January 19, 2009

जब गुलाब के फूल देखकर गदगद हुए कमलेश्वर


- महावीर अग्रवाल

उनकी ऊर्जा समाज, पाठक व परिवेश है। वे तो महज हाथी के दांत हैं। खाने वाले तो पाठक हैं। वे जो कुछ लिखते हैं उनकी सामग्री समाज से ही मिलती है। उनका पूरा लेखन मनुष्य के लिए है।

मेरी बांछे खिल गई थीं उस दिन 12 जनवरी 2003 को जब 10-12 मित्रों के साथ संध्या समय कमलेश्वर मेरे घर पधारे थे। यह उन दिनों की बात है, जब बख्शी सृजनपीठ भिलाई के अध्यक्ष सतीश जायसवाल के आमंत्रण पर वे माधवराव सप्रे पर केंदित आयोजन में भिलाई आए थे। मेरी डायरी में लिखा हुआ है कमलेश्वर ने पहली सभा में 'गांधी, जिन्ना और अंबेडकर' की कथा सुनाकर जिस तरह तालियां बटोरीं वह चमत्कार से कम नहीं है। दूसरी सभा में जब उन्होंने 'हमलावार कौन' कथा प्रस्तुत की तो सन्नाटा छा गया। अध्यक्षीय आसंदी से अच्युतानंद मिश्र ने कमलेश्वर को बधाई देते हुए साधुवाद दिया। इसी बीच स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साहित्यकार जमुना प्रसाद कसार ने अपनी पुस्तकें अतिथियों को भेंट की। सियाराम शर्मा, लोक बाबू, परमेश्वर वैष्णव, रवि श्रीवास्तव, विनोद मिश्र, गुलबीर सिंह भाटिया, घनश्याम त्रिपाठी, संतोष झांझी, प्रभा सरस, विद्या गुप्ता, मीना शर्मा और महेशचंद्र शर्मा सहित अनेक साथी आपस में चर्चा करते रहे- अभूतपूर्व कथाओं को प्रस्तुत करने में कमलेश्वर के निराले अंदाज में अनोखा परिष्कार ही नहीं मूल्यबद्धता का समर्पित संस्कार भी नजर आया।

कमलेश्वर लगातार दो दिनों तक साहित्यकारों और अपने पाठकों से घिरे रहे। अधिकांश लोगों ने अपने प्रिय लेखक से आटोग्राफ लिए व उनकी कहानियों, उपन्यासों के बारे में जमकर सवाल किए। कमलेश्वर ने अपनी चिरपरिचित शैली में तर्कसम्मत जवाब दिए। उन्हें जब एक बच्ची शुभी (बुशरा सबा खान) से मिलाया गया और यह बताया गया कि यह उनकी नई पाठिका हैं तो वे भावविह्वल हो गए। (सतीश जायसवाल ने 'इंद्रधनुष सचमुच' कहानी बच्ची शुभी पर लिखी और वह कहानी 'कथादेश' में छपी)।

दो दिनों के सफर और कई सत्रों के कार्यक्रम की मसरुफियत व थकान के बावजूद इकहत्तर वर्षीय कमलेश्वर की बातों में उनके साहित्य की तरह ताजगी व उत्साह दिखाई दे रहा था।

थकान, उकताहट या औपचारिकता का भाव कहीं नहीं था। उनसे पूछा कि आप इतना अच्छा व इतनी अधिक कहानियां कैसे लिख लेते हैं तो उन्होंने उलट कर प्रश्न किया कि बताओ मेरी उम्र क्या होगी?

किसी ने साठ किसी से पैंसठ कहा। पर जब कमलेश्वर ने अपनी उम्र इकहत्तर वर्ष बताई तो सभी चौंक पड़े। उन्होंने बताया कि उनकी ऊर्जा समाज, पाठक व परिवेश है। वे तो महज हाथी के दांत हैं। खाने वाले तो पाठक हैं। वे जो कुछ लिखते हैं उनकी सामग्री समाज से ही मिलती है। उनका पूरा लेखन मनुष्य के लिए है। कमलेश्वर ने बताया कि उनका उद्देश्य साहित्य से रोजी कमाना नहीं है। उनके पाठक उनकी असली पूंजी हैं। पाठक तो 'कितने पाकिस्तान' कृति के फोटो के भी दीवाने हैं। यह बात उन्हें संतुष्ट करती है। वे तो अपने लेखन के लिए कभी किसी से अपेक्षा नहीं करते। एक छात्रा ने पूछा कि क्या आप कभी किसी पाकिस्तानी राइटर से मिले हैं और वे भारत के बारे में कैसी राय रखते हैं। जवाब में कमलेश्वर ने बताया कि कई लेखकों से मिल चुके हैं। अहमद फराज, सुल्तान जावेद जैसे पाकिस्तानी लेखक भी भारत- पाक कटुता व आतंकवाद पर हमारी तरह ही इत्तफाक रखते हैं।



आतंकवाद से किसी का भला नहीं होने वाला है। एक छात्रा ने पूछा अव्यवस्था देखकर क्या आप राजनीति में जाना पसंद करेंगे? कमलेश्वर ने कहा, यदि राजनीति में गए तो वे भी राजनीतिकों की तरह सुख सुविधा से प्रभावित हो जाएंगे। वे अपना काम लेखन से कर रहे हैं और करते रहेंगे।

उन्होंने कहा वे कभी भी फिजूलखर्ची नहीं करते। एक छात्रा ने पूछा यदि आपको अपनी फिल्म 'आंधी' व 'मौसम' आज के परिवेश में दोबारा लिखने कहा जाए तो कैसे लिखेंगे? उन्होंने कहा ये दूसरी तरह की फिल्में थीं। आज एक दूसरी तरह की कहानी बनेगी। अभी इंदिरा गांधी पर पटकथा लिख रहा हूं। फिल्म बनने के बाद उसे देखकर आप सब समझ जाएंगे कि मैं फिल्म किस तरह लिखता हूं। कमलेश्वर ने कुछ अन्य सवालों के जवाब में बताया, कहानी हो, कविता हो या उपन्यास हो हर रचना में चाहे वह चित्रकला व मूर्तिकला क्यों न हो अस्मिता की तलाश व समकालीन मूल्यों का समाहित होना जरुरी है। हम एक जागरूक समाज के पक्षधर हैं और जागरुक नागरिक की तरह लेखक समाज का भी अपना देश होता है। दूसरे दिन पहले हम सब 4 बी, स्ट्रीट 33, सेक्टर-9, 'बख्शी सृजनपीठ' पहुंचे, वहां कहानीकार सतीश जायसवाल ने उनका भावभीना स्वागत किया। कमलेश्वर की सहजता और सरलता ने सबको अभिभूत कर दिया। समय बहुत कम था, इसलिए भागते-दौड़ते हुए कुछ मित्रों के साथ उनके प्रिय परदेशीराम वर्मा, कमलेश्वर को अपने घर ले गए, और फिर वे मेरे घर तक आए, जहां सतीश जायसवाल, अशोक सप्रे, परदेशीराम वर्मा, अशोक सिंघई, प्रशांत कानस्कर और विनोद साव ने मिल-बैठकर एक घंटे गपशप की।

घर की बनी हुई केसर की खीर तो कमलेश्वर जी ने बहुत कम खाई लेकिन नमकीन गुजिया और चटपटे आलू की चाट उन्हें बहुत पसंद आई। इतना ही नहीं किचन में पंहुच कर गृहणी से उन्होंने कहा आप सापेक्ष की प्रबंध सम्पादक हैं , आप सापेक्ष नाम के इस दीपक को हमेशा जलाए रखिएगा। फिर दिल्ली अपने घर आने का आमंत्रण भी दे दिया।

हमारे छोटे से बगीचे में 100 से अधिक गुलाबों की छटा देखने के काबिल थी। एक-एक पौधे में सात से सत्रह तक गुलाब के फूल मुस्कुरा रहे थे। काले गुलाब के साथ हल्दिया, गहरे व हल्के बैंगनी, सुर्ख लाल, पंचरंगी गुलाब, पीला, सफेद और इन्द्रधनुषी गुलाबों की रंगत देखकर कमलेश्वर गद्गद् हो गए। अंधेरा घिर आया था, मैंने फटाफट बाहर से बिजली के लट्टू जला दिए। उन्होंने कहा, महावीर जी इतने बड़े-बड़े और स्वस्थ गुलाब किसी के घर में मैंने बहुत कम देखे हैं। इतना सब मेन्टेन करने के लिए आपका पूरा परिवार बधाई का पात्र है। कमलेश्वर जी का छत्तीसगढ़ और मेरे घर आना आज भी जीवित हैं हमारी स्मृतियों के अंतरिक्ष में।

1 Comment:

DON said...

Excellent...!!

लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
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