February 23, 2012

'कहि देबे संदेस' की व्यथा-कथा

'कहि देबे संदेस' की कहानी छुआछूत और जातिवाद पर करारा प्रहार थी। इसके साथ ही फिल्म में सहकारिता पर आधारित खेती (को-आपरेटिव फार्मिंग) को भी प्रमोट किया गया था। कहानी शुरू होती है जमीन के विवाद को लेकर। पटवारी की लिखा- पढ़ी की गड़बड़ी की वजह से जमींदा शिव प्रसाद पाठक (रमाकांत बख्शी) के हक में जा रही जमीन जो थी असल में चरणदास (विष्णुदत्त वर्मा) की। फिर भी अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर जमींदार मामला जीत जाता है। इस अन्याय के खिलाफ चरणदास फरसा उठा कर जमींदार को मारने निकल पड़ता है। इसी दौरान चरणदास की पत्नी फूलबति (सविता) भाग कर जमींदार के घर पहुंचती है और जमींदार की पत्नी पार्वती (दुलारी बाई) से गुहार लगाती है। जब जमींदार इस गुहार को सुनता है तो वह भी बंदूक लेकर चरणदास को मारने निकल पड़ता है। ऐसे में हताश फूलबति जाकर तालाब में कूद जाती है। पीछे आ रहा जमींदार उसे बचा लेता है। इस तरह दुश्मनी को भूल दो परिवार एक हो जाते हैं।

इसी बीच कहानी में जात- पा के भेद को स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के माध्यम से आगे बढ़ाया गया है जिसमें छोटी जात का बच्चा नयनदास जमींदार की बहन गीता को लड्ड़ू देता है गीता भाई शिव प्रसाद के डर से लड्ड़ू कुएं में फेंक देती है। लेकिन बेटे की शिकायत पर सीता और गीता को भाई से डांट खानी पड़ती है।
कहानी आगे बढ़ती है और जमींदार की दोनों बहनें सीता (सुरेखा), गीता (उमा) और चरणदास का बेटा नयनदास (कान मोहन) बड़े हो जाते हैं। गीता और नयनदास का बाल सुलभ आकर्षण प्रेम में परिवर्तित हो जाता है। आदर्शवादी जमींदार दहेज का विरोधी है इसलिए उसकी दोनों बहनों के लिए सही रिश्ते नहीं आते हैं। एक और पात्र कमल नारायण (जफर अली फरिश्ता) स्वजातीय होने की वजह से जमींदार की बहन से शादी करना चाहता है इसके लिए वह पंडित (शिवकुमार दीपक) को प्रलोभित कर बार- बार अपना रिश्ता जमींदार के घर भेजता है। लेकिन जमींदार इसके लिए तैयार नहीं होता। ऐसे में कमल नारायण लड़कियों की बदनामी शुरू कर देता है। नायक नयनदास का डॉक्टर दोस्त भी अपना वादा निभाते हुए उसी गांव में डॉक्टरी करने आ जाते हैं। जमींदार सजातीय होने के कारण डॉ. को अपनी बहन उमा से शादी का प्रस्ताव रखता है पर छोटी बहन सुरेखा डॉ. को पसंद करने लगती है। अंत में उनकी ही शादी होती है। विवाद के कारण मनु नायक वैसा अंत नहीं कर पाए जैसा वे चाहते थे।
रूकावटें भी कम नहीं थी
अंग्रेजी की कहावत 'वैल बिगन इस हाफ डन' की तर्ज पर स्टोरी, कास्टिंग और दूसरे तमाम पहलुओं को फाइनल करने के बाद अंतत: मनु नायक ने तय किया पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म को छत्तीसगढ़ अंचल में ही फिल्माया जाए। वे फिल्म के निर्देशन की जवाबदारी महेश कौल के सहायक के तौर पर सेवा दे रहे रायपुर के निरंजन तिवारी को देना चाहते थे। लेकिन कुछ व्यक्तिगत कारणों से अनुबंध के बावजूद मनु नायक ने निरंजन तिवारी की जगह खुद ही निर्देशन की जवाबदारी सम्हालने का फैसला लिया। फिर भी 'कहि देबे संदेस' के रास्ते में रूकावटें कम नहीं हुईं। फिल्म निर्माण के लिए मनु नायक का रायपुर के व्यवसायिक भागीदारों नारायण चंद्राकर और तारेंद्र द्विवेदी के साथ बाकायदा अनुबंध हुआ था, जिसमें प्रमुख रूप से इस बात का उल्लेख था कि श्री नायक अपनी पूरी टीम लेकर रायपुर पहुंचेंगे और इन भागीदारों द्वारा पहले से तय की गई लोकेशनों पर शूटिंग होगी जिसका सारा खर्च भी भागीदार ही उठाएंगे। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था, उन्होंने अनुबंध तोड़ दिया।
ऐसे मुश्किल वक्त में मनु नायक को रायपुर के रामाधार चंद्रवंशी, पलारी के विधायक बृजलाल वर्मा, बीडीओ एपी श्रीवास्तव और पलारी गांव के लोगों का उदार सहयोग मिला। फिल्म के टाइटिल में मनु नायक ने इन सभी लोगों का आभार भी जताया है।
विवाद की कहानी
मनु नायक ने बताया कि मेरी फिल्म 'कहि देबे संदेस' को जबरिया विवादित कराने का श्रेय रायपुर के उन सगान को जाता है, जिन्हें मुंबई में मैं अपनी इस फिल्म में एक महत्वपूर्ण जवाबदारी दे रहा था। लेकिन वह रात भर ड्रिंक करके सुबह उपलब्ध नहीं होते थे। इसलिए मैनें उन्हें अपनी फिल्म से हटा दिया। इसे उन्होंने अपना अपमान समझा और रायपुर आकर लोगों को भड़का दिया कि इस फिल्म में उनके समुदाय को नीचा दिखाया गया है। इससे लोग एकजुट हो गए और धमकी दे दी कि टॉकीज में आग लगा देंगे और किसी भी हालत में इस फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे। मनोहर टॉकीज के संचालक शारदाचरण तिवारी जी इन धमकियों से बेहद परेशान थे, उन्होंने भी फिल्म के पोस्टर अपने यहां से उतरवा लिए और फिल्म प्रदर्शित करने से मना कर दिया। इसके बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। मेरी फिल्म में एक पात्र का नाम कमल नारायण है। संयोग से इसी नाम के एक चर्चित वकील और कांग्रेसी नेता रायपुर में थे। उन्होंने भी आपत्ति जता दी कि उन्हें व उनके समुदाय को बदनाम करने के लिए खल पात्र का नाम कमल नारायण जानबूझकर रखा गया है। उन्हें भी मैनें किसी तरह समझाया।
इंदिरा गांधी ने देखी सांसदों-विधायकों के साथ
जिन लोगों ने विवाद को हवा दी थी उन्होंने दुर्ग और भाठापारा में फिल्म रिलीज होने के तुरंत बाद कु लोगों को दिल्ली ले जाकर फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर दी। उच्च स्तरीय शिकायत के बाद तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने फिल्म देखने के लिए एक कमेटी बनाई। स्क्रीनिंग की तारीख तय हुई तो मैंने मंत्रालय में अपील की कि इस दौरान छत्तीसगढ़ के तमाम सांसदों और दिल्ली में उपलब्ध छत्तीसगढ़ के विधायकों को भी बुलवाया जाए। लिहाजा सांसद डॉ. खूबचंद बघेल, मिनीमाता और विधायक बृजलाल वर्मा सहित कई लोगों ने फिल्म देखी।
स्क्रीनिंग के दौरान श्रीमती गांधी भी पहुंची उन्होंने फिल्म का कुछ हिस्सा देखा और रायपुर की कांग्रेसी सांसद मिनी माता से कुछ जानकारी ली। मैं उस स्क्रीनिंग में नहीं था। मुझे माता जी और डॉ. बघेल ने बताया था कि इंदिरा जी ने फिल्म को बड़े चा से देखा था। इसके बाद माताजी ने मुझे इंदिरा जी से मिलवाया तो मैनें तुरंत उन्हें विवाद की पृष्ठभूमि का सार बता दिया। इस पर उन्होंने कहा कि 'नहीं-नहीं आपने बहुत अच्छी फिल्म बनाई है और ऐसी फिल्म और बननी चाहिए।' इसके बाद शाम को उन्होंने प्रेस में अपना वक्तव्य दे दिया कि- यह फिल्म राष्ट्रीय एकता पर आधारित है।
फिर तो सारा विरोध स्वत: दब गया। हालांकि रायपुर में एक समुदाय विशेष के लोग तब भी मेरी फिल्म को लेकर परेशान थे। उनके समुदाय के कुछ बुजुर्ग मेरे रायपुर वाले घर में आकर रोज आजिजी करते थे कि-'भांवर के सीन भर ला काट दे ददा। ऐसे में रोज-रोज की आजिजी से तंग आकर मैनें नायक- नायिका के फेरे सहित कुछ दृश्य काट दिए। मैनें अनमने ढंग से सिर्फ नायिका की बिदाई दिखा कर नायक को फौज में जाते हुए एक दृश्य डाल दिया। हालांकि इस दृश्य की वजह से ही फिल्म का अंत गड़बड़ा गया।
एक चिटठी से फिल्म हुई टैक्स फ्री
नई दिल्ली में विवाद का पटाक्षेप होने के पहले से मैं मध्यप्रदेश के तत्कालीन रेवेन्यू मिनिस्टर से मिलकर अपनी फिल्म को टैक्स फ्री करवाने की जुगत में लगा था। लेकिन कोई बात नहीं बन रही थी। ऐसे में मंैने तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र को एक चिटठी लिखी। जिसमें मैंनें अपना उद्देश्य उल्लेखित करते हुए अंत में लिखा कि-'एक महान जननेता के रूप में ही नहीं बल्कि 'कृष्णायन' के अमर रचयिता के रूप में भी आपका सम्मान है।' हालांकि मुझे पहले ही (डॉ. एस. हनुमंत) नायडू साहब ने उन दिनों की चर्चा के मुताबिक बता दिया था कि श्री मिश्र ने 'रामायण' की तर्ज पर 'कृष्णायन' लिखवाई है। खैर, इसी दौरान दिल्ली में फिल्म की स्क्रीनिंग हुई और श्रीमती गांधी का बयान सारे प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हो गया। इसके बाद बिना किसी कोशिश के खुद मुख्यमंत्री ने मुझे बुलवाया और कहा कि- जहां ऐसे मुद्दे पर नाटकों का मंचन तक नहीं होता वहां आपने पूरी फिल्म बनाई है यह बहुत बड़ी बात है। इस तरह उन्होंने बिना देखे ही मेरी फिल्म को टैक्स फ्री घोषित किया।
बाद में मेरी श्री मिश्र के साथ एक और बैठक हुई जिसमें उन्होंने मुझे मध्यप्रदेश शासन का फिल्म सलाहकार नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा। हालांकि यह सब उस वक्त धरा रह गया, जब हमारे पलारी के विधायक बृजलाल वर्मा ने 36 विधायकों के साथ बगावत कर श्री मिश्र की सरकार गिरा गोविंद नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया था। मेरी फिल्म टैक्स फ्री करने के साथ ही मध्यप्रदेश शासन के समाज कल्याण विभाग ने भी एक प्रिंट खरीदा। तब करीब 10 साल तक विभाग की ओर से मध्यप्रदेश विशेषकर छत्तीसगढ़ के गांव- गांव में मेरी फिल्म का प्रदर्शन होता था। आज भी भोपाल में विभाग के पास मेरी फिल्म का प्रिंट रखा होगा।
मुहूर्त शॉट रायपु के विवेकानंद आश्रम में
14 नवंबर की शाम पलारी रवाना होने के पूर्व मनु नायक के सामने दुविधा थी कि पूरे एक दिन टीम को खाली कैसे रखें। इसका भी उपाय उन्होंने सोच लिया पास ही रामकृष्ण मिशन आश्रम में जाकर उन्होंने स्वामी आत्मानंद से मुलाकात की और धूम्रपान की पाबंदी की शर्त पर आश्रम के भीतर एक दृश्य फिल्माने की इजाजत ले ली। इस तरह 'कहि देबे संदेस' के मुहूर्त शॉट के तौर पर 14 नवंबर 1964 को पहला दृश्य हॉस्टल के एक कमरे में दो दोस्तों कान मोहन और कपिल कुमार के बीच की बातचीत वाला दृश्य शूट किया गया। पलारी में फिल्म की शूटिंग शुरू तो हुई लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत थी कच्ची फिल्म की। शूटिंग के लिए तब ब्लैक एंड व्हाइट कच्ची फिल्म ब्रिटेन से समुद्री मार्ग से आती थी। भारत-पाक युद्ध के चलते देश में आपातकाल के चलते कच्ची फिल्म के लिए लगभग राशनिंग की स्थिति थी। ऐसे में मनु नायक के सामने चुनौती थी कि जितनी फिल्म मिल सकती है उससे कम से कम रि-टेक में शूटिंग पूरी करें। इस चुनौती को भी उन्होंने पूरा भी किया।
प्रीमियर रायपुर के बजाए दुर्ग में
पोस्ट प्रोडक्शन के बाद अंतत: 14 अप्रैल 1965 को फिल्म रिलीज हुई दुर्ग की प्रभात टाकीज में। फिल्म का प्रीमियर होना था रायपुर के मनोहर टॉकीज में, लेकिन कतिपय विवाद के चलते टॉकीज के प्रोप्राइटर शारदा चरण तिवारी ने अनुबंध के बावजूद दो दिन पहले ही फिल्म के प्रदर्शन से मनाही कर दी। यह अलग बात है कि दुर्ग में यह फिल्म बिना किसी विवाद के चली, फिर इसे भाटापारा में रिलीज किया गया और सारे विवादों के निपटारे के बाद जब फिल्म टैक्स फ्री हो गई तो रायपुर के राजकमल (आज के राज टॉकीज) में प्रदर्शित हुई।
रूपहले परदे पर भिलाई दिखाने की ऐसी मेहनत
'कहि देबे संदेस' में मन्ना डे की आवाज में गाया गीत 'दुनिया के मन आघू बढ़ गे' में स्वतंत्र भारत के पहले औद्योगिक तीर्थ भिलाई पर गीतकार डॉ. एस. हनुमंत नायडू राजदीप ने 'भिलाई तुंहर काशी हे ऐला जांगर के गंगाजल दौ, ऐ भारत के नवा सुरूज हे इन ला जुर मिल के बल दौ, तुंहर पसीना गिरै फाग मा नवा फूल मुस्काए रे' जैसी सार्थक पंक्ति लिखी है। फिल्म में इस गीत के दौरान जहां यह पंक्तियां आती है ठीक वहीं भिलाई के दृश्य आते हैं। इसकी शूटिंग की भी बड़ी रोचक दास्तां है।
मनु नायक इस बारे में बताते हैं सीमित खर्च में फिल्म पूरी करना एक चुनौती थी और वह दौर बेहद कठिन था। पाकिस्तान के साथ युद्ध की वजह से आपातकाल लगा हुआ था। एक तो कच्ची फिल्म की विदेश से आपूर्ति नहीं रही थी दूसरा भिलाई इस्पात संयंत्र को सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील मानते हुए इसके आस- पास फोटोग्राफी या शूटिंग पर उन दिनों भारत सरकार द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया था। मेरे लिए मुश्किल थी कि फिल्म डिवीजन से संपर्क नहीं हो पाया था। फिर जो कच्ची फिल्म उपलब्ध थी उसी में मुझे शूटिंग हर हाल में करनी थी। इसलिए प्रतिबंध के दौर में मैंने एक मूवी कैमरा उस वक्त की एक बड़ी वैन में रखा और पहुंच गया आज के बीएसपी के मेनगेट के पास। तब प्लांट की बाउंड्री, मेनगेट और सेक्टर-3 का निर्माण नहीं हुआ था और चारों तरफ दूर- दूर तक मशीनों और मैदान के सिवा कुछ नजर नहीं आता था। मैंने वैन में परदा डाल कर चोरी छिपे भिलाई के शॉट्स लिए। फिल्म रिलीज होने के बाद कई लोगों ने मुझसे इस दृश्य के बारे में पूछा लेकिन हंस कर टालने के सिवा मेरे पास कोई चारा नहीं था।

1 Comment:

राजेश अग्रवाल said...

छत्तीसगढ़ी फ़िल्मी इतिहास के अनछुए पहलू से अवगत हुआ. सचमुच पूरी फिल्म का निर्माण व्यथा की ही कथा है. ऐसा ज़ज्बा आज के निर्माता- निर्देशक दिखा नहीं पा रहे हैं. इसीलिए छत्तीसगढ़ी में फिल्में तो खूब आ रही हैं, पर इनमें से यादगार कोई भी नहीं बन पा रहा है. क्या घर द्वार फिल्म के बारे में भी कोई संस्मरण है?

लेखकों से अनुरोध...

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