October 15, 2008

मुद्दा

आंतकवादी हमले में घायल देश

- विनोद कुमार मिश्र

शनिवार का दिन ऑफिस से आज 6.30 बजे ही निकलने का मौका मिल गया था। मन में ढेर सारे प्रोग्राम थे, कहीं बाहर तफरी करने का मूड था .... अचानक पटना से प्रशांत का फोन आया ... कहां हो? मैंने कहा कनॉट प्लेस पहुंचने वाला हूं। उसने कहा उधर मत जाना! दो -तीन ब्लास्ट हो गए हैं। मैं तब तक कनॉट प्लेस पहुंच चुका था। मन में एक सवाल आया घर चलूं या मौके पर जाऊं ? तब तक घर से भी फोन आ चुका था कहां हो? आप ठीक हो? यही सवाल मेरे सारे चिर परिचित से आ रहे थे। मेरे साथ खड़े लगभग हर के मोबाइल बज रहे थे और हर से यही सवाल पूछे जा रहे थे। घर परिवार के लोग अपनों के सकुशल जान कर निश्चिंत हो रहे थे। कमोवेश यही निश्चिंतता सरकार के साथ भी थी। चूंकि ये सीरियल बॉम धमाके राजधानी दिल्ली में हुए थे जाहिर तौर पर होम मिनिस्टर से लेकर आला अधिकारियों को घटना स्थल पर आना जरूरी था, लेकिन मैंने किसी चेहरे पर कोई तनाव या शिकन नहीं देखा...

शायद इसलिए भी कि पाटिल साहब के गृहमंत्री रहते हुए 11 बड़े सिलसिलेवार धमाके हुए हैं जिसमे अब तक 3000 से ज्यादा लोग मारे गए है। 5000 से ज्यादा लोग जख्मी हुए हैं। जाहिर है इस हालत में कोई भी बुध बन सकता है। पाटिल साहब जीवन मरण से ऊपर उठ चुके हैं। मीडिया ने इस्तीफा मांगा तो पाटिल साहब का जबाव आया मुझे मालूम है कि लोकप्रियता के कारण उन्हें गृह मंत्री नहीं बनाया गया है उन पर सोनिया गांधी को भरोसा है यही उनकी काबिलियत है। आतंकवादी हमले मीडिया के लिए सनसनी स्टोरी है, विपक्षी दलों के लिए राजनितिक हथियार और सत्ता पक्ष के लिए आनी-जानी की चीज।


अमेरिका की एक काउंटर टेरिरिस्म संस्था ने 2004 से अब तक भारत में हुए आतंकवादी हमलों और मारे गए लोगों कि गिनती की है उसके मुताबिक भारत में इन हमलों में 4000 से ज्यादा लोग मारे गए है। यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत का स्थान इराक के बाद आता है। लेकिन भारत में आतंकवाद कभी मुद्दा नहीं बन पाया है। दिल्ली सीरियल ब्लास्ट के बाद मीडिया के चौतरफा हमले के बाद ऐसा लगने लगा था सरकार कुछ ठोस पहल करेगी। लेकिन हंगामेदार कैबिनेट मीटिंग के बाद देश को एक बार यही सुनना पड़ा कि मौजूदा कानून आतंकवाद से लडऩे के लिए सक्षम है। यानी वोट की सियासत के सामने सरकार एक बार फिर झुकी और आतंकवाद से लडऩे का हमारा इरादा हिलते नजर आया।

पत्रकार से उद्योगपति बने राजदीप सरदेसाई जैसे लोग सरकार के सुर में सुर मिलाकर कह रहे हैं कि पोटा के रहते हुए अगर पार्लियामेंट पर हमले हुए तो ऐसी हालत में कड़े कानून कि चर्चा बेमानी है। याद रहे पोटा कानून के कारण ही कुछ लोग पकड़े गए और कुछ लोगों को सजा भी मिली। ये अलग बात है कि सियासत के कारण कानून का फैसला आज बौना साबित हुआ है।
9/11 के बाद पात्रिओत एक्ट लागू कर अमेरिका ने आतंकवादी हमले पर विराम लगा दिया है तो क्या ऐसा कानून भारत में नहीं बनाया जा सकता है। पाकिस्तान-अफगानिस्तान के जेहादियों से अलग एक देशी जेहाद का ताना-बाना बुना जा रहा है। कहा यह जा रहा है कि ये हमले पाकिस्तान के आतंकवादी नहीं कर रहे हैं बल्कि हमारे यहां के तौकीर, शबीर, बशीर, आमिर इंडियन मुजाहिद्दीन के बैनर के तहत हमले को अंजाम दे रहे है, कहा यह भी जा रहा है कि गुजरात दंगों की यह प्रतिक्रिया है। यही मानकर देश का गृह मंत्रालय आतंकवादियों को अपने गुमराह बच्चे मान रहे हैं। इंडियन मुजाहिदीन गुजरात दंगों की तस्वीर छाप कर गृहमंत्रालय को गुमराह कर रहा है। सवाल यह है कि मालेगोव धमाके और हैदराबाद सिलसिलेवार बॉम ब्लास्ट में ज्यादा मुस्लिम समुदाय के लोग ही मारे गए थे। ठीक एक साल पहले ख्वाजा के दरबार में धमाके करा कर दर्जनों नमाजियों को मार दिया गया था। उस धमाके में इंडियन मुजाहिद्दीन कि थ्योरी बदल गई और हुजी समाने आ गई। पिछले वर्षों में जो धमाके हो रहे हैं, उनमें एक ही तरह के केमिकल पाये गए हैं , एक ही तरह कि रणनीति अपनाई गई, फिऱ अलग-अलग मुजाहिद्दीन का नाम क्यों लिया जा रहा है।

प्रधान मंत्री का दावा है कि खुफिया तंत्र को मजबूत करके और जगह-जगह सीसीटीवी कैमरे लगाकर आतंकवाद का मुकाबला किया जा सकता है। सीसीटीवी कैमरे लगाने कि जिम्मेवारी प्रधानमंत्री मुनिसिपल कोउंसिल्लोर पर छोड़ देते तो अच्छा था। रही बात खुफिया तंत्र मजबूत करने कि तो जिस देश में लाख की आबादी पर महज 126 पुलिस कर्मी है जिनमें आधे से अधिक वीआईपी की सुरक्षा में लगी हैं उनसे हर आम आदमी की सुरक्षा बेमानी है। यह तभी संभव हो सकता है जब लोगों में कानून का डर हो। वेस्ट में किसी भी पुलिस कर्मी को यह अधिकार है कि वह किसी को रोककर पूछ-ताछ कर सकते हैं, लेकिन भारत में 100 वर्षों के कानून से अत्याधुनिक यंत्रों से लैस आतंकवाद को रोका जा रहा है। अमेरिका के एक रक्षा विशेषज्ञ ने कहा था मौजूदा कानून अब तक किसी विदेशी आतंकवादी से देश में आतंकवादी हमले को रोक रखा है, लेकिन जिस दिन यूरोप से गोरी चमड़ी के लोग देशी जेहाद के काज्बे से हमला करेंगे तब मौजूदा कानून बौना साबित होगा। कल तक जो लोग आईएसआई के लिए स्लीपिंग मोदुलेस का काम कर रहे थे आज वही लोग इंडियन मुजाहिद्दीन बन कर हमले को अंजाम दे रहे हैं। इस देशी जेहादी को कड़े कानून के जरिये ही रोका जा सकता है। आतंकवाद से मुसलमानों का कोई लेना देना नहीं है लेकिन वोट कि राजनीती करने वाले लोग एक समुदाय को कड़े कानून से डरा रहे हैं। हमें इस ओछी सियासत से जरूर मुक्ति मिल सकती है, लेकिन हमले में मारे गए लोगों में अपने को तलाशने के बजाय हम इस आतंकवादी हमले में घायल देश को खोजें।

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लेखकों से अनुरोध...

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