July 25, 2017

तीन कविताएँः

बारिश... 

– सुशीला शिवराण

1.सुनो वीरबहूटी!
इन बारिशों में
मन की सीली सुनहली रेत पर
सिंदूरी-मखमली अहसास-सी
मेरा बचपन लिये
लौट आओ ना !
कि
जेठ की जलती धूप में
काली-पीली आँधियों में
पत्थर-सी तपी हूँ
रेत-सी जली हूँ
अब के बरस
मेरे हिस्से का सावन
काठ की गाड़ी
गुड्डा-गुड्डी
गोटे की चूनर
चाँद का चँदोवा
रेत का घरौंदा
बारिशों का नहाना
तलैया की छपाक
धनक की चाप
सावन का गीत
वोमीठी-सी तान -
'मोटी-मोटी छाँटां
ओस्रयो ए बादलड़ी
सावणरुत आई म्हारा राज
सुरंग रुत आई म्हारा राज

बस इतना ही
ज्यादा नहीं
ले आओ वीरबहूटी !
लाओगी ना ?

2.धरती की गोदभराई
रेत के जलते जिस्म से
धधकती है प्यास
उठती हैं चाहतों की आँधियाँ
बेचैनियों के बवंडर

इश्क के दरिया से
भाप बन उड़ते हैं ज़ज्बात
पर्वतों को क़ासिद बना
बुलाते हैं बेपरवाह बादलों को
सुनाते हैं बिरहन रेत का दर्द
और बादल?
खोकर आपा
बरस पड़ते हैं मूसलाधार

रेत के जलते जिस्म पर
टूटकर बरसता है इश्क
भिगोता है पोर-पोर
बुझाता है रूहों की प्यास

बो जाता है
उम्मीदों के हरियल बीज
कर जाता है
धरती की गोदभराई
अँखुआती हैं
मिलन की निशानियाँ
रेत के गदराए बदन पर
लहलहाती है ख़ुशी की इबारत
झूम-झूम देती है
इश्क की गवाही।

3.ए बारिश!

ए बारिश !
इतना भी न बरस
कि भीतर तक भीग चुके
गीले तटबंध
भरभराकर ढह जाएँ

लबालब नदी का उफ़ान
कहीं तोड़ न दे तटबंध
बहा ले जाए मर्यादाएँ

सुन तो बारिश !
कहीं बह न जाए
प्रतीक्षा की अकुलाहट
मिलन की छटपटाहट
मीठा-सा दर्द
अनकही-सी लगन
बावरा-सा मन
बह जाए मगन

ए बारिश !
इतना भी न बरस
कि
ढह जाए
आस का घर
मन का नगर
बची रहे
आँसुओं की धार
पीड़ा अपार
टुकड़े-टुकड़े जीवन
डूबता मन उपवन
ए बारिश !
इतना भी न बरस      

सम्पर्क: 09650208745, sushilashivran@gmail.com

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