November 23, 2008

...और उनके घर का वह चबूतरा सूना हो गया

- शंपा शाह

बिरले ही सही, पर, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास बैठकर आपको लगता है कि पृथ्वी सदैव अपनी धुरी पर घूमती रह सकेगी, कि धूप में गरमाहट रहेगी, कि पृथ्वी के जंगल नष्ट नहीं किये जा सकेंगे या विनोद कुमार शुक्ल की कविता की पंक्ति को लें तो लगता है-सब कुछ होना बचा रहेगा।
पुहपुटरा, अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ की सोनाबाई रजवार इन्हीं बिरले आत्मीय जनों में से एक थीं। सोनाबाई को उनके घर के आंगन में, उनकी अपनी ही सिरजी हुई दुनिया से घिरा बैठा देखना एक अनुभव था। वे एक साथ उसमें रमी हुई और उससे निरपेक्ष जान पड़ती थीं जैसे वे इस दुनिया में हों भी और नहीं भी। विलक्षण बात यह कि उनके चेहरे, उनके व्यक्तित्व का वह स्थितप्रज्ञ, अपने में डूबा हुआ-सा भाव उनके काम में भी उतनी ही शिद्दत के साथ प्रतिबिम्बित होता है।
उनके घर के बरामदे में बनी मिट्टी की जालियों की ओर इशारा करते हुए जब मैं बार-बार सोनाबाई से पूछती कि गोल-गोल आकारों से बनी उस जाली को क्या कहते हैं और उस ऊपर वाली जाली का नाम क्या है जिसमें चिडिय़ा बैठी है, तो वे कहतीं - च्नईं जानू मैं! जब ये झिझुंरी (जाली) बनाये रही तब क्या मालूम था कि कोई इसका नाम पूछेगा! तब तो जो मन में आता गया, बनाती गई. वैसे चाहो तो इसे चूड़ी झिंझुरी, और जिसमें चिडिय़ा बैठी है उसे पिंजरा झिंझुरी कह सकते हैं। ज्
नहीं, सोनाबाई ने अपने घर में ये सुन्दर जालियां, ये जानवर, पक्षी, मानव आकृतियां इसलिये नहीं बनाई थीं कि एक दिन लोग आकर उनसे इन सबके बारे में पूछें या इस सौन्दर्य की सृष्टि के लिये उन्हें धन-मान देकर सम्मानित करें। तब प्रश्न है कि सोनाबाई ने ऐसा अभूतपूर्व घर क्यों बनाया जिसके बारे में 1983 में जब पहले-पहल लोगों को पता चला तब से देश-विदेश के कला मर्मज्ञों के आने का सिलसिला आज भी जारी है?
सोनाबाई का सात शब्दों का सीधा-सा जवाब था- च्घर सुघड़ लगेगा ऐसा सोचकर सहज बनाया। ज् लेकिन सोनाबाई तथा उनके इकलौते बेटे दरोगाराम के साथ उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर हुई अंतरंग बातचीत के दौरान वे बातें सामने आईं, जो एक कलाकार के जन्म लेने, खिलने की पूरी प्रक्रिया को सामने लाती हैं। सात भाई-बहनों में से एक सोनाबाई का जन्म छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के केनरापारा गांव में कृषि प्रधान रजवार समुदाय के एक भरे-पूरे परिवार में 1930 के आसपास हुआ था।

चौदह बरस की उम्र में उनका ब्याह पास के गांव पुहपुटरा के रहने वाले होलीराम रजवार के साथ हुआ। सास पहले ही गुजऱ चुकी थीं और ससुर का भी जल्दी ही देहांत हो गया।

ज़मीन जायदाद का बंटवारा ऐसा हुआ कि होलीराम को बस्ती से दूर, खेतों के पास नया घर बनाना पड़ा। गृहस्थी को नये सिरे से जमाना था, लिहाज़ा होलीराम दिन भर खेत में लगे रहते।

छोटी-सी सोनाबाई दिन भर करे तो क्या करें? न आस पड़ौस, न घर में कोई बोलने वाला और फिर घर भी तो अभी अधूरा था। लिपाई-रंगाई अभी बाकी थी। सिर्फ दीवारों और छत से भला घर बनता है? कम से कम सोनाबाई का घर तो इतने से निश्चित ही नहीं बनता।

बचपन में सोनाबाई ने अपनी मां को रंगाई लिपाई करते देखा था। छेरता (मकर संक्रांति) के समय मां लिपाई करतीं, तो तरह-तरह के छोहा निकालती थीं। सरगुजा के इलाके में घर एक विशिष्ट तरीके से लीपे जाते हैं। गोबर-मिट्टी की दीवार पर स्त्रिया छुही यानी सफेद खडिय़ा मिट्टी के घोल में सूती कपड़े को भिगाकर उससे दीवार का एक टुकड़ा पोतती हैं और इसके पहले कि सतह सूखे, वे फुर्ती से उस पर उंगलियों से सीधी, आड़ी, तिरछी, लहरदार लकीरें उकेरती हैं। इस तरह छोटे-छोटे आयताकार खण्डों से मिलकर पूरे घर की लिपाई होती है जिसे छोहा लिपाई कहते हैं।

अपने सूने मकान और उसमें अपने अकेलेपन के इर्द-गिर्द सोनाबाई ने जीवन का ऐसा मेला रचा जिसमें तमाम ऋ तुएं, त्यौहार, जंगल, खेत-खलिहान लहलहा उठे। जब अपना घर बनाने के लिये सोनाबाई ने एक बार मिट्टी हाथ में ली तो फिर वह कभी छूटी ही नहीं। पता नहीं सोनाबाई ने मिट्टी को नहीं छोड़ा या कि मिट्टी ने सोनाबाई को नहीं छोड़ा।

बहरहाल सोनाबाई बताती हैं कि उनके पति खेत से लौटते तो उनके मिट्टी सने हाथ देखकर गुस्सा करते-

च्जब देखो तब हाथ में चिखला (मिट्टी) धरे रहती है। इससे पेट भरेगा क्या? ज्

पर इस गुस्से का सोनाबाई पर कोई असर नहीं हुआ। उनके घर से जाते ही सोनाबाई फिर से चिखला धर लेतीं और काम में जुट जातीं।

आंगन से कमरों को अलग करते हुए जो बरामदे थे वहां धीरे-धीरे एक अलग ही दुनिया आकार लेने लगी। बांस की छोटी-छोटी पतली खपच्चियों को मोडक़र, उसे सुतली से बाँधकर और उस पर फिर मिट्टी चढ़ाकर सोनाबाई ने नाना आकारों की झिंझुरी बनाई और तब उस पर कहीं ढोल बजाते आदमी, कहीं झांकता हुआ शरारती बच्चा, कहीं बिल्ली, शेर, गाय, चिडिय़ा, सांप सब एक-एक कर प्रकट होने लगे।

धीरे-धीरे बरामदे से लगी कमरे की बाहरी दीवारें भी विस्तृत लैण्डस्केप में बदल गईं जिस पर कहीं पीपल की फैली डालों पर उत्पात मचाते बंदर थे, तो कहीं सींग से सींग भिड़ाकर लड़ते बैल थे।

दूर क्षितिज पर एक दूल्हा अकेला ही घोड़े पर चढक़र जा रहा था और दीवार के दूसरे छोर पर लडक़े-लड़कियों का सैला नृत्य करता समूह गुजऱ रहा था। दीवार पर जगह-जगह घने देथा (आलों) में कहीं बकरी शेर के साथ बैठी थी तो कहीं बंसी बजाते हुए कृष्ण विराजमान थे।

सोनाबाई के हाथ जैसे रूकने का नाम ही नहीं लेते थे। यह सिलसिला कई वर्षों तक चला। घर का कोई कोना अब सूना न था, हर तरफ जीवन था।

दोंदकी- वह कोठी जिसमें अगले वर्ष के लिये बीज रखा जाता है, वह भी गाय-बैलों की आरामगाह बन गई थी। अपने सूने मकान और उसमें अपने अकेलेपन के इर्द-गिर्द सोनाबाई ने जीवन का ऐसा मेला रचा जिसमें तमाम ऋतुएँ, त्यौहार, जंगल, खेत-खलिहान लहलहा उठे। अपने अकेलेपन से ऐसा मौलिक प्रतिशोध?

एक क्षण के लिये भ्रम होता है कि बात पारंपरिक कलाकार की नहीं बल्कि किसी आधुनिक चेतना के कलाकार की हो रही है। लेकिन जो जीवित है उसी को तो परंपरा कहेंगे और वह जीवित तभी बच सकती है जब उसकी सिंचाई नित नये विचारों, रूपाकारों से हो।

सोनाबाई से मैंने यह प्रश्न दो साल पहले और पन्द्रह साल पहले भी पूछा था कि उन्होंने यह काम किससे सीखा? उनका जवाब यही था- च्मां से सीखाज् लेकिन इस संबंध में जो तथ्य सामने आये वो बेहद चौंकानेवाले हैं।

1983 में भारत भवन, भोपाल की आदिवासी तथा लोककला दीर्घा के लिये संकलन करने हेतु एक दल सरगुजा के गांवों में पहुंचा। वहां के लोग मुख्य रूप से मिट्टी की पकी हुई चीज़ें खोज रहे थे, तभी अम्बिकापुर गेस्ट हाउस के चौकीदार ने पुहपुअरा की सोनाबाई के घर का हवाला दिया। दल, जिसमें प्रसिद्ध चित्रकार, छायाकार ज्योति भट्ट भी थे, सोनाबाई के घर पहुंचा तो उनकी सिरजी दुनिया को देख दंग रह गया। चंूकि सोनाबाई ने तब भी उन्हें यही बताया था कि यह काम परंपरा से होता आया है और उन्होंने अपनी मां से सीखा था इसलिये दल के सदस्यों ने उस गांव और आस-पास के गांवों का हर घर छान डाला। पर वैसा काम पूरे इलाके में कहीं नहीं मिला। हां जिसे छोहा लिपाई कहते हैं, वह ज़रूर कई घरों में था।

ऐसे अनेक लोग जो यह मानते हैं कि परंपरा तो वह है जिसमें बदलाव नहीं है, जिसमें व्यक्तिगत हस्ताक्षर की जगह नहीं है, जो ज्यों की त्यों पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती जाती है, उनके लिये यह उदाहरण विचलन पैदा करने वाला होना चाहिए। 1983 में सोनाबाई को दिल्ली में राष्ट्रपति सम्मान तथा 1986 में भारत भवन, भोपाल में तुलसी सम्मान मिला। देश-विदेश के लोगों का उनके घर ता3ता लग गया जो आज भी जारी है। कई विदेशी दौरे भी करने पड़े।

इस सब से इलाके में उनका मान-सम्मान बढ़ा और इलाके की बहुत- सी स्त्रियों ने अपने हाथ में चिखला धर अपने घरों को सजाना शुरू किया। आज इस इलाके की कई अन्य प्रतिष्ठित कलाकार भी हैं। भारत भवन के लोग जब खासा दाम देकर सोनाबाई की बनाई कुछ चीज़ें ले गये तब सोनाबाई के पति होलीराम का चकित होना लाज़मी था। उन्होंने क्या सोचा था कि उसकी हर दम चिखला में हाथ साने रहने वाली पत्नी रजवार समाज और उसके घर के लिये इतना सम्मान लायेगी। लेकिन सोनाबाई को इन तमाम सम्मान से जैसे कोई लेना-देना ही नहीं था। वे कहती थीं च्घर के बाहर जैसे ही कोई गाड़ी आकर रूकती थी तो मैं छुप जाती थी, क्योंकि मुझे कहीं भी जाने से डर लगता था। ज्

सोनाबाई का पूरे इलाके में ऐसा ज़बरदस्त असर है कि किसी कला महाविद्यालय का भी क्या होता होगा। उनके अदृश्य विद्यालय से कितने ही स्नातक जिनके कारण दुनिया में 'रजवार पेन्टिंगÓ, 'रजवार क्ले रिलीफ  का आज नाम है किंतु जाहिर है सोनाबाई को इसका श्रेय लेने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।

अभी चार-छ: माह हुए पता चला कि सोनाबाई नहीं रहीं। दो वर्ष पूर्व जब मैं सरगुजा, उनके घर गई थी तो वे मुझे अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठी मिलीं थीं।

बरसात के दिन थे, घर के बेटे-बहू बल्कि आसपास के सारे स्त्री-पुरुष खेतों में रोपा लगाने गए हुए थे। सोनाबाई, सामने फैले खेतों के विस्तार को देखती हुई चबूतरे पर प्रकृतिस्थ बैठी थीं- वैसे ही जैसे खेतों के उस पार पिल्खा पहाड़ बैठा था। (रविवार.com से)

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सोनाबाई को उनके घर के आंगन में, उनकी अपनी ही सिरजी हुई दुनिया से घिरा बैठा देखना एक अनुभव था। वे एक साथ उसमें रमी हुई और उससे निरपेक्ष जान पड़ती थीं जैसे वे इस दुनिया में हों भी और नहीं भी।

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अपने सूने मकान और उसमें अपने अकेलेपन के इर्द-गिर्द सोनाबाई ने जीवन का ऐसा मेला रचा जिसमें तमाम ऋ तुएं, त्यौहार, जंगल, खेत-खलिहान लहलहा उठे। जब अपना घर बनाने के लिये सोनाबाई ने एक बार मिट्टी हाथ में ली तो फिर वह कभी छूटी ही नहीं। पता नहीं सोनाबाई ने मिट्टी को नहीं छोड़ा या कि मिट्टी ने सोनाबाई को नहीं छोड़ा।

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बरसात के दिन थे, घर के बेटे-बहू बल्कि आसपास के सारे स्त्री-पुरुष खेतों में रोपा लगाने गए हुए थे। सोनाबाई, सामने फैले खेतों के विस्तार को देखती हुई चबूतरे पर प्रकृतिस्थ बैठी थीं- वैसे ही जैसे खेतों के उस पार पिल्खा पहाड़ बैठा था।

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