September 15, 2015

धरोहर विशेष

ताला
शिव की नगरी 
मन्दिर  के वास्तुकला, शिल्पकला के अनुसार देवरानी मन्दिर  किसी अधिष्ठात्री देवी (पार्वती स्वरूप) की मन्दिर  रही होगी, जहाँ पशुबलि की भी प्रथा थी, जो पुरावशेषों के प्रमाण के रूप में आज भी विद्यमान है।
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर से 30 किलोमीटर दूर अमठी-काँपा ग्राम के समीप मनियारी नदी के तट पर स्थित 'ताला में दो शैव मन्दिर  हैं, जो देवरानी- जेठानी के नाम से विख्यात हैं। जेठानी मन्दिर  अत्यंत ही खराब हालत में है जबकि देवरानी मन्दिर  की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। ये दोनों मन्दिर  अपनी विशिष्ट कला के कारण प्रसिद्ध हैं। प्रति वर्ष माघ पूर्णिमा में यहाँ पर मेले का आयोजन किया जाता है। ताला के पास ही एक और ऐतिहासिक नगर 'मल्हार' मात्र पांच किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
भारतीय पुरातत्त्व के पहले महानिदेशक एलेक्जेन्डर कनिंघम के सहयोगी जे.डी. बेलगर को ताला गाँव  की सूचना 1873-74 में तत्कालीन कमिश्नर फिशर ने दी। एक विदेशी पुरातत्त्व वेत्ता महिला जेलियम विलियम्स ने इसे चन्द्रगुप्त काल का मन्दिर  बताया है। ताला मन्दिर  के भग्नावशेष में ईंट मिलने से ऐसा प्रतीत होता है कि मन्दिर  निर्माण में ईंट से किया गया था। अत: पुरातत्त्ववेत्ता इसके काल का निर्धारण पाँचवी- छठवीं शताब्दी का करते हैं; जिसका जीर्णोद्धार कलचुरि राजवंश में हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार इस मन्दिर  को शरभपुरीय शासकों के राजप्रसाद की दो रानियों देवरानी- जेठानी ने बनवाया है। जेठानी मन्दिर  की सफाई के समय दो मुद्राएँ प्राप्त हुईं; जिसमें एक शरभपुरी शासक की रजत मुद्रा तथा दूसरी रतनपुर के कलचुरि शासक की जिसमे श्रीमद् रत्नदेव अंकित है।
मन्दिर  के वास्तुकला, शिल्पकला के अनुसार देवरानी मन्दिर  किसी अधिष्ठात्री देवी (पार्वती स्वरूप) की मन्दिर  रही होगी, जहाँ पशुबलि की भी प्रथा थी, जो पुरावशेषों के प्रमाण के रूप में आज भी विद्यमान है। जेठानी मन्दिर  के चारो ओर खुला होने का कारण पूजा, अनुष्ठान व यज्ञस्थल रहा होगा। भग्नावशेषों में प्राप्त दशमहाविद्या की देवी धूमावती की प्रतिमा से प्रतीत होता है कि यह तंत्र साधना का शक्ति केन्द्र एवं ज्योतिष का बहुत बड़ा केन्द्र रहा होगा। प्राप्त पुरावशेषों में मानव, पशुओं के जीवन संहार का शिल्पांकन इसका प्रमाण है। असमानुपातिक भव्य जीव- जन्तुओं एवं देवी- देवताओं, स्त्री- पुरुष प्रतिमाओं का शिल्पांकन, पुरावशेषों में मानव, पशुओं के जीवन- संहार का प्रमाण है।
देवरानी मन्दिर 15 मीटर की दूरी पर है। जेठानी मन्दिर  एवं विशाल जगमोहन ध्वस्त अवस्था में है। ये दोनों ही शिवमन्दिर  हैं। मन्दिर  के तल विन्यास में आरंभिक चन्द्रशिला और सीढ़िय़ों के बाद अर्धमण्डप, अन्तराल गर्भगृह तीन प्रमुख भाग हैं। मन्दिर  की सीढिय़ों पर शिव के यक्षगण और गंधर्वो की सुन्दर आकृतियाँ  डोलोमटिक लाइमस्टोन पर खुदी हुई हैं। मनियारी नदी में मिलने वाले पत्थरों का प्रयोग यहाँ  किया गया है। निचले हिस्से में शिव-पार्वती विवाह के दृश्य उत्कीर्ण हैं। प्रवेश द्वार के उत्तरी पार्श्वमें दोनों किनारों में विशाल स्तम्भ के दोनों और 6- 6 फीट के हाथी बैठी मुद्रा में हैं। दक्षिण की और मुख्य प्रवेश द्वार के अलावा पूर्व और पश्चिम दिशा में भी द्वार हैं। मुख्य प्रवेश द्वार पर पत्थरों के कलात्मक स्तम्भ हैं।
उत्खनन से प्राप्त अतिरिक्त मूर्त्तियों में चतुर्भुज कार्तिकेय की मयूरासन प्रतिमा है। द्विमुखी गणेश की प्रतिमा अपने दाँत को एक हाथ में लिए चन्द्रमा में प्रक्षेपण के लिए उद्यत मुद्रा में है। अर्धनारीश्वर, उमा- महेश, नागपुरुष, यक्ष मूर्त्तियों में अनेक पौराणिक कथानक झलकते हैं। शाल भंजिका की भग्न मूर्त्ति  में शरीर सौष्ठवता व कलात्मक सौन्दर्य का संतुलित प्रयोग किया गया है। एक विशाल चतुर्भज प्रतिमाकी भाव भंगिमा से महिषासुरमर्दिनी की मूर्त्ति  का बोध होता है; जिसकी भुजाएँ तथा आयुध खण्डित  हैं ।
देवरानी- जेठानी मन्दिर  विशिष्ट तल विन्यास, विलक्षण प्रतिमा निरूपण तथा मौलिक अलंकरण की दृष्टि से भारतीय कला में विशेष रूप से चर्चित है। उत्खनन के बाद के अध्ययन से पता चलता है कि ईसा पूर्व से दसवीं शताब्दी तक यह अत्यंत समृद्ध स्थल रहा होगा। मूर्त्तियों की शैली और प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि लम्बे काल तक यह स्थल विभिन्न संस्कृतियों की धर्मस्थली रही होगी, जो शैव पूजक थी साथ ही यह स्थान तांत्रिकों की अनुष्ठान -स्थली भी रही होगी। पर्यटन की दृष्टि से ताला के इस पुरातात्त्विक स्थल के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं को सरकार द्वारा मंजूरी दी गई है।
देवरानी मन्दिर  के उत्खनन में प्राप्त रुद्रशिव की विशाल प्रतिमा छत्तीसगढ़ के इस क्षेत्र को पुरातत्त्व  की दृष्टि से और भी महत्त्वपूर्ण बना देती है।
रूद्रशिव की विशाल प्रतिमा
शिल्पी ने प्रतिमा के शारीरिक विन्यास में पशु पक्षियों का अद्भुत संयोजन किया है। विद्वानों के अनुसार महाकाल रूद्रशिव की प्रतिमा का अलंकार बारह राशियों एवं नौ ग्रहों के साथ हुआ है।
भारतीय शिल्प में मूर्त्ति  निर्माण की परम्परा बहुत ही प्राचीन काल से चली आ रही है। कला इतिहासकारों ने इन प्रतिमाओं को उनके लक्षण एवं शैलियों के आधार पर विवेचनाएँ  प्रस्तुत की हैं ;किन्तु कभी- कभी ऐसी विलक्षण प्रतिमाएँ  मिल जाती हैं ,जो पुरातत्त्व  वेत्ताओं एवं कला इतिहासज्ञों के लिए समस्या बन जाती हैं। ऐसी ही एक अद्भुत प्रतिमा छत्तीसगढ़ में बिलासपुर जिले के ताला गाँव  में प्राप्त हुई है।
वर्ष 1987-88 में देवरानी मन्दिर  के परिसर में उत्खनन के दौरान यह विलक्षण प्रतिमा मिली है। यह प्रतिमा भारतीय कला में अपने ढंग की एकमात्र ज्ञात प्रतिमा है। शैव सम्प्रदाय से सम्बन्धित इस प्रतिमा का शिल्प अद्भुत है। शिव के रूद्र अथवा अघोर रूप से सामंजस्य होने के कारण सुविधा की दृष्टि से इसका नामकरण रुद्रशिव किया गया है। ताला से प्राप्त प्रतिमाओं में यही एक मात्र लगभग परिपूर्ण प्रतिमा है।
यह विशाल प्रतिमा 9 फुट ऊँची एवं 5 टन वजनी। इसमें शिल्पी ने प्रतिमा के शारीरिकविन्यास में पशु पक्षियों का अद्भुत संयोजन किया है। विद्वानों के अनुसार महाकाल रूद्रशिव की प्रतिमा का अलंकार बारह राशियों एवं नौ ग्रहों के साथ हुआ है।
विभिन्न जीव -जन्तुओं की मुखाकृति से इसके अंग-प्रत्यंग निर्मित होने के कारण प्रतिमा में रौद्र भाव संचारित है। प्रतिमा समपाद स्थानक मुद्रा में प्रदर्शित है। इस महाकाय प्रतिमा के रूपांकन में गिरगिट, मछली, केकड़ा, मयूर, कच्छप सिंह आदि जीव-जन्तु तथा मानव मुखों की मौलिक प्रकल्पना युक्त रूपाकृति अत्यंत ओजस्वी है। इसके शिरोभाग पर मण्डलाकार चक्रों में लिपटे हुए गिरगिट के पृष्ठ भाग से नासिका रंध्र, सिर से नासाग्र तथा पिछले पैरों से भौंह निर्मित है। बड़े आकार के मेंढक के विस्फारित मुख से नेत्र पटल तथा कुक्कट के अण्डे से नेत्र गोलक बने है। छोटे आकार के प्रोष्ठी मत्स्य से मूँछे तथा निचला ओष्ठ निर्मित है। बैठे हुए मयूर से कान रूपायित हैं।
कंधा मकर मुख से निर्मित है। भुजायें हाथी के शुण्ड के सदृश्य हैं तथा हाथों की अँगुलियाँ  सर्प मुखों से निर्मित हैं। वक्ष के दोनों स्तन तथा उदर भाग पर मानव मुख द्रष्टव्य है। कच्छप के पृष्ठ से कटिभाग, मुख से शिश्न और उसके जुड़े हुए  दोनों अगले पैरो से अंडकोष निर्मित है। अंडकोष पर घंटी के सदृश्य जोंक लटके हुए हैं। दोनों जंघाओं पर हाथ जोड़े विद्याधर तथा कटि पार्श्व में दोनों ओर एक-एक गंधर्व की मुखाकृति है। दोनों घुटनों पर सिंह मुख अंकित है। स्थूल पैर हाथी के अगले पैर के सदृश्य हैं। प्रमुख प्रतिमा के दोनों कधों के ऊपर दो महानाग पार्श्व रक्षक के सदृश्य फन फैलाए हुए स्थित है। पैरों के समीप उभय पार्श्व  में गर्दन उठाकर फन काढ़े हुए नाग अनुचर द्रष्टव्य हैं।
प्रतिमा के दाएँ में स्थूल दण्ड का खण्डित भाग बच हुआ है। उनके आभूषणों में हार, वक्ष- बंध तथा कटिबंध नाग केकुण्डलित भाग से रूपायित हैं । वर्णित प्रतिमा के बाएँ हाथ में स्थित आयुध,दाएँपैर के समीप स्थित नाग तथा अधिष्ठान भाग भग्न है। सामान्य रूप से इस प्रतिमा में शैव मत, तंत्र तथा योग के गुह्य सिद्धांतों का प्रभाव और समन्वय दिखलाई पड़ता है। 
कैसे पहुँचे - वायु मार्ग: रायपुर 85 कि. मी. निकटतम हवाई अड्डा है। जो मुम्बई, दिल्ली, नागपुर भुवनेश्वर, कोलकाता, राँची, विशाखापट्टनम एवं चैन्नई से जुड़ा हुआ है। रेल मार्ग : हावड़ा –मुम्बई मुख्य रेल मार्ग पर बिलासपुर 30 कि. मी. समीपस्थ रेलवे जंक्शन है। सड़क मार्ग : बिलासपुर शहर से निजी वाहन द्वारा सड़क मार्ग से यात्रा की जा सकती है। आवास व्यवस्था : बिलासपुर नगर में आधुनिक सुविधाओं से युक्त अनेक होटल ठहरने के लिए उपलब्ध हैं।। (उदंती फीचर्स)

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