती। मां को धमकाकर सारी खीर खा जाती।
बुढ़िया रोज़ खीर ठण्डी करती और बंदरिया रोज़ खा जाती। बेचारी बुढ़िया रोज भूखी रहती। वह दिन-पर-दिन दुबली होती गई। आँखे गड्ऐ में धँस गईं। चेहरा उतार गया। वह सूखकर काँटा हो गई।
होते-होते एक साल पूरा हुआ और लड़का घर लौटा।
लड़के ने कहा, "मांतुम इतनी दुबली क्यों हो गईतुम्हें क्या हो गया है?"
माँ  ने कहा, "बेटे! हुआ तो कुछ भी नहींलेकिन यह बंदरिया मुझे कुछ खाने ही नहीं देती। मैं रोज़ खीर ठण्डी करती हूँ और बंदरिया रोज आकर खा जाती है।"
लड़के ने कहा, "अच्छी बात है। अब कल देख लेंगे।"

सवेरे उठकर लड़के ने सारे घर में गीली मिट्टी फैला दी। सिर्फ़ रसोईघर में माँ के बैठने लायक सूखी जगह रखी।
माँ ने रसोई बनाई। घी चुपड़कर नरम-नरम चपाती थाली में रखीं और दूसरी थाली में खीर ठण्डी की।
लड़के ने आवाज लगाई:
बंदरियाओ बंदरिया! आओखीर खाने आओ!
बंदरिया तो तैयार ही बैठी थी। कूदकर अन्दर आ गई।
बंदरिया हाथ-पैर ऊँचे उठाती जाएनाक-भौह चढ़ाती जाय और पूछती जाए, "मैं कहाँ बैठूकहाँ बैठू?"
लड़के ने एक दहकता हुआ पत्थर दिखाकर कहा, "आओओआबंदरिया बहन! सोने के इस पाटे पर बैठो।"
बंदरिया कूदकर आ बैठी। बैठते ही बुरी तरह जल गई। फिर "हायराम मैंजलीमैं जल गई" कहती हुई भाग गई। (अनुवाद : काशीनाथ त्रिवेदी)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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