August 13, 2020

अतिथि तुम कब स्वर्ग सिधारोगे?

अतिथि तुम कब स्वर्ग सिधारोगे?
-डॉ. पूर्वा शर्मा
वैश्विक संकट है भाई !
संकट की घड़ी में चूहे सबसे पहले जहाज को छोड़ भागते हैं। जैसे ही विश्व के कई देश संकट सेजूझनेलगे, NRI (भारतीयप्रवासी) यहाँ (भारत) में आने लगे। फरवरी-मार्च तक तो बहुत बड़ी संख्या में ये लोग देश की शोभा बढ़ाने लगे। अब प्लेन का इतना लम्बा सफ़र और जान जोखिम में डालकर यहाँ पहुँचना कोई आसान बात है क्या? अच्छी बात तो यह है कि प्लेन से यात्रा करते हुए भी ये लोग सुरक्षित यहाँ पहुँच गए। अब जब यहाँ आ ही गए है तो कोई कितना भी मना करें यहाँ घूमना तो बनता है ना। इतना महँगा टिकट खर्च करके आए हैं तो कुछ तो पैसा वसूल हो। वैसे भी तीन-चार साल में एक बार आना होता है, उस पर यहाँ आकार बैठ जाना भी तो ठीक नहीं। अरे भई! वापस विदेश जाने से पहले यह देखना भी जरूरी है कि अपने देश में क्या डेवलपमेंट हो रहा है ? उसका पूरा लेखा-जोखा भी रखना पड़ता है कि कितने मॉल, सिनेमा घर, नई इमारतें या सड़कें आदि बनी है किन्तु ये घूम-फिरकर अंत में तो एक ही बात कहते हैं –....सुधार तो है पहले से देश में, लेकिन कितना भी डेवलपमेंट कर लो, अभी भी विदेशों जितनी सुविधाएँ और टेक्नोलॉजी नहीं है यहाँ, कभी आओ ज़रा विदेश तो आपको दिखाएँगे!
अब भला इनसे कौन पूछे कि इतनी सारी सुख-सुविधाओं को ठोकर मारकर ये यहाँ क्यों आए ? पर क्या करें, ये सीधे-सीधे कह भी तो नहीं सकते कि जान बचाने के लिए तो अपने देश से भली कोई जगह नहीं। अपने साथ बिन बुलाए, बिना वीज़ा वाले, घुसपैठिये वायरस जी को तो ये फ्री टिकट ही ले आए। अरे आप कहीं गलत तो नहीं समझ रहे –हम ‘थ्री इडियट्स’ वाले वायरस की नहीं, कोरोना वायरस की बात कर रहे जिसे ये अपने साथ ले आए। यह वही वायरस है जिसने पूरे विश्व में हाहाकार मचा रखा है। अब ये ठहरे भोले-भाले NRI, इन बेचारों को लगता है कि यह वायरस एक अतिथि है, भारत घूम-फिरकर वापस चला ही जाएगा। जब ये स्वयं टेक्नोलॉजी एवं सुख-सुविधाओं के अभाव में यहाँ नहीं ठहरते तो यह वायरस भी यहाँ कैसे रह पाएगा ?
और अब जब ये अपने देश आ ही गए हैं तो कम से कम एक हफ्ता तो घूमना बनता है, आस-पास के सभी स्थानों पर जाना वहाँ के विशेष व्यंजनों का स्वाद लेना और हाँ, वहाँ पर शॉपिंग करना तो अति आवश्यक है। अब इनके साथ यदि यह अतिथि वायरस कुछ लोगों के यहाँ जबरदस्ती ठहर जाए तो, ‘अतिथि देवो भवो!’ की परंपरा वाले देश में कोई भगवान स्वरूप अतिथि को मना थोड़े ही करेगा कि–ऐ वायरस भाई ! चलो भागो यहाँ से! वैसे भी क्या फर्क पड़ता है, देश की जनसंख्या तो पहले से ही कुछ ज्यादा है । इस बहाने थोड़ी-सी कम हो जाएगी। इन्होंने तो हफ्ते भर में भ्रमण करते हुए इस वायरस की चेन पूरी करने का कॉन्ट्रैक्ट तो पूर्ण कर ही दिया। और रहा सवाल इनकी जान का, तो अब ये तो ठहरे NRI ; इनकी जान बचाने का ठेका तो सरकार ने ले ही रखा है।
अब NRI तो ठहरे प्रथम श्रेणी के महानुभाव, इनके बाद एक और द्वितीय श्रेणी के महानुभाव भी हैं जो रहते तो यहीं अपने देश में है लेकिन अभी-अभी विदेश यात्रा करके लौटे हैं। साधारण-सी बात है इतना सारा रुपया-पैसा खर्च करने घूमकर आए है तो सबसे मिलना और उन्हें बताना तो आवश्यक है कि ये भारत के बाहर घूमने गए थे। भारत वापसी के समय सरकारी कर्मचारियों तो इन्हें कहा था कि आपको कुछ दिनों घर पर ही रहना। पर ये तो इनके साथ बड़ी नाइंसाफी है जी! इतनी विदेश-यात्रा के बाद अपना काम-धंधा कैसे छोड़ दे, इस विदेश-यात्रा में किए खर्च की भरपाई कैसे होगी? इसलिए ये फिर से अपने काम में लगकर अपनी विदेश यात्रा के मजेदार किस्से सुनाते हुए सबसे गले मिलते जा रहे। इनका मानना है कि हमारे देश के छत्तीस कोटि देवी-देवता तो इन्हें ही बचाने के लिए हाथ जोड़कर खड़े हैं, अब इन देवताओं के रहते हुए इनका तो कोई बाल भी बाँका कर सकता है क्या? NRI बंधुओं ने कोरोना वाइरस की जो शृंखला आरंभ की, यह उसकी महत्त्वपूर्ण कड़ी बनकर उसे बढ़ाने और पूर्ण करने में अपना योगदान देने लगे।
इन दोनों ने मिलकर इस वायरस को फ़ैलाने की शुरूआत ज़ोर-शोर से कर दी। इन अतिथियों के स्वागत में हमारे यहाँ यजमानों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। जाने-अनजाने अतिथियों के साथ यजमानों ने भी इसे फैलाने में अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है। यह बिन बुलाया अतिथि यहाँ डेरा जमाए बैठ गया है और जाने का नाम नहीं ले रहा है। बिन बुलाए अतिथि के आतंक से पिछले कई महीनों से पूरा देश डरा-सहमा, थमा और ठहरा-सा जी रहा है, इसके चक्कर में चोर- उचक्कों को तो धंधा ही ठप हो गया। अतिथि-सेवा का परिणाम यानी – लॉकडाउन तो सम्पूर्ण देशवासी भोग ही चुके, इसके साथ अपने डरे चहरे छुपाने के लिए मास्क भी प्रसाद स्वरूप प्राप्त हुआ। इसका एक और फ़ायदा कि किसी की शादी में न जाने का बहाने ढूँढने से निज़ाद मिली क्योंकि यह तो एक रामबाण बहाना बन चुका। रहा सवाल किसी की अंतिम यात्रा में शामिल होने का तो उसके लिए भी अब कोई औपचारिकता नहीं। मानो या न मानो इसके फायदे तो बहुत है जी!
हमारे यहाँ ज्यादा दिन कोई अतिथि ठहरता नहीं, ये यहाँ ठहरा तो सब इस चिपकू अतिथि से पीछा छुड़ाना चाहते हैं लेकिन किसी में यह हिम्मत नहीं की पूछ सके कि अतिथि तुम कब जाओगे ? अब इसको भेजे भी तो किसके घर? ये जिद्दी अतिथि जहाँ भी जाएगा वही पसर कर बैठ जाएगा। इसके लिए तो अब मन में सिर्फ एक ही सवाल उठता है .....
अतिथि तुम कब स्वर्ग सिधारोगे?

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