March 21, 2011

साहसी वैज्ञानिक महिलाएं

- अजिता मेनन

42 वर्षीय, संघमित्रा बंधोपाध्याय जिन्होंने हाल ही में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, 2010 जीता है, माइक्रो-आर.एन.ए. यानि अणुओं को ऐसा समूह जो कैंसर जैसी विभिन्न बीमारियों का कारण है - खोजने और उसके कार्य का विश्लेषण करने के लिए कम्प्यूर विज्ञान पद्धतियों को इस्तेमाल करती हैं।
30 वर्षीय, वैज्ञानिक, पौशाली बाल, जो सामाजिक विज्ञान में एमए और मारक विज्ञान में पीएचडी हैं, जब उनके पुरुष सहकर्मी अपना सामान बांध बंगाल के पश्चिमी मिदिनापुर में माओवादी इलाके में जाने को तैयार हुए, तब जीवन में पहली बार उन्हें महिला होने की मार खानी पड़ी। पौशाली कहती हैं, 'उस जगह को महिला वैज्ञानिक के लम्बे समय तक रहने के लिए सुरक्षित नहीं समझा जाता, जबकि पुरुष सहकर्मी को अवसर मिल जाता है। यह माना गया कि मैं काम करने में पूरी तरह सक्षम थी, लेकिन कुछ परिस्थितियों में एक महिला को सत्ता द्वारा जोखिम के तौर पर देखा जाता है'। पौशाली की रिसर्च यौन कर्मियों, प्रवासी कामगारों, सुई से नशा करने वालों और सड़क पर रहने वाले बच्चों में एच.आई.वी./एड्स पर है। वे कहती हैं, 'विज्ञान इतना अनुत्पादक नहीं है जितना कि उसे समझा जाता है। उदाहरण के लिए मैं केवल ऐसी बातों पर फोकस नहीं करती कि कैसे एक ही सुई के प्रयोग से एच.आई.वी. फैलता है, बल्कि सड़क पर रहने वाले जो बच्चे नशा करते हैं उनके व्यवहार का गहराई से अध्ययन भी करती हूं।'
पौशाली जो पिछले 8 सालों से नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कोलेरा एण्ड ऐन्ट्रिक डिजीज (एन.आई.सी.ई.डी.), कोलकाता में रिसर्च वैज्ञानिक के तौर पर काम कर रही हैं कहती हैं कि बस कुछ छोटे- मोटे सुरक्षा सरोकारों के अलावा महिला होना उनके कैरियर के रास्ते में कभी आड़े नहीं आया।
यह लगातार साफ होता जा रहा है कि अंतत: महिला वैज्ञानिक अभी तक के पुरुष प्रधान क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। प्रतिष्ठित शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार 2010 में नौ लोगों को मिला जिसमें से तीन महिलाएं थीं। यह देखते हुए कि इन पुरस्कारों के 52 वर्ष के इतिहास में, 463 वैज्ञानिकों में से केवल 14 महिलाओं ने इसे जीता है, इस वर्ष की सूची स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि अब महिला वैज्ञानिक अपने कार्य के लिए अधिक पहचानी जा रही हैं। रुचिकर यह है कि युवा महिलाएं अपने उत्कृष्ट अनुसंधान से हलचल पैदा कर रही हैं - वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सी.आई.एस.आर.) द्वारा संस्थापित शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार 45 वर्ष के कम आयु के वैज्ञानिकों को दिया जाता है। हालांकि आमतौर पर यह पुरस्कार सात क्षेत्रों में दिया जाता है, इस वर्ष उत्कृष्ट कार्य केवल पांच जीव विज्ञान, इंजीनियरी विज्ञान, रसायन विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान और शारीरिक विज्ञान में निर्धारित किया गया।
कोलकाता के भारतीय सांख्यिकीय संस्थान में एक प्रोफेसर, कम्प्यूटर वैज्ञानिक संघमित्रा बंधोपाध्याय इस वर्ष पुरस्कार प्राप्त करने वाली तीन महिलाओं में से एक थीं। 42 वर्षीय वैज्ञानिक जो माइक्रो-आर.एन.ए. यानि अणुओं को ऐसा समूह जो कैंसर समेत विभिन्न बीमारियों का कारण है- खोजने और उसके कार्य का विश्लेषण करने के लिए कम्प्यूटर विज्ञान पद्धतियों को इस्तेमाल करती हैं कहती हैं, 'मैं पूरा श्रेय अपने माता- पिता को देती हूं। उन्होंने मुझे लगातार प्रेरित किया ताकि मैं कैंसर में छिपी आण्विक प्रक्रियाओं को खोजने में अपने आप को समर्पित कर सकूं, जिसके कारण मुझे ये श्रेष्ठ विज्ञान पुरस्कार मिला।'
प्रोफेसर बंधोपाध्याय कहती हैं उनके पति प्रोफेसर उज्जल मौलिक जो जादवपुर विश्वविद्यालय में कम्प्यूटर विज्ञान पढ़ाते हैं, उन्हें घर और लैब में एक साथ संतुलन बनाए रखने में सहायता कर, उनकी प्रेरणा और समर्थन दे रहे हैं। वे कहती हैं, विज्ञान में पहचान शीघ्र नहीं मिलती। पुरस्कार मिलने से पहले वर्षों की कड़ी मेहनत और संपूर्ण प्रतिबद्धता लगती है। अक्सर सामाजिक और पारिवारिक प्रतिबद्धताओं के कारण महिलाओं के लिए लम्बे समय तक अनुसंधान करना कठिन होता है।
चूंकि इस क्षेत्र में महिलाओं की संख्या संतोषजनक नहीं है, ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि वैज्ञानिक विश्व में महिलाओं के विरुद्ध अन्याय या भेदभाव होता है। प्रोफेसर बंधोपाध्याय इंगित करती हैं कि परिवार की सोच और सामाजिक परिवेश जिसमें महिलाएं पलती बढ़ती हैं उनके कैरियर के चुनावों को काफी हद तक प्रभावित करता है, आगे वे कहती हैं, 'बचपन से लड़कियों को अक्सर शादी और परिवार की देखभाल जैसी बातों की ओर इशारा किया जाता है। उन्हें शायद ही विज्ञान और इंजीनियरिंग में रुचि लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। यदि उन्हें गणित या भौतिकी से डर लगता है तो इसे लड़कियों के लिए स्वाभाविक माना जाता है। डर के उस स्रोत को खत्म करने के लिए कोई कोशिश नहीं की जाती। बल्कि, वास्तव में उन्हें जबरदस्ती विश्वास दिलाया जाता है कि विज्ञान उसके बस की बात नहीं है!'
10 वर्षीय बच्चे की मां कहती हैं, 'मुझे लगता है स्कूल के समय से फोकस शुरू होना चाहिए। महिलाओं को पूर्वनिर्धारित मान्यताओं से ऊपर उठना होगा और दिमाग में उल्टी सोच भरने का शिकार होने से बचना होगा। वे अपने बच्चों की देखभाल के लिए कड़ी मेहनत करती हैं, वही कड़ी मेहनत वे विज्ञान में भी लगा सकती हैं। यही मैं हमेशा अपने छात्रों से कहती हूं। महिला होने के नाते मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। कोई फायदा भी नहीं था। मुझे भी अपने पुरुष सहकर्मियों की तरह ही काम करना पड़ा।'
इस वर्ष तीन महिला वैज्ञानिकों को पुरस्कार ने कई युवा लड़कियों को प्रेरित किया है। एक बेहद प्रतिभाशाली वैज्ञानिक जो किसी धर्म को नहीं मानती परंतु स्वामी विवेकानंद और राम कृष्ण परमहंस के दर्शन से प्रेरितमहसूस करती हैं, उनका कहना है 'पुरस्कार मिलने के बाद मुझे काफी सारे फोन आए। जिन छात्रों को मैं जानती भी नहीं उन्होंने भी फोन किया। यह वास्तव में काफी प्रोत्साहक है।'
तो क्या वैज्ञानिकों को अधिक दिमाग की जरूरत होती है? प्रोफेसर बंधोपाध्याय, जिनका पंसदीदा समय अपने घर के पास बैलूर मठ में गंगा के किनारे बैठ कर आराम करना है कहती हैं, 'वैज्ञानिक हमेशा नए तरीके से सोचते हैं। वे नई चीजें खोजने की कोशिश करते हैं, तो उनका दिमाग हमेशा सक्रिय रहना ही चाहिए। वैज्ञानिक लगातार सोचते रहते हैं। शायद यही उन्हें दूसरों से अलग बनाता है।'
एमबीबीएस और सार्वजनिक स्वास्थ्य में मास्टर्स प्राप्त 33 वर्षीय डॉ. रशमी पाल कहती हैं, 'अगर कोई मुझे गाना गाने के लिए कहेगा तो मैं पूरी तरह फेल हो जाऊगीं। यह सब व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करता है और मुझे नहीं लगता कि मेरे पास अनोखा दिमाग है क्योंकि मैं एक वैज्ञानिक हूं।' पाल एनआईसीईडी में संखिया (आर्सनिक) संबंधित बीमारियों, गर्भाशय के मुख का (सरवाइकल) कैंसर और मलेरिया पर अनुसंधान कर रही हैं। वे कहती हैं, 'गर्भाशय के मुख का और स्तन कैंसर का खतरा भारत में एक ज्वलंत मुद्दा है। यह महिलाओं में सबसे आम बीमारियां हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि पापीलोमा वाइरस (एच.पी.वी.) जिससे गर्भाशय के मुख का कैंसर पैदा होता है- पुरुषों से महिला में यौन द्वारा संचारित होता है। मृत्यु दर बहुत ऊंची है लेकिन अगर उचित कदम उठाए गए तो इसे रोका जा सकता है। संखिया जहर और मलेरिया, पूर्वी भारत में दो मुख्य समस्याओं के अलावा मेरा अध्ययन मुख्यता इसी पर केंद्रित है।
तो वैज्ञानिकों को अक्सर सनकी या सामाजिक रूप से अकुशल ही क्यों समझा जाता है? 56 वर्षीय एमबीबीएस, एमडी, डॉ. दीपिका सूर, जो एनआईसीईडी के अंतर्गत भारत के स्वदेशी कोलेरा टीके 'संचोल' के क्लिनिकल ट्रायल को देखने वाली मुख्य वैज्ञानिक हैं कहती हैं, 'हम अपने क्षेत्र में अपना दिमाग लगाते हैं इसका यह मतलब नहीं है कि दूसरे क्षेत्रों के लोग कम बुद्धिमान हैं। इसका मतलब यह भी नहीं है कि सामाजिक परिस्थितियों में हम अकुशल हैं या अपने परिवार की प्रतिबद्धताओं को संभाल नहीं सकते। उदाहरण के लिए मेरे काम को देख लो। पूरे प्रोजेक्ट का उद्देश्य गरीबों का फायदा है, जो कि कोलेरा के सबसे बड़े शिकार हैं। ट्रायल कोलकाता के बेलेघाटा इलाके में 1,10,100 जनसंख्या पर किया जा रहा है, ट्रायल शुरू करने से पहले उनका विश्वास और भरोसा जीतने की जरूरत थी। सामाजिक अकुशलता से तो ऐसा करना संभव नहीं हो पाता' एक सफल कार्यक्षेत्र वैज्ञानिक इंगित करती हैं।
डॉ. सूर महिला वैज्ञानिकों की सफलता की हिमायती भी हैं। 'यह सच है कि पहले वैज्ञानिक समुदाय में उनके पुरुष साथियों की प्रमुखता थी लेकिन लोगों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि पुरुष इस क्षेत्र में लम्बे समय से हैं। महिलाएं बाद में आईं, लेकिन अब निश्चित रूप से मान्यताओं के ऊपर उठ रही हैं।' शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार प्राप्त करने वाली तीनों महिला वैज्ञानिकों का हवाला देते हुए डॉ. सूर बताती हैं, 'उनकी सफलता ने महिला वैज्ञानिकों को बहुत अधिक प्रेरित किया है। जब महिलाएं कुछ भी उपलब्धि प्राप्त करती हैं तब मुझे हमेशा गर्व महसूस होता।'
विज्ञान को अक्सर नीरस, साफ- सुथरा, सीधा- साफ तरह का क्षेत्र माना जाता है, जहां भावनाओं और हंसी- मजाक की भूमिका बहुत कम होती है। लेकिन ये महिला वैज्ञानिक 'पढ़ाकू' होने से कहीं दूर हैं। कैरियर और परिवार में संतुलन रखती, ये बहुत ही आधुनिक महिलाएं हैं। ये संवेदनशील और प्रतिबद्ध व्यक्तित्व भी हैं, जो नई चुनौतियों का सामना करने और हदों को जीतने के लिए तैयार हैं। (विमेन्स फीचर सर्विस)

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