March 14, 2014

घर- परिवार

महिला प्रधान थारू समाज
अब सत्ता पुरुषों के हाथ

-देवेन्द्र प्रकाश मिश्र

भारत-नेपाल सीमा पर उत्तर प्रदे के दुधवा नेनल पार्क के सघन वन आगो में आबाद आदिवासी जनजाति थारू का समाज कहने के लिए महिला प्रधान है, किन्तु हकीकत में पितृ प्रधानता के कारण सत्ता पुरुषों के हाथों में रहती है, और वह अपनी हुकूमत चलाते हैं। इसके कारण थारू महिलाएँ हाड़तोड़ मेहनती कृषि कार्यो को करने के साथ ही पारिवारिक जीवन-निर्वहन के लिए घरेलू कार्य भी करती हैं। इसका मुख्य कारण है अशिक्षा और जागरूकता का अभाव। महिला उत्थान के लिए चलाई जाने वाली सरकारी योजनाएँ कागजों में सिमटती रही हैं। इसके कारण उनका समुचित लाभ न मिलने से थारू समाज की महिलाओं की स्थिति दयनीय ही बनी हुई है, और प्रथम पायदान पर होने के बाद भी वह दोयम दर्जे का नारकीय जीवन गुजार रही हैं।
भारत-नेपाल सीमा पर तराई के जनपद लखीमपुर के दुधवा नेशनल पार्क के सघन वन क्षेत्र के लगभग चार दर्जन छोटे-बड़े गाँवो के साथ ही उत्तर प्रदे के जिला बलरामपुर एवं गोंडा और उत्तराखंड के कई जिलों में भी आदिवासी जनजाति थारू निवास करते हैं। भारत का तराई क्षेत्र मित्र देश नेपाल की सीमा से सटा होने के कारण नेपाल के सीमावर्ती इलाका में भी थारू जनजाति निवास करती है। इससे इनके बीच में बना बेटी और रोटी का सामाजिक रिश्ता अनादि काल से चला आ रहा है। भारत-नेपाल सीमा पर रहने वाले यह आदिवासी जनजाति थारू अपने को राजस्थान के मेवाड़ शासक महाराणा प्रताप सिंह का वंशज बताते हैं। थारू महिलाओं के कपड़ों, उनकी भेषभूषा एवं जेवरात की बनावट और पहनावा से राजस्थानी संस्कृति की झलक उनमें मिलती जुलती है।  आदिवासी जनजाति थारूओं में प्रचलित जनश्रुति के अनुसार वर्षों पूर्व महाराणा प्रताप सिंह और मुगल बादशाह औरंगजेब से कई महीनों तक घमासान युद्ध हुआ था। इस लड़ाई के दैारान महाराणा प्रताप सिंह को जब अपनी पराजय का एहसास होने लगा था, तब उन्होंने मुगल सैनिकों के जुल्मों से बचाने के लिए रानियों समेत राजघराने की महिलाओं और बच्चों को सेवकों के साथ किले से सुरक्षित रवाना कर दिया था। महाराणा प्रताप सिंह की मौत के बाद असहाय रानियाँ और सेवक भटकते हुए नेपाल और भारत के इस तराई क्षेत्र में आ गए और घने जंगलों में आशियाना बनाकर आबाद हो गए। कालान्तर में इनके बीच हुए सम्बन्धों से जनसंख्या और आबादी का विस्तार होता चला गया। इन महिलाओं का वंशज राजघराना होने से शायद यही कारण है कि थारू समाज में महिला को रानियों वाला उच्च स्थान प्राप्त है। एक प्रचलित प्रथा के अनुसार पुरुषों को रसोई की सीमा में आना या भीतर घुसना वर्जित है, वह भोजन करने के लिए थाली लेकर रसोईघर के बाहर बैठ जाते हैं। स्त्रियाँ रोटी बनाती हैं और अंदर से रोटी फेंककर उन्हें देती हैं। इस तरह का भोजन करने से थारू पुरुष किसी प्रकार का अपमान नहीं मानते हैं। रसोईघर के बाहर बैठकर भोजन करना और रोटी फेंककर क्यों दी जाती है, यह भी उनको नहीं मालूम है। ग्राम गोलबोझी की किरन देवी ने कारण पूछने पर मासूमियत से बताया कि हमने तो अपनी माँ से इसी तरह रोटी फेंककर देते देखा था। हम भी उसी तरह रोटी फेंककर देते हैं।
थारू समाज की महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा अत्यधिक मेहनती और कर्मठ होती हैं। पारिवारिक जीवन में बच्चों का पालन पोषण करना, खाना पकाने के साथ-साथ जंगल से लकड़ी लाना, पालतू पशुओं के लिए चारा की व्यवस्था करना एवं खेतों में मेहनत से काम करना इनके जिम्मे होता है। और यह सभी काम पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाती भी हैं। इस बीच मौका लगने पर तालाब से मछली का शिकार करना थारू महिलाओं का प्रिय शौक है जिसे पूरा करने के लिए यह दिन में समय निकाल ही लेती है। थारू समाज के पुरुषों में शराब पीने की आदत इनको आलसी और कामचोर बनाती है, ये अपना अधिकांश समय इधर-उधर घूमने या शराब पीने अथवा मटरगश्ती करने में व्यतीत करते हैं। बदल रहे समय के साथ थारू समाज में भी बदलाव आया है, इसके बाद भी आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्र काफी पिछड़ा हुआ है, इसीलिए थारूओं में तमाम कुरीतियाँ भी मौजूद हैं। इनमें मुख्य है दहेज प्रथा, पहले कभी यह कुरीति नाममात्र को ही दिखाई देती थी; परन्तु आधुनिकता की बयार ने दहेज को स्टेटस सिंवल बना दिया है, थारू परिवार अब बढ़ चढ़कर दहेज लेने देने लगे हैं। जनजाति क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण परम्परागत ढंग से पुरखों से मिली झाड़-फूँक की तंत्रविद्या से बीमारियों का इलाज करते हैं। इसके लिए बाकायदा गाँव में लोगों का झाड़-फूँक से इलाज करने वाला एक भर्रा भी रहता है, जो अपनी सिद्धि और मंत्रों से सामान्य के साथ गंभीर लाइलाज बीमारियों का इलाज टोना टोटका से करता है। समाज में फैले इस अंधविश्वास के कारण अक्सर गंभीर बीमारियों से ग्रस्त महिलाओं और बच्चों की असमय मौत तक हो जाती है।
आदिवासी जनजाति की महिलाओं को समाज में उच्च स्थान हासिल होने के बाद भी सत्ता पुरुष के हाथों में रहती है और वह अपने परिवार पर हुकूमत अपनी चलाते हैं। आजाद भारत में थारू समाज की न्याय व्यवस्था में सामाजिक फैसले गाँव की पंचायत में होते हैं। थारूओं में प्रेम विवाह करने का प्रचलन है। थारू युवती को मनचाहे युवक से विवाह करने की आजादी हासिल है। लेकिन गैर थारू युवक के साथ थारू युवती को प्रेम करना वर्जित माना जाता है। इसके अतिरिक्त शादीशुदा महिला अगर किसी अन्य युवक से प्रेम करती है और इसकी जानकारी परिजनों को हो जाती है तो पंचायत में महिला के प्रेमी पर सामाजिक तौर पर आर्थिक दण्ड लगाकर उससे जुर्माना लिया जाता है। इस व्यवस्था में तलाक की गुंजाइश बहुत कम होती है, इसके बाद भी अगर महिला का पति जिद्द करके तलाक यानी छुड़ौती करना ही चाहता है, तो पंचायत उस महिला का उसके प्रेमी के साथ विवाह करा देती है। इसके एवज में विवाह करने वाला व्यक्ति इससे पहले महिला की शादी में हुआ पूरा खर्च महिला के पूर्व पति को देना होता है। उन्नति और विकास की फैली किरणों के कारण अब आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्रों में जागरूकता बढ़ी है। सामाजिक फैसलों के अलावा पंचायत में होने वाले जमीनी विवाद आदि मामलों के फैसले अब पुलिस और कोर्ट में होने लगे हैं। इसके बाद भी यह थारू समाज की एक अच्छाई ही कही जाएगी कि गंभीर अपराधों की संख्या लगभग नगण्य ही है।
महिला सशक्तीकरण के दावे थारू समाज की महिलाओं के लिए बेमानी हैं। और अशिक्षित महिलाओं की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। महिलाएँ पूरी तरह से अपने हक और अधिकारों से परिचित नहीं हैं, इसके कारण घर की चहारदीवारी के अंदर वह अपना परम्परागत घरेलू जीवन गुजारती हैं। इससे महिलाओं की स्थिति दयनीय बनी हुई है। यद्यपि आरक्षण के चलते थारू महिलाएँ ग्राम प्रधान के साथ क्षेत्र और जिला पंचायत की सदस्य भी बन रही हैं, लेकिन प्रधानी की बागडोर महिलाओं के पति के हाथ में रहती है अथवा उनके करीबी नाते रिश्तेदार गाँव की प्रधानी चलाते हैं। इस तरह कठपुतली बनी थारू महिला प्रधान अपना सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन का बखूबी निर्वाहन करती हैं। हालाँकि थारू समाज की तमाम युवतियाँ पढ़-लिखकर शिक्षामित्र और टीचर भी बन गई हैं यहाँ तक अब वह सरकारी नौकरियाँ कर रही हैं। इसके बाद भी वह अथवा उनके परिवार की युवतियाँ प्राचीन परम्पराओं की वर्जनाओं को तोडऩे में अक्षम हैं। इन सबके बीच में तमाम गरीब थारू परिवार ऐसे भी हैं जो चाहते हुए भी अपनी लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलाने में असहाय हैं। इन गरीब परिवारों की लड़कियाँ और महिलाएँ आज भी खेतों में मेहनत मशक्कत वाला कमरतोड़ काम करने को विवश हैं और घर की चाहरदीवारी के पीछे सामाजिक परम्पराओं की डोर में बँधकर रहने के लिए मजबूर हैं। इनके लिए सरकार द्वारा उच्च शिक्षा की व्यवस्था उनके घर के आस-पास ही करा दी जाए और उनकी जागरूकता के गम्भीर सार्थक प्रयास किए जाएँ तो शायद तमाम गरीब थारू परिवार की युवतियाँ प्रगति की मुख्य धारा में शामिल होकर अपना भविष्य सँवार सकती हैं।

आधुनिकता की बयार ने बदल दी थारूओं की होली
उत्तर प्रदेश के भारत-नेपाल सीमा पर आबाद आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्र में भी आधुनिकता की चल रही बयार की छाप थारू संस्कृति पर भी पड़ गई है। इसके चलते भोले-भाले एवं सरल स्वभाव के लिए मशहूर थारूओं के परिवारों में भी विघटन की खाइयाँ पडऩे लगी हैं। परिणाम स्वरूप आपसी प्रेम, भाईचारा व सौहार्द के साथ थारूओं में पंद्रह दिनों तक मनाया जाने वाला होली का त्योहार धीरे-धीरे औपचारिकता का चोला धारण करने लगा है। बुजुर्ग थारू अपने जमाने की होली के किस्से कहानियाँ सुनाते हुए नहीं थकते हैं।
भारत नेपाल सीमा पर दुधवा नेशनल पार्क के सघन वनक्षेत्र में रहने वाले आदिवासी जनजाति के थारूजन अपने को महाराजा राणा प्रताप सिंह का वंशज बताते हैं। थारूओं में रंगों का त्यौहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। होली से सात दिन पहले पूजा करने के साथ होलिका की स्थापना कर दी जाती है। इसके बाद से प्रतिदिन युवक युवतियाँ ग्राम प्रधान या भलमानसा के घर आँगन में होली लोकगीतों को गाते हुए सामूहिक नृत्य करते हैं। उधर थारूक्षेत्र में पहुँचने वाले सरकारी अमले समेत नागरिकों को रोककर मनुहार के साथ फगुवा मांगते हैं तथा प्रेम के साथ रंग डालकर होली का प्रचलन होली के बाद तक भी है। होली के दिन पूरा गांव एक स्थान पर एकत्र होता है परंपरागत ढंग से सभी देवी देवताओं का आवाहन करके होली की पूजा करने के बाद होलिका को जलाया जाता है। कीचड़, गोबर के साथ रंगों से होली खेली जाती है। शाम को ग्राम प्रधान सभी को गांव के दक्षिण लगभग एक किमी दूर ले जाता है यहाँ पूजा होती है फिर पीछे घूमकर न देखने की हिदायत देता है। माना जाता है कि दौड़कर गाँव जाते समय पीछे घूमकर देख लेने से बलाएँ साथ-साथ घर पहुँच जाती है। थारूओं में होली के दिन साली अपने जीजा के घर जाकर फगुवा माँगती है तथा परम्परा के अनुसार जीजा को अपने घर आने का न्योता भी देती है। होली मिलन का कार्यक्रम सात दिन तक मौज मस्ती के साथ चलता रहता है।
आधुनिकता की दौड़ में चल रही बदलाव की बयार ने अब बदल रहे जमाने के साथ ही थारूओं में भी उनकी संस्कृति की प्रचीन परम्पराएँ टूटने लगी हैं। आपसी भाईचारा और परस्पर प्रेम के बीच खाइयाँ बढ़ी हैं और परिवारों में विघटन की दरारें चौड़ी होती जा रही हैं। सीधे-साधे सरल थारूओं के स्वभाव में परिवर्तन आ गया है तथा खेती किसानी करके जीविका चलाने वाले थारूजन उन्नति के पायदान पर चढ़ते हुए बिजनेसमैन बन ही गए हैं साथ में अच्छे पदों की सरकारी नौकरियाँ भी कर रहे हैं। आधुनिकता की चल रही बयार की चपेट में आ जाने से होली जैसे पावन त्योहार के भी मायने बदल गए हैं। इससे होली भी अब औपचारिक ढंग से मनाई जा रही है साथ ही बढ़ती महँगाई ने भी होली के त्योहार पर बुरी तरह से असर डाला है। परिणाम स्वरूप पुरानी मान्यताएँ तथा परम्पराएँ इतिहास बनने की कगार पर पहुँच गई हैं। बदले परिवेश की चर्चा करने पर बुजुर्गवान थारू अपने जमाने को होली के रंग बिरंगे किस्से कहानियाँ अतीत से ढूँढकर सुनाते हैं और मायूसी में वह कहते हैं कि भया सबकुछ बदल गया है नई पीढ़ी परम्पराओं पर चलने को तैयार नहीं है आने वाले दिनों में हमारे साथ ही थारू संस्कृति के पुराने रीति रिवाज भी दफन हो जाएँगे।

सम्पर्क-  नगर पालिका काम्पलेक्स पलियाकलाँ, लखीमपुर-खीरी (उ,प्र,)
262902, मो.9415166103, Email- dpmishra7@gmail.com

1 Comment:

shrish srivastava said...

Bahut Achcha likha dada

लेखकों से अनुरोध...

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बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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