April 21, 2012

मिसाल

हृदयेश्वर का कमाल बड़े-बड़े मात खा जाएं

 शतरंज का खेल दो व्यक्ति ही खेल सकते हैं ये सभी जानते हैं लेकिन  हृदयेश्वर सिंह भाटी ने खेल- खेल में एक ऐसे खेल का आविष्कार कर दिखाया है जिसे 6 लोग एक साथ खेल सकते हैं। जयपुर के हृदयेश्वर को चेस- डिजाइन के लिए पेटेंट भी मिल गया है।
जयपुर के देहली पब्लिक स्कूल में कक्षा 4 के इस जीनियस ने शतरंज के नेशनल और इंटरनेशनल नियमों में बिना कोई बदलाव किए यह डिजाइन तैयार किया है। अब से पहले भारत में कश्यप गोगी ने 17 वर्ष और बिप्लव शर्मा ने 16 वर्ष की उम्र में पेटेंट हासिल किया था।
हृदयेश्वर ने एक बार पिता के साथ चेस खेलते- खेलते कहा कि वह अपने दोस्त को भी खेल में शामिल करना चाहता है। इस पर पिता ने समझाया कि चेस केवल दो लोग ही खेल सकते हैं। उसी वक्त हृदयेश्वर ने निश्चय किया कि वह ऐसा डिजाइन तैयार करेगा जिस पर वह अपने पांच दोस्तों तनय विजय, धनंजय, केशव, हर्ष और कनिष्का के साथ खेल सके। पिता से ज्यामिति के नियम समझने के बाद हृदयेश्वर ने एक षट्कोणीय डिजाइन बनाया। इस बिसात पर साइड में चाल चलने पर कुछ परेशानी हुई तो इसके कोण हटाकर इसे गोलाकार कर दिया गया, क्योंकि गोलाई अनंत होती हैं।
इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी इंडिया के तहत डिजाइन रजिस्ट्रेशन होने से पहले ही हृदयेश्वर का हौसला काफी ऊंचा था। अब वह पिता सरोवर सिंह भाटी के साथ मिलकर एक ऐसा शतरंज बोर्ड डिजाइन कर रहे हैं जिस पर 60 लोग एक समूह में शतरंज खेल सकेंगे।
व्हीलचेयर पर होने के बावजूद साढ़े नौ वर्षीय हृदयेश्वर भारत का सबसे कम उम्र का पेटेंट होल्डर बन गया है। वह एक मस्क्यूलर डिस्ट्रॉफी बीमारी के कारण व्हीलचेयर पर हैं।
स्टीफन हॉकिंस जैसे महान वैज्ञानिक को अपना आदर्श मानने वाले हृदयेश्वर भी वैज्ञानिक ही बनना चाहते हैं। हृदयेश्वर के इस कारनामें से यह तो साबित हो गया है कि कोई बड़ा काम उम्र का मोहताज नहीं होता और न ही कोई बीमारी बुलंद हौसलों का रोक सकती है।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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