February 17, 2010

चली चली रे... पतंग


नए वर्ष का आरंभ रंग और उमंग लेकर तो आता ही है साथ ही जनवरी माह में आसमान रंग- बिरंगे पतंगों से भर जाता है। पतंग उड़ाने का खेल दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते खेलों में से एक बन गया है। यद्यपि आज इसे महंगे खेलों की श्रेणी में रखा जाता है। कभी शौक से अपने अपने छत और गली नुक्कड़ के बाहर उड़ाये जाने वाले इस खेल के आज दिल्ली में ही लगभग 140 रजिस्टर्ड और लगभग 250 गैर-रजिस्टर्ड 'पतंग क्लब' हैं। ऐसे कई क्लब आगरा, बरेली, भोपाल, इलाहाबाद, बीकानेर, गुजरात, जम्मू आदि सभी शहरों में बन गए हैं, जहां पतंगबाजी की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं।
पतंगों का उड़ाने का इतिहास बहुत पुराना है। एक अनुमान के तौर पर दुनिया में पहली पतंग आज से करीब 3000 वर्ष पहले उड़ाई गई थी। तो जाहिर सी बात है कि कागज के आविष्कार से करीब एक हजार साल पहले से पतंग उड़ाई जाती रही है। उस वक्त पतंग पेड़ के पत्तों से बनाई जाती थी। जापान में आज भी वाशी पेपर से पतंग बनाई जाती है। इंडोनेशिया में तो अब भी पेड़ के पत्तों से बनी पतंगों का उपयोग मछली पकडऩे के लिए किया जाता है। न्यूजीलैंड के मओरी जनजाति के लोग कपड़े और पत्तों से पतंग बना कर उड़ाते हैं।
इससे कुछ और पहले की बात करें तो सदियों तक पतंगों का उपयोग युद्ध में संकेत देने, लक्ष्य भेदने का अभ्यास करने, प्रचार सामग्री आसमान से गिराने आदि में किया जाता रहा है। अमेरिका में गृह युद्घ के समय अमेरिकी सेना पतंगों के जरिए उनसे लड़ रहे सैनिकों की टुकडिय़ों की पहली पंक्ति के पीछे पर्चे गिराती थी, जिनमें उनसे समर्पण करने की अपील की जाती थी। अमेरिका के गृह युद्ध में पतंगों का उपयोग पत्रों को भेजने तथा समाचार पत्रों के वितरण में भी किया जाता रहा है। पुराने जमाने में चीनी लोग बुरी आत्माओं को भगाने के लिए पतंगे उड़ाया करते थे। आज भी चीनी लोगों की मान्यता है कि पतंग उनके अच्छे भाग्य के प्रतीक हैं। चीनियों का विश्वास है कि जब आप आसमान में उड़ती पतंग देखने के लिए अपना सिर ऊंचा कर ऊपर देखते हैं, तो इससे आपके शरीर के भीतर मौजूद अतिरिक्त ऊर्जा का उत्सर्जन होता है और इस तरह आपके स्वास्थ्य का संतुलन बना रहता है। इससे आपकी दृष्टि भी अच्छी रहती है।
पतंग ने किए कई आविष्कार
विश्व में वायुयान उड़ाने के सिद्धान्त के जनक इंग्लैंड के सर जॉर्ज केले माने जाते हैं। वे यार्कशायर में स्कारबोरो के निकट रहते थे। वर्ष 1720 में जन्में सर जॉर्ज ने पतंगों के सहारे ही लिफ्ट और थ्रस्ट के अंतर की खोज की और दुनिया को पहली बार बताया कि किसी विशेष कोण पर वस्तु को उड़ाने पर वह हवा में स्थिर रह सकती है। यदि उस समय ईंजन का आविष्कार हो गया होता तो वे राइट बंधुओं से डेढ़ सौ साल पहले वायुयान का आविष्कार कर चुके होते। ब्रिटिश विद्वान जोसेफ नीधम अपनी पुस्तक साइंस एंड सिविलाइजेशन इन चाइना में लिखते हैं कि काइट वह सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपकरण है जो यूरोप से चीन लाया गया।
जब जापानी लोगों ने प्राचीन काल में मंदिर और प्रार्थना स्थल बनाए तो वे छतों पर टाइल्स और अन्य निर्माण सामग्री पहुंचाने के लिए बड़ी पतंगों का सहारा लेते थे। इसी तरह रूसी 1855 में टारपीडों को सही स्थान पर पहुंचाने के लिए पतंगों का उपयोग करते थे। बेंजामिन फ्रेंकलिन ने पतंग का उपयोग यह सिद्ध करने के लिए किया कि प्रकाश में विद्युत होती है। इसी तरह वर्ष 1999 में फ्लेक्सी इंटरनेशनल की एक टीम ने पतंगों की मदद से इंग्लिश चैनल को दो घंटे 30 मिनट में पार किया था। वे यह चैनल दो घंटों में ही पार कर लेते, लेकिन फ्रांसीसी समुद्री तट पर नौसेनिकों ने उन्हें समुद्री तट की जमीन से आधा मील पहले रोक लिया था। ईसा पूर्व 169 में हान सिन ने पतंग का उपयोग दुश्मन के शिविर में सुरंग की दूरी नापने में किया था। राइट बंधुओं ने 1899 में पतंगों का ग्लाइडर के रूप में और मैदान के निर्धारण के लिए भी किया था। वर्ष 1901 में मारकोनी ने हेक्सागन पतंग का उपयोग पहली बार अटलांटिक के आर- पार रेडियो सिग्नल भेजने के लिए किया था। उन्होंने पतंग का उपयोग एरियल के रूप में किया था। बेन फ्रेंकलिन ने पतंग का उपयोग अपने आपको झील के आर- पार ले जाने के लिए किया था। नियाग्रा नदी के आर- पार केबल ले जाने के लिए भी पतंग काम में लाई गई, ताकि वहां पर पुल बनाया जा सके। वर्ष 1908 में सेमुअल फ्रेंकलिन कोडी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने एक बड़े बॉक्सनुमा पतंग में एक छोटा ईंजन फिट करके पावर्ड एयरक्राफ्ट बनाया और उसे उड़ाया था, हालांकि 1913 में उसी पावर्ड एयरक्राफ्ट में ही उनकी मृत्यु हो गई थी। उन्होंने ही मानव को उड़ाने की क्षमता रखने वाली पतंग प्रणाली का आविष्कार किया था 1903 में पतंगों के सहारे इंग्लिश चैनल पार करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। आज हम आधुनिक पैराशुट और पैरा ग्लाइडर देखते हैं, ये अमेरिका के पतंग निर्माता डोमिना जलबर्ट के पहले पहल पैराफोइल पतंग के बनाने की बदौलत हुआ जो विकसित होते हुए आज के पैराशुट में बदल गया। पतंगों का म्यूजियम दुनिया भर में केवल एक देश अमेरिका में वाशिंगटन के लोंग बीच पर स्थित है। तो सिर्फ खेल मत समझिए हमारी इन रंग-बिरंगी पतंगों को।
(उदंती फीचर्स)

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