November 10, 2011

लघु कथाएँ

- डॉ. शील कौशिक
अमंगल
जनवरी की ठिठुरती ठंड में दो दिन से रुक- रुक कर कुत्ते के रोने की आवाज सुनाई पड़ रही थी। जिस घर के दर के पास जाकर कुत्ता रोने लगता, घर का मालिक डंडा दिखाकर उसे वहाँ से भगा देता। कुत्ते का रोना पूरी गली में चर्चा का विषय बन गया था।
एक ने कहा, 'कुत्ते का रोना अशुभ संकेत है। बाईस नंबर वालों के यहाँ रामेश्वर जी बीमार हैं, कहीं?'
दूसरे ने पहले की बात का समर्थन करते हुए कहा, 'सुना है कुत्ते को यम के दूत दिखाई दे जाते हैं। राम भला करे!'
तीसरे ने कहा, 'कल गली के नुक्कड़ पर कार और स्कूटर का एक्सीडेंट हुआ था। स्कूटर वाले लड़के को बहुत चोट लगी थी। भगवान उसकी रक्षा करे!'
चौथा कहाँ चुप रहने वाला था, तुरंत बोला, 'लगता है किसी आदमी की आत्मा इसमें प्रवेश कर गई है। तभी तो यह आदमी की तरह रो रहा है।'
पाँचवाँ जो चुपचाप सबकी बातें सुन रहा था, क्षोभ से भरकर बोला, 'वह कुत्ता अब मेरे घर में है। उसके पाँव में काँच का टुकड़ा गड़ा हुआ था, जिससे उसे बहुत कष्ट हो रहा था। किसी ने भी उसके दर्द को समझने की कोशिश नहीं की। सभी उसके रोने को अपशकुन समझ कर उसे भगाते रहे।'

बीस जोड़ी आँखें

'रीमा, तुम्हारी सहेली पूजा का फोन था। आज उनके यहाँ किटी-पार्टी है। तुम जरूर जाना। थोड़ा माहौल बदलेगा तो मूड ठीक हो जाएगा।' सुकेश ने ऑफिस जाते हुए पत्नी से कहा।
पिछले दिनों हृदयगति रुक जाने से रीमा के पिता जी का देहांत हो गया था। बहुत समझाने के बावजूद भी वह इस सदमे से उबर नहीं पा रही थी।
जैसे ही रीमा किटी पार्टी में पहुँची, बीस जोड़ी आँखें उसे घूरने लगीं। वहाँ आई औरतों के बीच खुसुर- फुसुर होने लगी। कुछ वाक्य रीमा के कानों में पिघले शीशे की तरह पड़े।
'ऐसी भी क्या जल्दी थी किटी में आने की। बाप को मरे सवा महीना भी नहीं हुआ।'
'देख तो, माथे पर बिंदिया सजा कर आई है!'
'हमें तो इसके यहाँ शोक प्रकट करने जाना था। अब कैसा शोक? यह महारानी तो यहाँ ही आई हुई है।'
'चलो अच्छा है, हम सहानुभूति के दो शब्द कहकर औपचारिकता यहीं पूरी कर लेते हैं। इतनी दूर इनके घर कहाँ जाएँगे।'
एक के बाद एक संवाद रीमा के कानों तक पहुँच रहे थे। उसकी डबडबाई आँखें वहाँ सच्ची सहानुभूति खोज रही थीं।

मिसाल

'रामदीन, एक साथ बीस हजार रुपए निकलवा रहे हो, क्या करोगे? बैंक कर्मी ने पैसे निकलवाने आए चपरासी से पूछा।
'बहुत दिनों से मन में इच्छा थी, स्कूल में वाटर- कूलर लगवाना है।'
'स्कूल में वाटर- कूलर! क्यों? अब तुम रिटायर हो गए हो। तुम्हारे अकाऊंट में बस पचास हजार रुपये ही जमा हैं। कभी भी हारी- बीमारी में जरूरत पड़ सकती है।' बैंक कर्मी ने पड़ोसी होने के नाते उसे समझाया।
'हाँ सब जानता हूँ। इतने साल स्कूल में नौकरी की है। प्रिंसिपल और अध्यापकों के लिए आधा किलोमीटर दूर अस्पताल में लगे वाटर- कूलर से फील्टर का ठंडा पानी लाता रहा। बच्चे बेचारे काई लगी पुरानी टंकी से गर्म पानी पीते हैं। मैंने मन में ठान रखा था कि रिटायरमेंट पर जो पैसै मिलेंगे, उससे स्कूल में बच्चों के लिए वाटर- कूलर जरूर लगवाना है।' रामदीन का चेहरा दमक रहा था।

हवा के विरुद्ध

अरोड़ा दंपति चाय पीते हुए सोच रहे थे 'लगता है अपने डॉक्टर बेटा- बहू भी विदेश में या फिर किसी बड़े शहर में सैटल होंगे। भला हमारे पास इस छोटे- से शहर में आकर क्या करेंगे?'
तभी मोबाइल फोन की घंटी बजी। फोन डॉक्टर बेटे का ही था। उसने कहा, 'हमारी एमडी की पढ़ाई पूरी हो गई है। हम शीघ्र ही आपके पास वापस आ रहे हैं। वहीं अपना क्लिनिक खोलेंगे।'
पति- पत्नी अवाक एक- दूसरे को ऐसे देख रहे थे, जैसे उन्हें सुनी हुई बात पर विश्वास ही न हो रहा हो।
सो इस बार श्रीमती अरोड़ा ने बेटे का मन टटोला, 'बेटा, हमारी तरफ से कोई बंधन न समझना, कल कहीं तुम्हारे दिमाग में यह बात आए कि बड़े बेटे को तो अमेरिका में पढ़ा कर वहीं सैटल कर दिया और हमें यहाँ।'
'कैसी बात कर रही हो माँ? हम ऐसा कुछ नहीं सोच रहे। हमने आपसे और अपने शहर की मिट्टी से जो कुछ पाया है, अब उसे लौटाने की बारी है माँ।' बेटे ने दृढ़ता से कहा।
'देखो बेटा, ये जिंदगी भर का सवाल है। तुम्हारे बच्चे होंगे तो उन्हें पढऩे के लिए बाहर भेजना पड़ेगा। यहाँ अच्छे स्कूल कहाँ हैं? एक बार फिर से सोच लो बेटा।' इस बार अरोड़ा साहब बेटे को समझा रहे थे।
'पापा! हमने अच्छी तरह सोच समझ कर ही फैसला किया है।' बेटे ने उत्तर दिया।
फोन एक बार फिर माँ के हाथ में था, 'बेटा'
'माँ जी! लगता है आप नहीं चाहते कि हम आपके पास आकर रहें।' इस बार फोन पर बहू ने कहा।
'नहीं- नहीं, बेटे! तुम लोग जरूर आओ। तुम यहाँ रहोगे तो हमें बहुत खुशी होगी।' श्रीमती अरोड़ा की आँखों में आँसू छलक आए।

संपर्क- मेजर हाउस-17, सैक्टर-20, हुड्डा, सिरसा (हरियाणा)-125055 मो. 9416847107

1 Comment:

दिलबागसिंह विर्क said...

बेहतरान लघुकथाएँ

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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