January 20, 2016

संस्मरण विशेष

चन्दन की खुशबूः 
शल्या मौसी 
- सुधा ओम ढींगरा

कड़वी और मीठी यादों का एक समंदर मेरे भीतर समाया हुआ है। कड़वी यादें समंदर के धरातल में कहीं छिपी रहती हैंकभी-कभार ही वे वहाँ से निकलती हैं। पर सुखद यादों की लहरें अक्सर उठ-उठकर उल्लासित करती हैं और मैं उनसे भीग-भीग जाती हूँ। मेरी प्रज्ञाचक्षु मौसीजिनका नाम कौशल्या शर्मा था और प्यार से जिन्हें हम शल्या मौसी कहते थेहर लहर के साथ उभर कर मेरे सामने आ खड़ी होती हैंविशेषकर जब मैं कुछ लिखने बैठती हूँ। ऐसा क्यों होता है?  विचारणीय प्रश्न था। एक दिन सोचा क्यों न अतीत खंगाल कर देखा जाए। शायद उसके गर्भ से इसका कारण पता चल जाए। ढूँढ़ ही लिया मैंने इसका कारण। मौसी जी का मेरे जीवन में माँ की तरह ही बहुत महत्त्व है। अगर यह कहूँ कि मैं ज़िंदा ही उनकी बदौलत हूँ ,तो ज़रा भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। माँ ने जन्म दिया था तो मौसी ने जीवन। वे दृष्टि वाले लोगों की तरह काम करती थीं। उन्हें वैसा काम करते देखकर लोग अक्सर ही धोखा खा जाते थे। 
  वैसे वे जन्मांध नहीं थीं। तीन वर्ष की थींजब चेचक से उनकी आँखें चली गईं। वे मेरी माँ से तीन वर्ष छोटी थीं। बेहद प्रतिभावानशास्त्रीय संगीत और कई विषयों की ज्ञाता थीं। उनसे परिचय करवाने के लिएआपको वहाँ ले जा रही हूँजहाँ से मेरा और मौसी जी का जीवन सफ़र शुरू हुआ।
  अतीत के बहुत से पन्ने पलट कर उस समय में पहुँच गई हूँजब मेरा जन्म हुआ था। मेरे जन्म के बाद मेरी माँ को तेज़ बुखार हो गया था और एक दिन की बच्ची को शल्या मौसी ने अपनी गोद में ले लिया था। कुछ ही दिनों में माँ का बुखार बिगड़ गया और मौसी की गोद मेरा पालना बन गई। नियति ने मेरे साथ बहुत खेल खेले। तीन माह की थीजब मेरी बाईं टाँग को पोलियो हो गया। पापा डॉक्टर थे। मेरी टाँग भंग होने से तो बचा ली गई पर वह टाँग बहुत कमज़ोर हो गई थी। शीघ्र ही माँ का बुखार टीबी में बदल गया। उस समय टीबी घातक और जानलेवा बीमारी मानी जाती थी। छुआ-छूत का पूरा ध्यान रखा जाता था। इतनी छोटी बच्ची को माँ के पास रख नहीं सकते थेदोनों के लिए खतरा था और माँ से दूर रखना भी कष्टदायक था। परिवार बेहद चिंतित था। मुझे और माँ को लेकर सभी अत्यधिक परेशान हो गए थे। चार माह की पोलियो की मार से बचाई गई कमज़ोर बच्ची को कैसे पाला जाए?  कड़ी चुनौती थी। पर मौसी ने मुझे पालने का सारा ज़िम्मा अपने पर ले कर सब को बेफ़िक्र कर दिया। पापा अपना क्लीनिक छोड़कर माँ की सेवा में जुट गए थे और मौसी मेरी देख-रेख में। 
  जन्म के एक दिन बाद अपनी गोद में लेकर उन्होंने मुझे ऐसे सीने से लगाया कि भूख से रोती-बिलखती मैं चुप हो गई। अपना एक स्तन उन्होंने मेरे मुँह में डाल दिया और रुई के फाहों को दूध में भिगो कर बूँद-बूँद दूध अपने स्तन पर निचोड़तीं और मैं मज़े से दूध पीने लगी। कई दिन उन्होंने मुझे इसी तरह दूध पिलाया। बड़े होने पर माँ मुझे अक्सर बताती थीं कि ऐसा दृश्य देखकर कोई नहीं कह सकता थामौसी को दिखाई नहीं देता। उन दिनों मौसी जी सितार और शास्त्रीय गायन में विशारद कर रही थीं। घर में गुरु हरिश्चंद्र बाली के बेटे राज बाली तबले की संगत के साथ रियाज़ करवाने आते ,तो मौसी जी मुझे गोद में लेकर ही रियाज़ करतीं। सिर्फ सितार बजाते समय मुझे मेरे छोटे मामा की गोद में डालतीं पर उन्हें सख्त हिदायत होती थी कि वे पास ही बैठें। मुझे एक पल के लिए भी अपने से दूर नहीं करती थीं। बड़ी होकर मैं गायिका नहीं बनीकोई साज़ भी नहीं बजा पाई पर स्वरों पर खासी पकड़ है और स्वरों की भटकन झट से पकड़ लेती हूँ। शायद यह उसी समय की देन है। खूब संगीत सुनती हूँखासकर शास्त्रीय संगीत में बँधी धुनें मुझे बहुत भाती हैं। 
  उन्हीं दिनों वे साहित्यरत्न की परीक्षा भी दे रही थीं। एक लड़का और लड़की अलग-अलग समय पर मौसी जी को साहित्यरत्न के कोर्स की किताबें पढ़कर सुनाने के लिए आते थे। वे विद्यार्थी थे और कॉलेज के बाद आते थे। इससे उन्हें पॉकेट मनी मिल जाती थी और मौसी जी की साहित्यरत्न की तैयारी हो जाती थी। परिवार से सुना था कि वे उस समय भी मुझे अपने साथ लेकर बैठती थीं। मैं कभी उनकी बाँहों में होती थी या कभी उनकी गोद में। अपने से अलग नहीं रहने देती थीं। मेरी आँखें खुली भी नहीं थीं और संगीत तथा शब्दों की ध्वनियाँ कानों में पड़ने लगी थीं। शायद तभी शब्दों से इश्क हो गया और साहित्य से प्यार। मैंने छोटी उम्र में ही कलम पकड़ ली थी।
  बड़े होने पर पापा ने बताया था कि एक दिन कुछ रिश्तेदार माँ का हालचाल पूछने और मुझे देखने आएतो उनमें से एक महिला ने मुझे देखते ही कह दिया कि यह लड़की तो मनहूस है। जन्म लेते ही माँ बीमार पड़ गई और खुद भी पिंगली हो गई। यह सुनते ही मौसी का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया था। उन्होंने मुझे अच्छी तरह से कम्बल में  लपेट कर सीने से लगा लिया ; ताकि कोई भी मुझे देख नहीं सके और उन रिश्तेदारों को घर से चले जाने का निवेदन किया और हिदायत दी कि वे फिर कभी उस घर की दहलीज़ पर कदम न रखें। माँ बड़े गर्व से कहा
करती थी कि मौसी ने उस दिन भविष्यवाणी की थी कि जिसे मनहूस कहा गया है, एक दिन मेरी 'मुन्नापर सब नाज़ करेंगे। यही रिश्तेदार इस पर नाज़ करेंगे। उस दिन से ही सभी मुझे 'मुन्नापुकारने लगे थे। उन दिनों हम नाना जी के घर में रहते थे और मौसी जी का उस घर में बहुत दबदबा था। उनके रहते वे रिश्तेदार कभी उस घर में आ नहीं पाए। बड़ी होकर जब मैं पत्रकार बनी ,तब वे रिश्तेदार हमारे घर आए थे। उनका बेटा किसी झूठे केस में फँस गया थाउसे छुड़वाना था। उनका बेटा तो छुड़वा दिया गया, पर मौसी जी ने पापा और माँ के मना करने के बावजूद उन्हें एहसास दिलवाया कि यह वही लड़की हैजिसे आपने मनहूस कहा था और इसी ने आपके बेटे को बचाया है। उन्होंने मौसी जी से माफ़ी माँगी। मौसी जी का तर्क थाअगर घटिया मानसिकता को उनके गलत कर्मों के बारे में टोका नहीं जाएगा तो उनकी सोच में सुधार नहीं आएगा। बाद के जीवन में भी मैंने उन्हें अन्याय और शोषण के विरुद्ध खड़े होते देखा।
  पापा की अनथक मेहनत से माँ तीन साल में ठीक हो गईं। तब मौसी ने मुझे माँ को सौंपा और कहा 'दीदी पहले इसे गले लगाएँ और चूमें। यह इस के लिए तरस रही है।सुना था कि मैं हर रात माँ से मिलने की ज़िद करती थी। बीमारी की वजह से मेरी माँ का कमरा अलग था।
  मौसी उस कमरे के बाहर मुझे खड़ा करके कहती थीं- 'देखो वह तुम्हारी माँ है। बीमार हैंजब ठीक हो जाएँगी तो मिलना।'
  उत्तर में मैं कहा करती थी- 'हाँजब मेरी माँ ठीक हो जाएँगी तो मैं कसकर उनके गले से लिपटूँगी और चूमूँगी।यह तकरीबन हर रात को सोने से पहले होता था।
   माँ के ठीक होने के उपरांत माँ और मौसी ने मिलकर मुझे पाला। साहित्यरत्न के बाद मौसी ने बी ए किया। अपनी पढ़ाई करते हुए मौसी हर समय मुझे गोद में लिटा कर तरह-तरह के तेलों से मालिश करती रहतीं। वे तेल आयुर्वेदिक संस्थान से मँगवाए जाते थे। बारह वर्ष तक मेरी शिक्षा घर पर हुई और मालिश करने वाले घर पर आकर मालिश करते। मौसी जी अपनी देख-रेख में मालिश करवातीं। किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते मेरी टाँग मज़बूत हो गई। मुझे कदम उठाने की ट्रेनिंग मौसी ऐसे देतीं थीं ,जैसे कोई आँखों वाला देता है। अब मुझे देखकर कोई जान भी नहीं सकता कि मैं पोलियो सरवाइवल हूँ। किस्मत के साथ-साथ यह मौसी जी की मेहनत और लगन का भी परिणाम है।
  हमारे घर का एक मौखिक नियम था कि जो कोई भी कुछ पढ़ेगा, वह ऊँची आवाज़ में पढ़ेगा ताकि मौसी जी भी सुन सकें। बारह वर्ष तक घर में रहने का लाभ यह हुआ कि सुबह के अख़बार से लेकर देश-विदेश के लेखक की हर पुस्तक ,जो मौसी जी को सुनाई जातीमैं भी सुनती थी। फिर मैं मौसी जी को पढ़कर सुनाने लगी। पढ़ने की जो रुचि पैदा हुई वह आज तक कायम है। घर का एक और नियम थाजिसका सब पालन करते थे। बाहर से घर आकर मौसी को पूरी बात कहानी की तरह बताई जाती थी। मैं उनसे आगे बढ़ गई और अभिनय करके घटना या बातें बताने लगी। फिल्म देखने के बाद घर में उस फिल्म की कहानी के साथ-साथ हर पात्र का अभिनय भी करती थी। वे बड़ी तन्मयता से सुनतीं और मुझे प्रोत्साहित करतीं कि उनकी आँखों के आगे दृश्य उभार दिए मैंने। बाद में रंगमंच पर पात्र जीते हुए और कहानी में उन्हें बुनते हुए यह आदत बहुत काम आई।
  वे अमृतसर के अंधकन्या विद्यालय में अध्यापिका बनकर वहाँ चलीं गईं। साथ छूट गया। मैं उनके साथ ही सोती थी। अगर वे कहानी की तरह बात को सुनती थीं ,तो उन्हें कहानी सुनाने का भी बहुत शौक था। वे बेहतरीन क़िस्सागो थीं। हर रात सोने से पहले उनसे कहानी सुनी जाती थी। कहानियाँ सुनने-सुनाने की आदत ने मेरे भीतर के कहानीकार को कब जाग्रत कर दिया पता ही नहीं चला।
  गर्मीं की छुट्टियों में मेरी छोटी मौसी के बच्चे भी हमारे पास रहने आ जाते थे। तब रात को कहानियों का दौर लम्बा होता था। तिमंजिले घर की ऊपरी छत पर लेटे हुए ,जब वे किसी कहानी में सप्त ऋषियों का या ध्रुव तारे का ज़िक्र कर आकाश की ओर इशारा करके बतातीं तो हम बच्चे हैरान हो जाते। हमें यकीन नहीं होता था मौसी सही बता रही हैं। हम किसी और से पूछते तो मौसी का इशारा सही होता था। तब हम उनकी आँखों में झाँककर देखते और कहते-'मौसी को दिखता है।सुनकर वे हाथ से ताली बजा कर हँस पड़तीं। शायद उन्हें अंदर से ख़ुशी होती होगी कि वे सही हैं या हमारी नादानी पर हँसती थींमैं आज तक समझ नहीं पाई।  
 अमृतसर का स्कूल  बंद हो गया। वे दिल्ली के अंध कन्या विद्यालय की अध्यापिका बन गईं और वहीं से रिटायर हुईं। जीवन के अंतिम साँस तक वे मेरे पापा और भैया के साथ रहीं और नेत्रहीन औरतों के हक़ के लिए लड़ती रहीं। ब्रेल पत्रिका में लेख लिख कर भेजती थीं। अन्य पत्रिकाओं में भी उनके लेख छपते थेजो वे बोलती थीं और दूसरे लोग उन्हें लिखते थे। उन्होंने शादी नहीं की हालाँकि उनकी प्रतिभा को देखकर दृष्टिवालों और नेत्रहीन दोनों के बहुत-से रिश्ते आए थे। उन्होंने शादी ही करने से इंकार कर दिया था। उन्होंने ऐसा निर्णय क्यों लियामैं जानना चाहती थी। उनके भावों को समझना चाहती थी। जिन्होंने मुझ पर इतनी ममता लुटाई, क्या वे स्वयं माँ नहीं बनना चाहती थींइस विषय पर उन्होंने चुप्पी ओढ़ ली थी। खामोश रह कर उन्होंने भावों की अभिव्यक्ति के द्वार बंद दिए। हाँ एक बात निस्संकोच कहूँगी कि उन्होंने अपना सारा ममत्व मुझ पर लुटा दिया। वे मेरी दूसरी माँ थीं। सहेली थीं। गुरु थीं। सबसे बढ़कर साथी थींजिनसे मैं सब कुछ साझा कर सकती थी। मेरी ढाल बनकर अपने जीवन के अंतिम प्रहर तक मेरी रक्षा करती रहीं। मशीन पर कपड़े सिलनास्वेटर बुननागोल रोटी बेलना मैंने सब उन्हीं से सीखा। रोटी सेंकने तक को तैयार हो जाती थीं। मौसी को ऐसे काम करते देखते हुए मैं अक्सर सोचा करती थी कि दृष्टिहीनता की अस्वीकृति कभी उन्हें चोट न पहुँचा दे। उन्होंने एक तरह से अपनी नेत्रहीनता को नकार दिया था।
  विश्व के प्रतिष्ठित नेत्रहीन लेखक वेद मेहता (जो अमेरिका में रहते हैं) की पुस्तक 'Face To Face' पढ़ी तो एहसास हुआप्रज्ञाचक्षु लोगों के भीतर का संसारप्रज्ञा दृष्टि बेहद सजग और जाग्रत होती हैवे महसूस ही नहीं कर पाते कि वे देख नहीं सकते। ध्वनियाँप्रतिध्वनियाँसाएपरछाइयाँ कैसे उन्हें रास्ता दिखातीं हैंइसका विस्तृत वर्णन है उस पुस्तक में। मौसी के प्रत्यक्ष और जीवन्त जीवन पर वेद मेहता की पुस्तक ने मोहर लगा दी।
   उनके बदन से चन्दन की खुशबू आती थी। बचपन से ही वह खशबू मुझे बहुत आकर्षित करती। वे चंदन के साबुन से नहाती थीं। मुझे भी पर्फ़्यूम्ज़ का बहुत शौक है। तरह-तरह के इत्रों और पर्फ़्यूम्ज़ का प्रयोग मैं भी बहुत करती हूँ। यह जान गई हूँ कि परोक्ष-अपरोक्ष कुछ आदतें स्वभाव में परिवेश से आ जाती हैं; जिनका मनुष्य को एहसास भी नहीं होता। जिस इंसान से बचपन में आप बहुत प्रभावित होते हैंउसकी आदतें तक व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं। मौसी किसी भी घटना या दुर्घटना के बारे में सुनते हुए पूछती थीं कि मुझे कैसा लगावहाँ क्या अच्छा था और क्या बुराबुराई को दूर करने के लिए क्या किया जाना चाहिए। मैं खुल कर बताती थी। इससे मुझे अपने भाव स्पष्ट करने आ गये। युवावस्था से लेकर अब तक मैं सोशल एक्टिविस्ट हूँ। इसमें उनका बहुत बड़ा योगदान है। युवावस्था में दिया गया उनका प्रोत्साहन आज भी मेरे साथ है। शादी के बाद मैं जब भी अपने बच्चे को साथ लेकर मायके जाती। उनके साथ बातें कर अपना बचपन ज़रूर दोहराती थी। अपने बच्चे के साथ उनसे एक कहानी ज़रूर सुनती थी। उनकी सुगंध अपने साथ ले आती थी। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। आज उनके बारे में लिखते हुए मुझे वही सुगंध आ रही है और सुधियों के समंदर से निकल कर जब वे सामने आ खड़ी होती हैं...... उससे पहले उनकी खुशबू मुझे आने लगती है।

लेखक परिचय: पंजाब के जालंधर शहर में जन्मी डॉ. सुधा ढींगरा हिन्दी और पंजाबी की सम्मानित लेखिका हैं। वर्तमान में वे अमेरिका में रहकर हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु कार्यरत हैं। कहानी संग्रह- दस प्रतिनिधि कहानियाँकमरा नंबर 103, कौन सी ज़मीन अपनीवसूली। उपन्यास- नक्काशीदार केबिनेट। काव्य संग्रह- सरकती परछाइयाँधूप से रूठी चाँदनीतलाश पहचान कीसफ़र यादों कामाँ ने कहा था (काव्य सी.डी)। संपादन- वैश्विक रचनाकार: कुछ मुलभूत जिज्ञासाएँ (साक्षात्कार संग्रह)इतर (प्रवासी महिला कथाकारों की कहानियाँ)सार्थक व्यंग्य का यात्री: प्रेम जनमेजयमेरा दावा है (अमेरिकी शब्द-शिल्पियों का काव्य संकलन)गवेषणाप्रवासी साहित्य: जोहान्सबर्ग के आगे (संपादन सहयोग)परिक्रमा (पंजाबी से अनूदित हिन्दी संकलन)कई कहानियाँ अंग्रेज़ी में अनूदित। 45 संग्रहों में कविताएँकहानियाँआलेख प्रकाशित। सम्प्रति: ढींगरा फाउण्डेशन की उपाध्यक्ष एवं सचिव। केंद्रीय हिन्दी संस्थानआगरा द्वारा 2014 की पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थानलखनऊ द्वारा 2013 का स्पंदन प्रवासी कथा सम्मान। सम्पर्क: Email- sudhadrishti@gmail.com, मोबाइल:+:1-919-801-0672

2 Comments:

सुधाकल्प said...

बहुत अच्छा व रुचिकर संस्मरण है।

Sp Sudhesh said...

सुधा जी यह संस्मरण पढ कर पता चला कि आप सुधा शर्मा हैं पर ओम ढींगरा जी ने आप को वर्तमान नाम दिया। आप की कौशल्या मौसी एक पुण्यात्मा थीं , जिन्हें आप ने साकार
कर दिया ।

लेखकों से अनुरोध...

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