October 24, 2009

मिट्टी की महक से रोशन करें घर- आंगन


- सुकांत दास
घर में समृद्धता के लिए गांव के देव स्थलों, घर के पूजा स्थल, भंडार, रसोई और जैसे पवित्र स्थानों पर मिट्टी के दीये जलाकर सुख समृद्धि की कामना आज भी की जाती है और मिट्टी के दिए जलाना शुभ माना जाता है। परंतु दीपावली के हमारे प्रमुख पर्व जिसमें चहुं ओर सिर्फ मिट्टी के दीये ही जलाए जाते थे वहां एक- दो दीपक अंधेरे में झिलमिलाते नजर आते हैं। शहरों की तो बात ही निराली है वहां बिजली के झालरों और मोमबत्तियों ने मिट्टी के दीपक के महत्ता ही खत्म कर दी है।
आज स्थिति यह है कि मिट्टी के बर्तनों को प्लास्टिक के बने सामानों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। जिन स्थानों पर मिट्टी के बर्तन उपयोग में लाए जाते थे, आज वहां प्लास्टिक के बर्तन उपयोग हो रहे हैं। मिट्टी के बर्तन में सबसे अधिक उपयोग चाय पीने के लिए और शादी विवाह जैसे कार्यों में पानी पीने के लिए कुल्हड़ का ही अब तक प्रयोग होता चला आया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से पानी और चाय पीने के लिए प्लास्टिक के गिलासों के चलन ने इस व्यवसाय को बिल्कुल नष्ट सा कर दिया है। तात्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद प्रसाद यादव ने जब रेलवे स्टेशनों पर मिट्टी के कुल्हड़ में चाय बेचने की घोषणा की थी तब कुम्हारों को एक बल मिला था कि हाथ से खिसकता पैतृक व्यवसाय बचा रहेगा। लेकिन उनका आदेश मात्र छलावा ही बन कर रह गया।
ऐसा नहीं है कि कुम्हार अपने जीवन के लिए संघर्ष नहीं कर रहा है, जमाने के साथ वह भी अपने व्यवसाय को आधुनिक बना रहा है और लोगों की रुचि को देखते हुए पारंपरिक दीये के साथ- साथ विभिन्न डिजाइनों के दिये खूबसूरत दिये बनाकर ग्राहकों को अपनी ओर लुभाने की कोशिश कर रहा है। जब उन्होंने देखा कि समय बदल रहा है और मंहगे होते तेल की कीमतों के कारण दिये में तेल डालकर रौशनी करना संभव नहीं रह गया है तो उन्होंने भी बाजार की नब्ज को समझा और अपनी कला को परंपरा से जोड़े रखने के लिए खूबसूरत नक्काशीदार कैंडल स्टेंड का निर्माण करना आरंभ कर दिया, ताकि लोग इन मिट्टी के कैंडल स्टैंड में मोमबत्ती लगाकर अपनी दीवाली को रोशन करें। बस्तर के कारीगर जो मिट्टी में कलाकारी करने के लिए जग- प्रसिद्ध हैं आजकल नए प्रयोग के साथ अपनी कला और व्यवसाय दोनों को जिंदा रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं। काफी हद तक उन्हें सफलता भी मिली है। बस जरुरत प्रोत्साहन और अच्छा बाजार देने की है। अफसोस तो तब होता है जब उनकी कला को मिट्टी है कहकर मिट्टी के मोल की तरह आंका जाता है।
भला इतने खूबसूरत नक्काशीदार दीयों को देखकर किसका मन नहीं ललचायेगा कि वे अपने घर को मिट्टी की महक के साथ सजाएं और रोशन करें। तो  आइए आधुनिकताऔर परंपरा को एक साथ मिलाकर इस दीपावली पर सुख समृद्धि की कामना करें।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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