February 23, 2012

नए कलाकारों को मिला महत्व

'कहि देबे संदेस' सीमित बजट में बनीं थी। इस लिहाज से कलाकारों के मामले में निर्माता- निर्देशक मनु नायक को बहुत हद तक समझौता करना पड़ा। मुख्य पात्रों के अलावा ढेर सारे पात्र स्थानीय स्तर पर लिए गए या फिर ऐसे लोगों को मौका दिया गया जो बड़े परदे पर आने का ख्वाब संजोए हुए थे। मुख्य कलाकारों में नायक की भूमिका कान मोहन ने निभाई है। कान मोहन सुपरहिट सिंधी फिल्म 'अबाना' में मुख्य भूमिका की वजह से चर्चा में आए थे। इसके बाद छत्तीसगढ़ी की शुरूआती दौर की दोनों फिल्में 'कहि देबे संदेस' और 'घर-द्वार' में नायक की भूमिका कान मोहन ने ही निभाई। इसके अलावा बाद की फिल्मों में वह ज्यादातर चरित्र भूमिकाओं में नजर आए। उनकी एक प्रमुख फिल्म अमिताभ बच्चन और नवीन निश्चल अभिनीत 'फरार' है। महेश कौल निर्देशित 'हम कहां जा रहे हैं' में भी कान मोहन नजर आए थे। वह राजेश खन्ना और कादरखान के साथ थियेटर में भी सक्रिय रहे।

फिल्म की नायिकाओं में उमा मूलत: मराठी फिल्मों की नायिका थी। हिंदी फिल्मों में राजश्री प्रोडक्शन की 'दोस्ती' में बहन का किरदार उमा ने ही निभाया था। नायिका की बहन का किरदार अदा करने वाली सुरेखा की पहली फिल्म ख्वाजा अहमद अब्बास की 'शहर और सपना' थी जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। नायक कान मोहन के दोस्त की भूमिका साप्ताहिक हिंदुस्तान के तब के पत्रकार कपिल कुमार थे।
खल पात्र कमल नारायण का किरदार निभाने वाले स्व.जफर अली फरिश्ता रायपुर के थे, जिन्होंने मुंबई फिल्मी दुनिया में लंबा अरसा गुजारा और छोटी- बड़ी भूमिकाएं करने के अलावा उन्होंने 'भागो भूत आया' नाम से फिल्म भी बनाई थी, जिसे अपेक्षित प्रतिसाद नहीं मिला।
फिल्म में नायिका की मां की भूमिका निभाने वाली दुलारी बाई किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उस दौर में निरूपा राय से पहले दुलारी बाई 'मां' के किरदार के लिए सर्वाधिक व्यस्त कलाकार थी। राजेश खन्ना व धर्मेंद्र की फिल्मों में तब दुलारी बाई अनिवार्य हिस्सा हुआ करती थीं। वहीं नायक की मां की भूमिका निभाने वाली सविता गुजराती रंगमंच की कलाकार थी। फिल्म में नायिका के पिता की भूमिका निभाई है रमाकांत बख्शी ने। खैरागढ़ निवासी और प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के भतीजे रमाकांत बख्शी तब रंगमंच में सक्रिय थे। इस फिल्म के बाद एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में उनकी मौत हो गई थी। वहीं नायक के पिता की भूमिका अदा करने वाले विष्णुदत्त वर्मा पलारी गांव के दाऊ थे उनका भी रंगमंच के प्रति जुड़ाव था वे बृजलाल वर्मा के चचेरे भाई थे।
फिल्म की शुरूआत में मनु नायक ने आभार में बीडीओ पलारी के एपी श्रीवास्तव का भी नाम दिया है। दरअसल प्रशासनिक स्तर पर श्रीवास्तव ने फिल्म की यूनिट को काफी मदद की थी। जब फिल्म में दोनों नायिकाओं के बचपन की भूमिका का मामला आया तो मनु नायक ने श्रीवास्तव की बेटी बेबी कुमुद और विष्णुदत्त वर्मा की बेटी बेबी केसरी को यह मौका दिया। दोनों के नाम का उल्लेख टाइटिल में भी है। फिल्म मे स्कूल के शिक्षक की भूमिका अदा करने वाले सोहनलाल वास्तविक जीवन में भी शिक्षक ही थे। उस वक्त उनकी पदस्थापना बलौदाबाजार में थी।
फिल्म के ज्यादातर गीतों में अनजाने से कलाकारों को मौका दिया गया है। मसलन 'होरे...होरे' गीत ही लीजिए। इस गीत में कलकत्ता की थियेटर आर्टिस्ट बीना और मराठी रंगमंच के कलाकार सतीश नजर आते हैं। सतीश के साथ छोटे कद का कलाकार टिनटिन भी मराठी रंगमंच का है। एक अन्य गीत 'तोर पैरी के...' में मुंबई के ही एक कलाकार पाशा को मौका दिया गया जिसमें उनके साथ राजनांदगांव की कलाकार कमला बैरागी भी नजर आती हैं।
फोटो में : १. रमाकांत बख्शी जिन्होंने जमींदार की भूमिका निभाई है वे प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के भतीजे हैं । उनकी पत्नी का किरदार निभाया हैं दुलारी बाई ने चित्र में नीचे बैठी चावल साफ कर रही हैं। साथ बैठे हैं पंडित की भूमिका में रसिक राज व पीछे खड़ी हैं छोटी बहन की भूमिका में सुरेखा।
2. नायक कान मोहन के साथ नायिका उमा
3. नायक के माता- पिता की भूमिका में विष्णुदत्त वर्मा व सविता

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