April 10, 2011

शवयात्रा

- श्रीकांत वर्मा

शायद अपने अनुभव से उसने पहचान लिया था, यहां बैठने वाले मुफ्तखोर होते हैं और मुफ्तखोरों से उसे जन्मजात चिढ़ थी। उसने एक छोकरे को पैसा दे रंगीन चॉक से सुडौल अक्षरों में अपनी दीवार पर लिखवा रखा था- 'उधार मुहब्बत की कैंची है।'
केवल एक खाट रखने की जगह थी। कोठरी से बाहर निकलकर सिपाही ने सड़क पर इकट्ठे कुछ लोगों से पूछा, इसका कोई वारिस है? जब उसे कोई जवाब नहीं मिला तो उसने अपने आपसे कहा, आखिर इंतजाम तो करना पड़ेगा।
'हिंदू थी या मुसलमान?'
अपनी साइकिल की सीट पर पीठ टिकाए हुए एक कम उम्र लड़के ने कहा,'रंडी थी।'
'मालूम है।' कॉन्स्टेबल ने डपटते हुए कहा।
'सिपाहीजी, सेवावालों को दे दो।' कॉन्स्टेबल की तरफ बीड़ी का बंडल बढ़ाते हुए एक और आदमी ने कहा।
'लाश कल से रखी हुई है। कुछ मालूम है? ज्यादा वक्त करोगे तो पसीज जाएगी, कॉन्स्टेबल साहब, कुछ इसका इंतजाम जल्दी करो।'
बीड़ी का धुआं अपनी नाक से निकालते हुए कॉन्स्टेबल ने कहा, 'आखिर मालूम तो हो, इसका वारिस, रिश्तेदार, भाई-भतीजा कोई है। पहले तो रपट लिखनी होगी, नहीं तो सारी कोतवाली में बोम पड़ जाएगा। हरामजादे मुझी को कहेंगे। कुछ मालूम तो हो।' और बीड़ी के कश लेता हुआ वह गहरी चिंता में पड़ गया। कुछ लोग सिपाही के पास चुपचाप खड़े थे और कुछ दूर हटकर बातचीत कर रहे थे।
आसपास कुछ छोटे- छोटे मकान, कोठरियां और झोपडिय़ां थीं। सड़क पक्की नहीं थी, मगर मुरूम पडऩे के कारण रंगीन लगती थी। सारा दिन हवा में इस मुरुम की धूल उड़ती थी और बस्ती कुछ और निर्जन हो जाती थी।
दो- तीन साल से इमरती- आखिरी स्त्री थी- वहां रह रही थी। कई बार रोक टोक, कलह के बाद भी गई नहीं। बस्ती के लोगों ने भी उसे स्वीकार कर लिया था। जानते थे- वे उससे लड़ नहीं सकते थे। अधिक से अधिक वे उससे बात नहीं कर सकते थे और बात करने का कोई प्रसंग भी नहीं था सिवा उन घडिय़ों के जब वह संवरकर पान की दुकान पर जा खड़ी होती थी।
सुबह से लेकर आधी रात तक फिल्मी गाने- बजानेवाले द सिंध हिंदू होटल में भी शाम के समय जब वह अपने लिए गोश्त का शोरबा लेने आती तब भी वह अपना वक्त जाया नहीं करती थी। शायद अपने अनुभव से उसने पहचान लिया था, यहां बैठने वाले मुफ्तखोर होते हैं और मुफ्तखोरों से उसे जन्मजात चिढ़ थी। उसने एक छोकरे को पैसा दे रंगीन चॉक से सुडौल अक्षरों में अपनी दीवार पर लिखवा रखा था- 'उधार मुहब्बत की कैंची है।'
इमरतीबाई दुनिया से अलग रंडी है। उसके चले जाने के बाद पानवाला कहा करता था, वह ज्यादा बात नहीं करती है। उसके पास ग्राहक भी थोड़े जाते थे और आखिर के दिनों में तो इक्का- दुक्का ही कोई आता था। उसके पास आएगा भी कौन? वह कहता था- न वह गाती है, न कूल्हे मटकाती है। आदमी खाली जिस्म ही थोड़े चाहता है। वखत- वखत की बात है।
यह कहकर टोके जाने पर कि लोग उसके पास नाच- गाना सुनने के लिए नहीं, शरीर के लिए आते हैं, वह जवाब देता- मगर शरीर में भी तो लोच चाहिए। उसके पास वह अदा नहीं रही। इमरती बाई साफ- साफ रंडी थी।
इस समय भी वह दुकान पर पान लगाता हुआ अपनी बातें दुहरा रहा था। और कह रहा था, मैं जानता था- यही हाल होगा। मैंने कहा भी था। इमरतीबाई इलाज करा लो। अब भी बच जाओगी। मगर कमबख्त जिंदगी भर सारी दुनिया को बीमारी बांटती फिरी। अब मरी तो कोई उठानेवाला भी नहीं। मगर कुछ भी कहो, इमरतीबाई साफ- साफ रंडी थी। मुझे उसकी सब बातें मालूम हैं।
फिर उसने यहीं बैठे- बैठे पान पर कत्था लपेटते हुए आवाज दी, 'हवलदार जी, मुरदा जल्दी उठवा लो। बीमारी से मरा है।'
हवलदार उस समय कांच के गिलास में भरी गरमागरम चाय फूंकफूंककर पी रहा था। उसकी बात सुनकर वह उसकी ओर मुड़ा और कुछ कहना चाहा। मगर तभी सामने से म्युनिसिपैलिटी का मैला ढोनेवाली भैंसागाड़ी गली में घुसती नजर आई।
चाय का एक घूंट लेकर गिलास होटलवाले लड़के को थमा गाड़ी की तरफ झपटता हुआ वह बोला, 'क्या नाम है बे तेरा?'
गाड़ी से उतरते हुए गाड़ीवान ने जवाब दिया, 'बंसीलाल।'
'कहां जा रहा है?'
'ड्यूटी पर जा रहा हूं।' उसने बेरुखी से जवाब दिया। उसे सिपाहियों से खौफ नहीं था। अगर भीड़ वहां उसे दिखाई नहीं देती तो वह रुकता भी नहीं। गाना गाता हुआ गुजर जाता। इमरती बाई बाहर आए या न आए, इधर जब उसकी ड्यूटी पड़ती, गुजरता हुआ एक बार गीत जरूर छेड़ देता।
'सुन बे बंसीलाल।' सिपाही ने उसे तरेरते हुए कहा, 'ड्यूटी कैंसिल करो। मरघटी जाना होगा'
'कौन मरा है?' बंसीलाल ने अपना चाबुकनुमा डंडा गाड़ी में रखते हुए कहा।
'इमरती बाई।' भीड़ में से एक ने कहा।
'क्या कहा?' उसे विश्वास नहीं हुआ और उसने फिर पूछा, 'क्या कहा?'
'मुरदा यहां से जल्दी उठाओ और ठिकाने लगाओ, समझे। मैं चलता हूं कोतवाली। रपट देनी होगी।' सिपाही ने उसका कंधा थपथपाया। फिर जेब से एक मैली- कुचैली नोटबुक निकाल पेंसिल से कुछ लिखता हुआ आगे बढ़ गया।
उसने गाड़ी सड़क के किनारे रोक दी थी। जरा देखूं, कहता हुआ वह अंदर की ओर बढ़ गया। अभी तक वहां इकट्ठे लोगों में से कोई अंदर नहीं गया था। वह चला तो उनमें से कुछ उसके साथ हो लिये।
शव चारपाई पर रखा हुआ था। किसी ने उसपर चादर भी नहीं उढ़ाई थी।
बंसी इस कोठरी में पहली बार आया था और अंदर घुसते हुए उसे हलकी सी कचोट भी हुई।
इमरती को उसने बहुत बार देखा था और उसने मंसूबा बना रखा था, एक- न- एक दिन वह वहां जाएगा। गोरी गुलाबी देह और बदन, जो इतना चल चुकाने के बाद भी कसा हुआ लगता था। मगर वह जा कभी नहीं सका। इतने पैसे ही नहीं आए। वह जानता था, इमरती के ग्राहक भले ही कम आएं, रेट उसका ऊंचा है और वह उससे नीचे नहीं उतरेगी। और अगर उतरेगी भी तो उसे क्यों पसंद करेगी। वह अपने रूप- रंग से वाकिफ था। उसे पता था कि वह बदसूरत है और कद छोटा होने के कारण दूसरों की दया और हंसी का पात्र है। इस दया और हंसी से सामना पडऩे पर वह अपना गुस्सा पीकर आगे बढ़ जाता।
ड्यूटी बजाने के बाद शाम को वह सफेद कुरता और महीन धोती पहन सिनेमाघर तक टहलने निकलता और बांसुरी पर फिल्मी गाने बजाकर छोकरों को जमा कर देता। बांसुरी के कारण उसकी अपनी महफिल हो गई थी।
इमरती का मुंह बिल्कुल विकृत हो गया था और होंठ कुछ खुले हुए थे। छाती से धोती उघड़ी हुई थी और जांघ भी काफी खुली हुई थी। उसका यह रूप देखकर उसे कुछ दु:ख हुआ। देर नहीं की जा सकती। यह सोचता हुआ वह बढ़ा और धोती शरीर पर ढक दी।
चारपाई बाहर निकालने की जरूरत नहीं। उसने अपने- आप कहा। फिर लाश को पायताने से पकड़ उसने कहा, जरा मदद कीजिए। एक आदमी ने गरदन और दूसरे ने पीठ पर पर सहारा दिया और लाश बाहर निकाल ली गई।
'जरा रूकें।' उसने फुरती से कहा, 'थोड़ा गाड़ी धो लें।' मुरदे ढोने का उसे अभ्यास था। मगर यह पहला मौका था जब उसे एहसास हुआ कि शव को इस तरह गंदी गाड़ी में नहीं ले जाया जा सकता।
भैंसे की पीठ पर डंडे टिकाता हुआ वह गाड़ी बंबे के पास तक ले गया, नल चालू किया और मजा ले- लेकर गाड़ी धोने लगा। हथेली से वह अपनी गाड़ी बाहर और भीतर पानी उलीचता, फिर एक मैले कपड़े से रगड़- रगड़कर साफ करता। एक बार उचककर वह भैंसे की पीठ पर बैठ गया और अपनी साफ- सुथरी गाड़ी को कुछ प्रसन्न होकर निहारा। फिर अपने आप ही 'जरा और धो लें' कहता हुआ उतरा और जुट गया।
लाश के आसपास दस बीस लोग इकट्ठा हो गए थे। गाड़ी बड़ी तेजी से हांकता वह उनकी ओर आया। जरा हटिए। जरा जगह दीजिए। फिर कुछ हांफता हुआ सा उतरा और अपने को जैसे एक बार एकट्ठा कर आवाज लगाई, 'जरा मदद कीजिए। लाश को सहारा दीजिए।'
कुछ लोग आगे बढ़े और लाश फिर पहले की तरह उठाई गई। जरा संभल के।
वह गाड़ी पर चढ़ गया था और लाश रखने की जगह बना रहा था। मगर जगह इतनी नहीं थी कि शव को लिटाया जा सके। उसे कुछ परेशानी हुई और कुछ म्युनिसिपैलिटी पर गुस्सा आया। इतनी छोटी गाड़ी में तो बच्चे की लाश भी नहीं जा सकती।
'इस तरह नहीं, इस तरह।' उसने और दो लोगों की सहायता से शव को गाड़ी में आधा लिटा दिया। कंधे पर गमछी उतारी और शव के सिरहाने ताकिया सा बनाकर रख दिया। इतना सब कर चुकने के बाद उसे संतोष सा हुआ। गाड़ी पर खड़े ही खड़े एक बार उसने उन सबपर उचटती हुई नजर डाली और अपने को उनसे कुछ ऊंचा अनुभव किया। इसके पहले कि उनमें से कोई उससे कुछ कहे उसने गाड़ी हांक दी और खुद इतमीनान के साथ बैठ गया।
कुछ दूर जाकर मुड़कर उसने पीछे देखा तो भीड़ तितर- बितर हो रही थी। एक आदमी बढ़कर इमरतीबाई के घर का सांकल लगा रहा था।
उसने गाड़ी और तेज कर दी और ठीक मोड़ पर आकर रुका, उतरा और उतरकर देखा, वह ठीक तो है। लाश वैसी ही आधी लेटी हुई थी। केवल इस आपाधापी में वस्त्र खिसक गया था और सारा शरीर लगभग नंगा हो गया था। एक बार उसकी निगाह उस पर गड़ी। फिर उसे शर्म सी आई और उसने फुरती के साथ शरीर को वस्त्र से ढक दिया। फिर पान की दुकान की ओर बढ़ा।
उसकी जेब में सात रुपए थे। तनख्वाह से बचाकर रखे थे। उसने जो-जो चीजें लेनी थीं उनकी फेहरिस्त उसके दिमाग में कई दिनों से थी। रुपए उसने जेब से निकालकर हाथ में ले लिये, फिर दुकानदार की ओर बढ़ता हुआ बोला, 'इनकी रेजगारी दे दो।'
पानवाला उसकी ओर देखकर मुसकराया, 'इतनी रेजगारी नहीं है।'
मगर उसने सुना- अनसुना करते हुए कहा, 'जरा जल्दी करें। वक्त हो रहा है।'
उसने देखा, पानवाले ने एक कपड़े के थैले से ढेर सारी रेजगारी निकाली और गिनने लगा।
थैली हाथ में आते ही उसका हौसला ऊंचा हुआ और वह लपककर बैठ गया।
हांकते हुए उसने देखा, पानवाला और दो-तीन लोग उसे देखकर मुसकरा रहे थे और पानवाला कत्थे की डंडा हिला- हिलाकर उसे भद्दे इशारे कर रहा था।
उसने मन ही मन उन्हें गाली दी और कसकर एक डंडा भैंसे की पीठ पर रसीद किया।
मुहल्ले से बाहर निकलकर उसने फारिग अनुभव किया। धूप तेज थी और इतने परिश्रम के बाद उसे पसीना आ रहा था। पटरियों पर लोग आ- जा रहे थे और दुकानें लगभग खुल चुकीं थीं।
वह एक बार पीछे मुड़ा और देखा कि लाश किस हालत में है। सब ठीक था, केवल सिरहाना कुछ नीचे खिसक गया था। गाड़ी रोककर वह उतरा और सिरहाना उसने फिर ठीक कर दिया।
इधर- उधर करने से शव जब जरा सा हिला तो अचानक वह थरथरा गया। उसके जीवित शरीर को छूने के विचार से उसे कंपकंपी सी हुई और नाडिय़ां जरा जोर से धड़क उठीं। वह फिर अपनी जगह पर बैठ गया था और सोच रहा था, अगर शरीर पर बढिय़ा साड़ी होती तो कितना बढिय़ा होता। उसने उसे कई बार रंग- बिरंगी साडिय़ां पहने दरवाजे पर खड़े देखा था। रानी रूपमती। हर बार उसे लगता था- वह किसी की प्रतीक्षा में खड़ी है। गली में पैदल घुसते ही उसका दिल धड़कता और दरवाजे के सामने से गुजरते हुए तो और भी जोरों से धड़कने लगता। वह बहुत चाहकर भी उससे नजरें नहीं मिला पाता। शर्म से गरदन नीची किए हुए आगे निकल जाता। जब काफी दूर आ जाता तो मुड़कर जरूर उसे देखता और पाता कि वह अब भी वहीं खड़ी है रानी रूपमती। उसके वहां खड़े होने और अपने उधर से गुजरने में एक नाता उसने जोड़ लिया था। एक न एक दिन मैं उसके पास जरूर जाऊंगा।
उसने गोद में रखी हुई थैली टटोली, उस पर प्यार से हाथ फेरा। फिर मुट्ठी भर सिक्के निकाल इधर- उधर देखा और ऊपर की ओर फेंके। क्षण भर बाद सड़क पर बरसते हुए पैसों की झनझनाहट से दुकानों पर बैठे और पटरियों पर चलते हुए लोग चौंक गए। कुछ छोटे- छोटे लड़कों और भिखारियों का हुजूम उस ओर लपका। उसने गाड़ी रोक दी और उन सबको सिक्कों पर टूटते और झपटते हुए देखता रहा। जब सारी सड़क सिक्कों से बुहर गई तब उसने थैली में हाथ डाल मुट्ठी पर सिक्के और निकाले और फिर ऊपर की ओर फेंके तथा भर्राए हुए कंठ से उसने नारा लगाया, 'राम नाम सत्त है।'
'सबकी यह गत्त है।' पैसों पर झपटते हुए उन सबने मशीनी ढंग से दोहराया।
उसने मौज में गाड़ी हांक दी। जानवर की पीठ पर दनादन दस- बीस डंडे लगाए और भागने लगी गाड़ी, और गाड़ी के पीछे पैसे लूटनेवालों की भीड़।
अगले मोड़ पर उसने भागती हुई गाड़ी एकाएक रोकी और चिल्लाया, 'राम नाम सत्त है।'
'सबकी यही गत्त है।'
अब तक गाड़ी के आगे और पीछे अच्छी खासी भीड़ हो गई थी, जिसे वह हांक रहा था। कुछ लोगों ने गाड़ी पकड़ ली थी और गाड़ी अचानक ही मानो अरथी में परिणत हो गई थी।
उसके आस- पास चलता हुआ एक भिखारी, राम नाम के शोर में फुसफुसाता हुआ बोला, 'सेठजी, बाजा कर लो।'
भीतरी विह्वलता में उसकी आंखें प्राय: बंद थीं। अपना सुझाव दोहराते हुए भिखमंगे ने कहा, 'ले आऊँ, सेठजी?'
'ले आओ।' मुट्ठी भर पैसे उसने एक बार सड़क के बाईं और फेंके और पानी के कटाव की तरह भीड़ उस ओर मुड़कर झपट पड़ी।
एक दूसरा भिखारी इस बीच ढेर सारे फूल और कुछ मालाएं ले आया था। गाड़ी रूकी। वह उतरा और सारे फूल और मालाएं उसने शव पर बिखरा दीं।
'कौन था?' उसने सुना, पटरी पर खड़े कुछ लोग बात कर रहे थे।
'इमरतीबाई।' माला फेंकते हुए खुशी में उसका हाथ कांपा।
'इमरतीबाई कौन?'
'रंडी थी।' गुस्से में उसकी नजर उठी।
'मशहूर रंडी।' उसने गर्व के साथ उन्हें देखा।
बाजा अब तक आ गया था।
'बजवाऊं सेठजी?'
'बजवाओ'
वह उचककर फिर अपनी गाड़ी पर बैठ गया और बाजा बजने लगा। बाजे के कारण भीड़ और जुट गई थी। उसने थैली में से पैसे निकाल लिए और सड़क पर छींटने और छितराने लगा।
'राम नाम सत्त है।'
'सबकी यही गत्त है।
इतनी बड़ी भीड़ देखकर वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे कैसे संभाले। मगर उसे विश्वास था वह संभाल लेगा। एक बार उसकी इच्छा हुई, वह इस अरथी की दिशा मोड़ दे और हांकता हुआ ले जाकर ठीक इमरती के दरवाजे रोक दे। उसके मन में गुदगुदी हुई, मगर अपनी गुदगुदी को छिपाते हुए उसने रफ्तार तेज कर दी। धूप तेज हो गई थी। सारा क्रिया- कर्म जल्दी ही निपटाना होगा। सबकुछ जल्दी निपट जाने और खत्म हो जाने के ख्याल से उसे कसक भी हुई। इसी तरह चलता रहे।
उसने सिर ऊपर उठाया और देखा, नौजवान और बूढ़ी स्त्रियां छतों पर निकल आई थीं तथा भीड़ और बाजे से अधिक उसे देख रही थीं। उसने निडर और साफ उन्हें देखा और सुनना चाहा- वे क्या कह रही हैं?
उसने बाजे के शोर में दो- एक शब्द पकड़े, 'अरे कुछ नहीं, बंसी मेहतर है।'
'मेहतर' शब्द सुनते ही सब कुछ किरकिरा हो गया, उसने ऊपर और घरों के दरवाजों पर खड़ी स्त्रियों तथा बच्चों को गुस्से से देखा।
वह अपना मेहतर कहा जाना कभी बर्दाश्त नहीं कर पाता था। वह औरों से साफ रहता था और उसने अपनी जाति के तमाम नवयुवकों से कह रखा था, अगर कोई तुम्हें मेहतर कहे तो मैला मत साफ करो।
अपने लिए मेहतर सुनकर उसे झुंझलाहट हुई। उसने अपने पास- पास चलते भिखारी से झल्लाकर कहा, 'बाजा जोर से बजवाओ।'
थैली टटोलते हुए उसने पाया कि बहुत थोड़े से सिक्के रह गए हैं और उसे संभालकर खरचना चाहिए। पैसे फेंकने के बजाय वह अपनी गाड़ी की टीन की पटरी पर खड़ा हो गया-
'राम नाम सत्त है।'
'सबकी यही गत्त है'
शहर के बाहर नदी थी और नदी के दूसरी तरफ मरघट। दूर से पुल नजर आता था।
उसने थोड़े से पैसे हाथ में लिये और पूरी ताकत के साथ फेंके। ताकि वे दूर- दूर तक बिखर जाएं। चौंधियाकर तितर- बितर होती भीड़ को उसने खुश होकर देखा।
जब गाड़ी पुल तक पहुंच गई तो उसने रोक दी। भिखारी को थैली समेत पैसे सौंपते हुए उसने कहा, 'वापस ले जाओ।'
बाजा बंद हो गया और छोकरों व भिखमंगों की भीड़ लौटने लगी। केवल तीन- चार राहगीर अब वहां खड़े थे।
उसने सुना, उनमें से एक कहा रहा था, 'मैं कहता हूं हिली है।'
'क्या हिला है?' उनकी ओर लपकते हुए उसने कहा।
'तुम्हारा मुरदा।'
'क्या सचमुच हिला है?' मुरदों के जिंदा हो जाने की कहानियां उसने सुनी थीं। उसने सुन रखा था कि कई बाई चिता पर से भी मुरदे उठ बैठते हैं। मरे हुए आदमी के प्राण फिर से वापस आ जाते हैं। यह कैसे होता है, पता नहीं। मगर डॉक्टर तक मानते हैं कि दफनाने के पहले एक बार पूरी शिनाख्त कर लेनी चाहिए।
वह भागकर उस पर झुका। उसने देखा कि शव कुछ खिसक जरूर गया था। उसका हाथ खुशी और अविश्वास से कांप रहा था। उसने चादर के अंदर के शव का हाथ खींचकर बाहर निकाला और नाड़ी पर उंगलियां रख दीं। कुछ धड़क तो रहा था। बड़ी जोर- जोर से। मगर बदल ठंडा है और नाक के पास हाथ ले जाने से सांस नहीं। फिर धड़क क्या रहा है।
अपने सीने पर उसने हाथ रखा और पाया कि दिल के दौरे के मरीज की तरह उसका दिल जोर- जोर से धड़क रहा है। बड़ी जोर- जोर से। गाड़ी उसने फिर हांक दी थी और पुल पर से चला जा रहा था। दोनों ओर पानी का विस्तार था और किनारों पर रेत के टीले, जिन पर धूप चमचमा रही थी। भीड़ से रुखसत पाकर वह बिलकुल अकेला हो गया था और कहीं कोई न था। केवल उसकी गाड़ी का पहिया बोल रहा था।
पुल पार कर उसने गाड़ी ढाल पर उतार दी और मरघट में घुसते हुए उसे भांयं- भांयं सा लगा।
किनारे एक मुरदा जल रहा था। जिसकी दुर्गंध उसकी नाक में घुस गई।
गाड़ी उसने ठीक मरघट के चौकीदार के घर के सामने रोकी, बिलकुल धीरे और संभालकर।
'कौन आया है?' चौकीदार ने अपना रजिस्टर खोलते हुए कहा, 'जलाना है, दफनाना है?'
'... ... ...'
'नाम?'
'इमरतीबाई।'
'उम्र?'
'बत्तीस साल। ' उसने बेखटके कहा।
'पति का नाम?' चौकीदार ने अपनी निगाह उठाते हुए सवाल किया।
वह कुछ रूका, इधर- उधर देखा जैसे कोई सुन तो नहीं रहा है, फिर कहा, 'बंसीलाल बाल्मीकि।' और उसने हाथ बढ़ाकर दस्तख्त कर दिया।
बाहर आकर संभालकर उसने शव उतारा। धोती उस पर पूरी तरह ढक दी। फावड़ा उठाया और गड्ढा खोदने लगा।
अकेलेपन से जूझते श्रीकान्त की अद्भुत कहानी
18 सितंबर 1931 को बिलासपुर में जन्में श्रीकान्त वर्मा कवि, कथाकार, पत्रकार और राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने बिलासपुर में 'नई दिशा' पत्रिका का संपादन किया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महासचिव तथा प्रवक्ता रहे। भटका हुआ मेघ, मायादर्पण, दिनारंभ, जलसागर, मगध, गरुड़ किसने देखा है जैसी कृतियों के रचनाकार श्रीकान्त का निधन 25 मई 1986 में हुआ। 1963 में लिखी 'शवयात्रा' मनुष्य के भीतर के आदिमराग की कहानी है। प्रेम का एक अद्भुत रंग इस कहानी को विशिष्ट बनाता है। मनुष्य मन से जीता है। इस कहानी में समाज की मुख्यधारा से दूर खड़े दो लोगों के रिश्ते का ताना बाना है। उपेक्षा और अपमान से संत्रस्त मनुष्य एक तरफ खड़ा है और दूसरी ओर स्वांग भरने वाले मुखौटेधारी बनावटी लोगों की भीड़ है। यह समाज में व्याप्त द्वंद्व पर केंद्रित कहानी है। शोषितों की अपनी एक दुनिया है जो उन्हें आपस में जोड़ देती है। वर्ग विभाजित समाज किस स्वरूप में अकस्मात एक दूसरे के आगे आ खड़ा होता है इसे किस्से के माध्यम से श्रीकान्त ने इस कहानी में जिस ढंग से अभिव्यक्त किया है वही इस कहानी को अद्भुत दर्जा देता है। इस कहानी का अंग्रेजी अनुवाद भीष्म साहनी ने किया जो इलेस्टे्रेटेड वीकली में 'द फ्यूनरल' शीर्षक से प्रकाशित हुआ।
सत्ता की गाड़ी के पुर्जे के रूप में उपयोगी बनकर जीवन भर खटते रहने वाले श्रीकान्त वर्मा ने अपनी आंतरिक छटपटाहट को ऐसी कहानियों के माध्यम से तथा मगध की कविताओं के जरिए व्यक्त किया।
छत्तीसगढ़ के इस बेहद चर्चित साहित्यकार ने दिल्ली विजय का कीर्तिमान तो बनाया मगर अंतत: उसकी निस्सारता पर अपनी अंतिम रचनाओं के माध्यम से मुहर लगाते हुए ही वे रुखसत हुए। 'हिन्दी की यादगार कहानी' स्तंभ में इस बार 'शवयात्रा'।
संयोजक- डॉ. परदेशीराम वर्मा , एल आई जी-18, आमदीनगर, भिलाई 490009, मोबाइल 9827993494
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