May 15, 2020

सूखे पेड़ की हरी शाख


 सूखे पेड़ की

हरी शाख
 जगदीश कश्यप
रेट रेट तय कर वह रिक्शे में बैठ गया और सोचने लगा–बेटे का सामना कैसे कर पाएगा। वह तो आना ही नहीं चाहता था पर रतन की माँ बोली थी–‘‘देखो तुम एक बाप हो। बेटे ने शादी के लिए हामी भर दी–शादी करने यही आएगा । मान लो वहीं घर बसाकर वह हमें भूल जाए तब हमारा क्या होगा? सरिता तो पराए घर की है–एक न एक दिन तो उसकी शादी करनी पड़ेगी। कब तक वह नौकरी कर हमें पालती रहेगी? पूरे सत्ताइस साल की हो चुकी है।’’
‘‘उतरो साहब–यही फाईन रेस्टोरेण्ट है ।’’ उसे झटका–सा लगा। रिक्शे से उतर वह न्योन साईन–बोर्ड पढ़ने लगा। पहले नीले अक्षर फिर लाल। धुंधलके में लकदिप रोशनी में उसने देखा–लोग शीशे वाला दरवाजा धकेल कर अन्दर जा रहे थे तो कोई–कोई निकल रहा था। अपने सादे लिबास और सिर पर बंधे साफे को देख एकबारगी उसे खुद पर शर्मिन्दगी हुई । उसे अचानक याद आया। वह कड़कता हुआ बोला था–‘‘मैं एक मामूली बाबू, कहाँ तक भुगतूँ इस हरामजादे की बदनामी? सारा दिन आवारागर्दी और पार्टी पॉलिटिक्स–क्या मैंने इसलिए पढ़ाया था इसे! जी.पी. फण्ड में अब बचा ही क्या है? निचोड़ दिया है मुझे दोनों लड़कियों की शादियों ने ।’’
तभी वह कार के हॉर्न से चौंक गया और हड़बड़ाकर एक ओर हट गया। कार में से युवक उतरा और उसने आँखों से चश्मा उतारा। बूढ़े आदमी को सामने खड़ा पा युवक के चेहरे पर कुछ उभर–सा आया। रतन ने अपनी जो–जो फोटू भेजी थी उससे यह युवक कितना मिलता–जुलता लगता है। उसे फिर याद आया । उस दिन तो हद हो गई थी। पता नहीं कौन से झगड़े में रतन कमीज–पैण्ट फड़वा आया था और चेहरे पर खरौंचे साफ दीख रही थीं ।
‘‘निकल जा...अभी निकल मेरे घर से! खानदान की नाक कटवा दी इस साले ने!’’ और एक जोर से लात मारी....
‘‘पिताजी आप यहाँ....क्या माँ ने भेजा है?’’
वह भौचक्का रह गया। रतन बड़े अदब से पिता को रेस्टोरेण्ट के भीतर ले गया और अपेन केबिन में ले जाकर रिवॉल्विंग चेयर पर बैठा दिया–‘‘आप आराम से बैठो पिताजी। देखो आपके नालायक बेटे ने कितनी तरक्की की है ! आने में तकलीफ तो नहीं हुई? मैं थोड़ा बिजी था, वरना खुद आता ।’’
पिता के दिल में आया कि वह अपने सपूत के आगे गिरकर जार–जार रो पड़े । 

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