March 24, 2018

संस्मरण

खेलमखेल
माँ का आँचल 
-सुधा भार्गव
मैं जब छोटी थी मुझे खेलने का बड़ा शौक था। यह  निश्चित था कि हम भाई -बहन शाम को एक घंटे जरूर खेलने जायेंगे पर एक घंटे से क्या होता है। हम खींचतान कर उसे डेढ़ घंटा तो कर ही देते थे। वैसे तो घर में हमें फाँसने के लिए बहुत से खेल थे- लूडो, कैरम, व्यापार, साँप सीढ़ी आदि। पर जो बाहर दौड़ा- दौड़ी में आनंद था वह घर में कहाँ!
इतवार की इतवार घर से बाहर छोटे से मैदान में क्रिकेट खेला जाता था। चाचा जी पिता जी और उनके दोस्त खेला करते थे। मुझे तो खेलने का कोई मौका ही नहीं देता था, बस दूर -दूर से गेंद उठाकर लाने का काम था। मैं तो हाँफ जाती थी; मगर खड़ी रहती शायद चांस दे दें। जिस दिन चांस मिल जाता ,खुशी से जमीन पर पैर नहीं पड़ते थे।
मुझे तो लट्टू घूमता बहुत अच्छा लगता था। मानो वह कह रहा हो -देखो -देखो एक पैर पर कैसा नाच रहा हूँ , तुम भी मुझे नचाओ। मेरी तरह से तुम्हें भी खुशी मिलेगी। बस मैंने भी सोच लिया लट्टू घुमाना सीख कर ही रहूँगी। किसी तरह से बाजार से तो ले आई पर दिमाग में खलबली मच गई सीखूँ किस्से? दोस्तों से सीखने को कहती तो हँसी उड़ाते -लो इसे इतना भी नहीं आता..। भाई की 2-3 दिनों तक खुशामद की तब उसने मुझे सिखाया। लट्टू तो मेरा गोल -गोल जमीन पर घूमने लगा पर उसे हथेली पर कभी न उठा सकी। इसका अफसोस आज भी है।
गोल -गोल चमकती -लुढक़ती काँच की गोलियों की तरफ मैं खिंची चली जाती। उनसे मैं खेलती तो नहीं थी पर वे मुझे बहुत सुंदर लगती थीं। उन्हें कंचे कहते थे। एक लडक़ा अपने कंचे से दूसरे लडक़े के कंचे में उँगलियों के सहारे निशाना लगाता। कामयाब होने से निशाना लगाने वाले का कंचा हो जाता।  एक दिन छोटे भाई की जेब में कंचे खनखनाते हुए सुन समझ गई -वह बाहर उनसे  खेलने जाने वाला है। मैं  भी उसके साथ हो ली। मगर वह अड़ गया -आप नहीं जाओगी, किसी की बहन खेलने नहीं आती ।
- अरे मैं खेलूँगी नहीं..। बस देखूँगी ।
- नहीं..। मैं नहीं ले जाऊँगा ।
- तब मैं पिता जी से तेरी शिकायत लगा दूँगी ।
पिता जी इस खेल के सख्त खिलाफ थे इसलिए मेरी  धमकी  काम कर गई। पर उसका मुँह फूला ही रहा जितनी देर खेला।
घर से बाहर हमारे खेलने को- इप्पल -दुपपल, कीलम काटी झर्रबिल्इया, चूहा भाग बिल्ली आई, घोड़ा है जमालशाही पीछे देखो मार खाई न जाने कितने खेल थे पर गिल्ली -डंडे में खूब मन लगता था। मेरा एक थैला गिल्लियों से भरा रहता । बढ़ई काका खूब बना-बना कर देते। एक खो जाय तो दूसरी हाजिर। अक्सर छोटे डंडे से गिल्लियाँ उड़ जाती जो मिलती नहीं थीं। कभी -कभी अपने साथियों को भी गिल्ली दे देती, फिर वे मेरी बात बहुत मानते ।
 इस खेल पर कोई पाबंदी भी नहीं थी, पिताजी ताऊ जी तो खुद खेलते थे। एक बार  ताऊ जी गिल्ली खेल रहे थे। काफी दूर पर उनकी बेटी खड़ी तमाशा देख रही थी। ताऊ जी ने ज़ोर से गिल्ली को डंडे से उछालकर उसमें ज़ोर से ऐसा छक्का मारा कि उसकी नोंक दीदी की आँख में चुभ गई और ले बैठी उनकी आँख की रोशनी। तब से थोड़े सावधान हो गए  पर गिल्ली खेलनी नहीं छोड़ी ।
ठंड  में दिन छोटे होने के कारण हमें शाम को खेलने का मौका कम मिलता। पर  उसकी कसर स्कूल की छुट्टी के दिन खूब निकालते।
छुट्टी के दिन सबसे आनंद दायक हमारा इकलौता खेल होता -कूदमकूद। एक कमरे में दो बड़े -बड़े अलम्यूनियम बॉक्स  थे जिनमें गद्दे -लिहाफ रखे जाते थे। वे केवल सर्दियों में खुलते थे। सर्दी की एक सुबह नौकर ने बिस्तरे ठीक किए और लिहाफों की तह करके उन्हें बक्सों पर रख दिए। दोपहर को खाना खाने के बाद हम भाई -बहन उस कमरे में घुस गए। हमारे बाद अम्मा ने खाना खाया। छोटे भाई को सुलाते वे भी सो गईं। हमें धींगामस्ती का समय मिल गया। और तो और अंदर से कमरे की कुंडी भी लगा ली, ताकि कोई नौकर शिकायत न कर दे। हम भाई -बहनों ने छोटे -छोटे हाथों से बड़े-बड़े लिहाफ नीचे खींच लिये, फिर उन पर खूब कूदे -उछले। कोई कहीं गिरा कोई कहीं लुढक़ा।  अम्मा ने हमारे लिए अलग से तकिये बनाए थे हम छोटे थे तो हमारे तकिये भी छोटे थे। उन्हें एक दूसरे पर पूरी ताकत लगाकर फेंकने लगे। जब वह किसी  के सिर या मुँह से टकराता तो खूब हँसतेइतना हँसते कि पेट में बल पड़ जाते। कितना समय निकल गया पता ही नहीं चला पर अम्मा की नींद टूट गई ।
हममें से किसी को आसपास न देख खोज-ख़बर लेने में जुट गईं। दरवाजा बंद देख अम्मा को हमारी शैतानी का अंदाजा लग गया और कुंडी खटखटा दी। एक मिनट को हम सब बुत बन गए। उपद्रव करने वाले हाथ रुक गए। डाँट के डर से समझ नहीं पाए क्या करें। लिहाफों की तह करके उन्हें बाक्स पर रख नहीं सकते थे, माँ का सामना करने से बच नहीं सकते थे।
मैंने दरवाजा खोला, अम्मा ने जोर से मेरा कान ऐंठ दिया। समझ गईं -यह किसके दिमाग की उपज  है। दोनों भाई छिपने की कोशिश करने लगे कोई दरवाजे के पीछे, कोई पलंग के नीचे। अम्मा को ज्यादा गुस्सा नहीं आता था पर उस दिन तो मेरी बांह में चिकौटी भी काटी थी लगा जैसे लाल चींटी ने काट खाया हो ।
इतने में पिता जी न जाने से कहाँ से आ गए और दहाडऩे लगे -तुमने इन बच्चों को बिगाड़ दिया है। निकालो इन्हें कमरे से -अभी सबक सिखाता हूँ।
माँ का गुस्सा कपूर की तरह उडऩ छू हो गया। हमें अपने स्नेही आँचल में छिपाकर पिता जी की लाल पीली आँखों से दूर ले गईं ।
काश! आज भी वह स्नेह कवच मेरे इर्द गिर्द लिपटा होता।
email- subharga@gmail.com

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