December 25, 2010

आत्महत्या के रास्ते युवा पीढ़ी

- गोपाल सिंह चौहान

छात्र- छात्राओं द्वारा सबसे अधिक आत्महत्याएं होने वाले देशों में भारत पहला स्थान रखता है। शिक्षा के आदर्श प्रतिमानों में शुमार स्कूल अब बच्चों की खुदकुशी का कारण बनने लगी हैं जिससे यह पूरा ढांचा सवालों के घेरे में है।
मानव इतिहास में पहली बार 1819 में जर्मनी के एक शहर प्रुश्या में शुरू की गयी स्कूली व्यवस्था हिन्दुस्तान में आज अपने सबसे बुरे दौर में है। वैसे तो भारत में आज की शिक्षा प्रणाली हजारों खामियों से ग्रसित है, कोढ़ में खाज यह कि छात्र- छात्राओं द्वारा सबसे अधिक आत्महत्याएं होने वाले देशों में भारत पहला स्थान रखता है। शिक्षा के आदर्श प्रतिमानों में शुमार स्कूल अब बच्चों की खुदकुशी का कारण बनने लगे हैं जिससे यह पूरा ढांचा सवालों के घेरे में है। 'शिक्षा का अधिकार' बिल के अति उत्साही समर्थकों को राष्ट्रीय अपराध आंकड़े ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट को पढ़कर यह समझने में देर नहीं करनी चाहिए कि कहीं उनका यह शिक्षा का अधिकार हमारे मासूम छात्र- छात्राओं के पास आत्महत्या के रास्ते से तो नहीं पहुंचेगा? एनसीआरबी के 2008 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार 2007 में देश में कुल 1976 छात्र- छात्राओं ने विभिन्न परीक्षाओं में फेल होने के कारण आत्महत्या की है। 2008 में यह संख्या बढ़कर 2100 तक पहुंच गयी थी। 2006 का साल इस लिहाज से सबसे बुरा समय माना जायेगा जिस दौरान 5857 छात्र- छात्राओं यानि हर दिन परीक्षा के दबाव ने 16 विद्यार्थियों को आत्महत्या के लिए मजबूर किया। 2008 की इन रिपोर्टों के दो साल बाद आज शिक्षाविदों का मानना है कि 2011 तक आते आते यह स्थिति और भी भयानक रूप लेने वाली है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी 15 से 35 आयुवर्ग में हो रही मौतों में आत्महत्या को पहले तीन कारणों में जगह दी है।
शिक्षा की परीक्षा
इस रिपोर्ट का एक दूसरा पहलू और भी दुखद है जो हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था के उस आदर्श पर प्रश्न चिह्न लगाता है जिसके महावाक्य 'आनंदमयी शिक्षा', 'अनिवार्य शिक्षा', 'सर्व शिक्षा', 'खेल- खेल में शिक्षा' और अब 'शिक्षा का अधिकार' जैसे कईं आडम्बर पूर्ण मुहावरों से भरे पड़े हैं। यह रिपोर्ट इन आडम्बरों की भी पोल खोलती है जिसके अनुसार पिछले वर्षों में हुई कुल आत्महत्याओं में केवल 21.8 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिन्होंने किसी तरह की कोई स्कूली व अन्य औपचारिक शिक्षा नहीं ली। क्या हम ऐसा कह सकते हैं कि स्कूल न जाने से कितने लोग आत्महत्या करने से बच गये होंगे? पढ़े लिखे लोगों द्वारा आत्महत्या करने वाले मामलों में प्राथमिक शिक्षा ले चुके लोगों की संख्या सबसे ज्यादा यानी 25.2 प्रतिशत है। दूसरे स्थान पर है माध्यमिक तक की शिक्षा ले चुके लोगों का प्रतिशत जो है 24.2। इसी प्रकार दसवीं तक पढऩे वाले 17.6 प्रतिशत, हायर सेकेण्डरी का 8.1 प्रतिशत, स्नातक 1.9 प्रतिशत तथा स्नात्तकोतर व इससे आगे की पढ़ाई करने वालों का प्रतिशत 0.3 प्रतिशत है। आप में से कुछ आशावादी इसका यह मतलब भी निकाल सकते हैं कि यदि लोगों तक उच्च शिक्षा दी जाए तो यह प्रतिशत कम हो सकता है। लेकिन यह व्यावहारिक रूप से बिल्कुल सही नहीं है क्योंकि इतने बड़े देश में एक उन्नत उच्च शिक्षा की व्यवस्थाएं फिलहाल संभव ही नहीं है। इसके कारणों की भी यह रिपोर्ट पड़ताल करती है।
इससे एक बात साफ जाहिर होती है कि सरकार जिस तरह का देशी- विदेशी अरबों रुपया पिछले कुछ दशकों से प्राथमिक शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने में लगा चुकी है उसके सकारात्मक परिणाम व्यावहारिकता में दिखाई नहीं दे रहे। 'स्कूल बिना बढ़े चलो' विचारधारा के अग्रणी प्रवक्ता जॉन हॉल्ट के वे प्रश्न आज जायज लगते हैं जिसमें वे इस पूरी फैक्ट्री -स्कूली व्यवस्था से सवाल करते हैं कि क्या स्कूलों की कतई कोई जरूरत है चाहे वे किसी भी तरह चलते और संचालित होते हों? क्या वे सीखने के श्रेष्ठ स्थान हैं? क्या वे बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान हैं? वे एक अच्छा स्थान भी हैं क्या?
अब इस रिपोर्ट के दूसरे पहलूओं को भी गौर से देखें। विभिन्न काम- धंधों के आधार पर किये गये वर्गीकरण में यह रिपोर्ट बताती है कि कुल आत्महत्याओं में विद्यार्थियों का प्रतिशत 5.1 प्रतिशत है जिसमें छात्राओं की संख्या छात्रों की तुलना में 2.3 प्रतिशत अधिक है। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि खुदकुशी का रास्ता अपनाने वाले 75.8 प्रतिशत विद्यार्थी यानी कुल 6248 आत्महत्या करने वाले छात्र- छात्राओं में से 4734 विद्यार्थी 15 से 29 साल की उम्र के हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था भी युवाओं के लिए अधिक संभावनाओं का रास्ता नहीं देती। वर्ष 2007 में 14 वर्ष तक के 1240 और 30 से 44 वर्ष तक के 250 विद्यार्थियों ने खुदकुशी की है।
इसी रिपोर्ट में 2006 के आंकड़े यह बताते हैं कि परीक्षाओं में फेल होने के कारण खुदकुशी करने वालों में भी 15 से 29 वर्ष के छात्र- छात्राओं की संख्या सबसे ज्यादा है। 2006 में इस आयु वर्ग के 1532 छात्र- छात्राओं ने परीक्षा में फेल होने की वजह से मौत को गले लगाया। 14 वर्ष तक की उम्र में लड़के- लड़कियों का अनुपात बराबर रहा जिनमें 179 छात्र व 179 छात्राओं ने परीक्षा पास नहीं कर पाने की वजह से खुदकुशी की।
आत्महत्या में युवा सबसे आगेपरीक्षाओं में फेल होने या कम नंबर आने के कारण मौत को गले लगाने वाले इन युवाओं के अलावा ऐसे नौजवानों की भी कमी नहीं है जो अपनी व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में तालमेल नहीं बैठा पाने के कारण अपने जीवन को नष्ट करने का मन बना लेते हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि समस्याओं का हल ढूंढने में नाकाम रहने पर मौत का रास्ता अपनाने वाले अधिकांश युवा 30 वर्ष से कम उम्र के ही हैं। इस उम्र के 129 युवा रोज इस देश में आत्महत्या कर लेते हैं जबकि 30 से 44 वर्ष की उम्र के 119 लोग रोज अपनी मर्जी से मौत को गले लगाया है। इन आत्महत्या करने वाले युवाओं में आधे से ज्यादा स्नातक, कॉलेज जाने वाले और उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले पाए गए। 2008 में यह देश 1,25,017 आत्महत्याओं का साक्षी बना है जिसमें 47,033 लोग यानि 37।6 प्रतिशत 30 वर्ष से कम उम्र के युवा थे। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि आत्महत्या करने वालों की संख्या युवा लड़कियों की तुलना में युवा लड़कों (25,561 या 20.4 प्रतिशत) की ज्यादा है। 2008 में ही 21,432 यानि 17.2 प्रतिशत महिलाओं और लड़कियों ने आत्महत्या की जिनकी उम्र 30 वर्ष से कम थी।
यह एक राष्ट्रीय चिंता का विषय है कि क्यों इतनी बड़ी संख्या में युवा वर्ग खुदकुशी के रास्ते को अपना रहा है। इन आत्महत्याओं के प्रमुख कारणों में असाध्य बीमारियां, पारिवारिक कारण, प्रेम प्रसंग, गरीबी और बेरोजगारी का होना पाया गया है। यह शिक्षा से कहीं ज्यादा इस देश के लिए एक नैतिक प्रश्न भी बनता जा रहा है जो समाज में एक नये प्रकार की हिंसा के खतरे का संकेत है। 2005 से 2007 तक के आंकड़ों पर गौर करें तो तीनों ही वर्षों में जिन राज्यों में सबसे ज्यादा खुदकुशी के मामले सामने आये उनमें महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक शीर्ष पर हैं। शिक्षा व आर्थिक रूप से कमजोर माने जाने वाले राज्यों जैसे बिहार, उत्तरप्रदेश व राजस्थान में खुदकुशी के मामले अन्य राज्यों की तुलना में बहुत कम पाये गये। केन्द्र शासित प्रदेशों में पांडिचेरी व अंडमान व निकोबार द्वीप समूह सबसे अधिक खुदकुशी करने वाले राज्यों में सबसे ऊपर की श्रेणी में है।
यदि इन आंकड़ों को इस देश की शिक्षा व्यवस्था और उससे जुड़ी नीतियों के घेरे में समझने की कोशिश करें तो एक बात तो स्पष्ट होती है कि शिक्षा का प्रचलित ढांचा इस देश में स्वस्थ समाज की संरचना में कोई योगदान नहीं दे रहा। बल्कि इसके कई असर इस देश के युवा वर्ग को भ्रम में डालने और जिंदगी में हताशा तथा निराशा के रूप में प्रकट हो रहे हैं। शिक्षा को मानव की जिन भावनात्मक जड़ों तक पहुंचना होता है शायद हम इसमें सफल नहीं हो रहे।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि खुदकुशी कभी एक दिन का निर्णय नहीं हो सकती, इसके पीछे मन का एक विज्ञान काम करता है जिसे दिन- ब- दिन असंवेदनशील होते जा रहा समाज अपने बच्चों के मन में पढ़ नहीं पाता। बच्चों को जानने का काम हमने छोड़ दिया है।
प्रतिस्पर्धामूलक शिक्षा व्यवस्था के परिणामस्वरूप खुदकुशी करने वाले इन विद्यार्थियों को तथाकथित 'सफलताÓ की चाह में पिछड़ जाने की वजह से अपनी जिंदगी से हाथ धोने पर मजबूर किया जाता है। यह एक अपरोक्ष मानसिक दबाव है जिसमें डर और पारिवारिक अपेक्षाओं के कारण बच्चे की स्वाभाविक शिक्षण प्रक्रिया न केवल बाधित होती है बल्कि अक्सर ताउम्र वे इस ग्रंथी से बाहर नहीं निकल पाते। कम उम्र के बच्चों और विद्यार्थियों पर हो रहे इस अत्याचार के क्या अर्थ हो सकते हैं? हम एक भूल से गुजर रहे हैं जिसमें शिक्षा के समस्त उपक्रम की जवाबदेही आज किसी के पास नहीं है। क्या हम यह कह सकते हैं कि इन खुदकुशी करने वाले विद्यार्थियों के अंतद्र्वंद्वों या अंतर्विरोधों के जवाब हम में से किसी के पास भी हैं? आज यह दावा कोई नहीं करना चाहेगा। ना ही हमारा शिक्षा तंत्र और ना शिक्षा शास्त्री। क्या यह एक नियंत्रण की प्रक्रिया नहीं है जिसका अनिवार्य हिस्सा डार्विनवाद के रूप में सभी को सहज शिक्षा के अधिकार से वंचित रख अनिवार्य रूप से स्कूल अथवा परीक्षा मूलक पद्धतियों को शिक्षा के एक मात्र साधन या अधिकार के रूप में देखता है।
उच्च शिक्षा का भुलावा
हम सभी इस सच्चाई से परिचित हैं कि उच्च शिक्षा अब केवल पैसे का बाजार बन चुका है। अच्छे संस्थान केवल उन विद्यार्थियों के लिए हैं जो तथाकथित आई. क्यू. टेस्ट पास करके आते हैं और उन्हें अन्य औसत छात्रों की तुलना में प्रतिभाशाली समझा जाता है। केवल ये ही लोग इस प्रतिस्पर्धामूलक बाजार में नौकरियां हासिल कर पाते हैं और वह बड़ा वर्ग जो इतना 'प्रतिभाशाली' नहीं है उन्हें अक्सर निराशा ही हाथ लगती है। वे केवल इन्टेलिजेंट और होशियार लोगों को छांट लेते हैं और 'जाहिल', 'बेवकूफ' व 'गधे' लोगों को निकालकर बाहर फेंक देते हैं। यह निराशा ही धीरे- धीरे उन्हें आत्महत्या के लिए प्रेरित करती है।
केंद्र में बैठे शिक्षा नीतिकारों ने विदेशी शिक्षा और सूचना प्रोद्योगिकी का जो हव्वा पिछले कुछ सालों में खड़ा किया है उसकी हवा निकालते ऐसे मामले रोज हमारे सामने आ रहे हैं जिसमें अमेरिका से नौकरी छोड़कर आ रहे या बड़ी शिक्षण संस्थानों से डिग्री हासिल किये नौजवान घोर निराशा में घिर कर आत्महत्याएं कर रहे हैं। कपिल सिब्बल अब विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में शिक्षा देने के लिए अपने पलक पांवड़े बिछाने को तैयार हुए हैं जबकि यह देखने की किसी को फुर्सत नहीं की देश में पहले से मौजूद विश्वविद्यालयों में दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता क्या है।
कमोबेश यही स्थिति सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देखने को मिल रही है जहां अत्यधिक व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा ने युवाओं को घुटन भरी जिंदगी जीने के लिए बाध्य सा कर दिया है। इस शिक्षा का चरम मूल्य सिर्फ और सिर्फ नौकरी पाना रह गया है और इस बात की फिक्र करना आपको बहुत पीछे धकेल देगा कि आपके जीवन मूल्य आपको कहां लेकर जा रहे हैं। हाल ही में केरल राज्य महिला आयोग के कराये गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आयी है कि सूचना प्रोद्योगिकी क्षेत्र में भारी वेतन और तड़क- भड़क के बावजूद इस उद्योग में कार्यरत महिलाओं को शारीरिक परेशानी और मानसिक तनाव झेलना पड़ता है।
बाजार और शिक्षा की यह गड्ड- मड्ड एक बड़े युवा वर्ग को भ्रमित कर उसकी सारी ऊर्जा को जिंदगी के पतन की ओर उन्मुख कर रही है। हर साल होने वाली ये आत्महत्याएं एक ऐसे समाज की अभिव्यक्ति है जहां के विद्यार्थी परीक्षा के उत्तर कॉपियों में नहीं 'सुसाईड नोट' में लिखते हैं। क्या आज की युवा पीढ़ी के पास खुदकुशी ही इस शिक्षा व्यवस्था का उत्तर है?
पता- उस्ता बारी के अन्दर, बीकानेर राजस्थान,
मोबाइल 09928522992, ईमेल- gopalbkn1@gmail.com

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