December 02, 2009

इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं


इक तुम ही नहीं तन्हा उल्फत में मेरी रुसवा
इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं
इक सिर्फ हमीं मय को आंखें से पिलाते हैं
फिल्म 'उमराव जान' (1981) का यह गीत नवाबी अवध की 'तवायफ' को एक बेचारी के रूप में पेश करता है, जिसके प्रेमी को सभ्य समाज में बदनामी झेलनी पड़ती है। लेकिन यह बदनामी भारतीय सिनेमा में उत्तरी भारत की 'तवायफों' के कई जटिल रूपों का केवल एक चेहरा है जिसने लोकप्रिय कल्पना को उत्तेजित किया है।
नवाबी लखनऊ के पुराने बा$जार के चौक में एक कोठे के वारिस, छोटे मियां का कहना है, 'एक $जमाना था जब 'तवायफों' को शिष्टाचार और संस्कृति का शिखर माना जाता था। वे उत्तर भारतीय संगीत एवं नृत्य की संरक्षक थीं और उनका मेल-जोल कुलीन वर्ग के साथ था।'
उन 80 वर्षों के दौरान, जब लखनऊ अवध के नवाबों की राजधानी था, चौक के ये मकान - जहां ये औरतें रहतीं थीं और दरबार के समृद्घ उच्चवर्ग का मनोरंजन करती थींं - संगीत और सांस्कृतिक महफिलों का केंद्र हुआ करते थे। छोटे मियां दुखी होकर कहते हैं, आज, 'तवायफें' लगभग खत्म हो चुकी हैं। इस शब्द को पुन: परिभाषित कर दिया गया है और अब यह एक आम वेश्या पर भी लागू होता है। फिर भी, इतिहास उनके शानदार बीते दिनों का साक्षी है। अपनी अद्भुत राजनीतिक और सैनिक योग्यताओं के बल पर उत्तर प्रदेश में सरधाना रियासत की शासक बनने वाली, बेगम समरु, एक 'तवायफ' थीं। मोरन सरकार 1802 में महाराजा रंजीत सिंह की रानी बनीं। उन्हें कला और पत्रों का माहिर माना जाता था और उनके परोपकारों के लिए उनका काफी आदर किया जाता था। यहां तक कि महाराजा ने उनके चित्र वाले सिक्के तक चलवाए थे।
सन् 1856 में, ब्रिटिशों द्वारा अवध का संयोजन, इस मध्यकालीन प्रथा के लिए मौत की पहली घंटी के समान था। उनके संरक्षकों के न रहने से और 1857 में बागियों की सहायता करने के लिए ब्रिटिशों द्वारा स$जा मिलने, और उन्हें वेश्या का नाम दिए जाने के कारण, 'तवायफों' को जिंदा रहने के लिए बहुत बहादुरी से लड़ाई लडऩी पड़ी।
सन् 1913 के लखनऊ में, उनके बारे में लिखते हुए, स्थानीय इतिहासकार अब्दुल शरार ने पाया कि 'तवायफों' के संपर्क में आने से पहले, वे एक सभ्य और शालीन व्यक्ति नहीं थे।'
'तवायफों' का प्रभावशाली उच्चवर्गीय औरतों के रूप में रूतबा मुख्य रूप से उत्तरी भारत में था, जो 18वीं शताब्दी के मध्य में मुगल सल्तनत के कम$जोर होने के दौर में और म$जबूत हुआ। हालांकि, तवायफ शब्द - जो अरबी भाषा के शब्द 'तैफा' का बहुवचन है जिसका अर्थ है 'समूह' - आज 'वेश्या' का पर्यायवाची बन गया है। यह इस शब्द का बहुत ही भ्रष्ट रूप है, एक $जमाने में कुलीन/महान प्रथा की झलक इसमें बिल्कुल नहीं है।
इतिहासकार वीना तलवार ओल्डनबर्ग, अपनी पुस्तक 'दि मेकिंग ऑफ कोलोनियल लखनऊ' में कहती हैं 'तवायफों' को वेश्या वृत्ति से जोडऩा, इस प्रथा को सबसे भ्रष्ट रूप में पेश करना है'।
जापान की गाीशाओं जैसी भूमिका निभाती, 'तवायफें' मनोरंजन करने वाली ऐसी औरतें थीं जो शेरो- शायरी, संगीत, नृत्य और गायकी में माहिर थीं और अक्सर उन्हें शिष्टाचार की विशेषज्ञ समझा जाता था। 18वीं शताब्दी आते- आते वे उत्तर में शिष्ट, सभ्य संस्कृति का केंद्रीय वर्ग बन गईं थीं।
दिल्ली में मुगल साम्राज्य के पतन ने इस प्रथा की कई मुखियाओं को अवध, हैदराबाद, रामपुर और भोपाल के नवाबों के दरबार की शोभा बनने पर म$जबूर कर दिया। 'नवाबी' संस्कृति के इन नए केंद्रों के अंदर, तवायफों को अमीर और शक्तिशाली कुलीन व्यक्तियों का समर्थन मिलने लगा और वे विलासितापूर्ण तथा सुसंस्कृत रहन- सहन का प्रतीक बन गईं। राजा बनने वाले, लखनऊ के आखिरी नवाब, वाजिद अली शाह, का एक 'तवायफ' व$जीरन के यहां काफी आनाजाना था। कहा जाता है कि जब उन्हें गद्दी मिली तो उन्होंने उसे अपने व$जीर, अली नकी खान, की आश्रिता बना दिया।
सन् 1856 में ब्रिटिशों द्वारा लखनऊ के संयोजन के बाद, भले ही उनका रुतबा उतना प्रभावशाली नहीं रहा, पर भारत की स्वतंत्रता की पहली लड़ाई में 'तवायफों' की भूमिका का उल्लेख जरूर है। लखनऊ नगर निगम के रिकार्ड कक्ष में रखे 1858-77 के नागरिक कर लेजर में, 'तवायफों' को 'नाचने और गाने वाली लड़कियों' की पेशेवर और सबसे अधिक कर वाली श्रेणी में रखा गया था।
बागियों का दमन करने के बाद ब्रिटिशों ने जो संपत्तियां जब्त कीं, उस सूची में भी उनके नाम प्रमुखता से न$जर आए। ओल्डनबर्ग लिखती हैं, 'इन महिलाएं को, हालांकि साफतौर पर ये लड़ाई न करने वाली थीं, फिर भी उन्हें बागियों को भड़काने और उनकी आर्थिक सहायता करने के लिए सजा मिली।' युद्घ की लूट के इस माल का मूल्य अनुमानत: लगभग चार करोड़ (4 मिलियन) था।
19वीं शताब्दी में ब्रिटिशों द्वारा संयोजनों सेे भारत के बड़े हिस्सों पर कब्$जा करने के बाद, उत्तर भारत के जागीरदारी समाज में रची-बसी इस प्रथा का पतन हो गया। अपना आर्थिक समर्थन और संबद्घ सांस्कृतिक संदर्भ खोकर, 'तवायफें' जिंदा नहीं रह सकीं।
इसके साथ ही 'तवायफों' की वेश्याओं के तौर पर उपनिवेशवादी रचना भी शुरू हो गई। ब्रिटिशों ने लखनऊ और अन्य छावनी नगरों में उनके रजिस्टे्रशन और नियमित चिकित्सीय जांच लागू करने के लिए कानून पारित किए। उन्होंने सुंदर औरतों को 'कोठों' से उठा कर छावनियों में पटक कर, इस पूरी परम्परा को अमानवीय बनाया।
ऐसे दमन के बावजूद, 1947 में स्वतंत्रा प्राप्ति तक, 'कोठे' उच्च संस्कृति के लिए प्रभावशाली स्थान बने रहे। यदि ब्रिटिशों ने एक तेजी से गिरते, जागीरदारी और यौनिकता-अनअवरुद्घ समाज के प्रतीक के रूप में 'तवायफों' को परेशान करना शुरू किया, तो बढ़ते मध्यवर्ग के हस्तक्षेपों ने उनका नियमन, सुधार या अन्य तरीकों से उन्हें उपेक्षित करना चाहा।
स्वतंत्रता-पूर्व काल में स्थानीय मध्य-वर्ग के लिए औरतपन और मध्यवर्गीय नारीत्व के लिए स्थापित नए नैतिक नियमों का लखनऊ की 'तवायफों' ने उल्लंघन किया, यह 'अवध अखबार' में छपे अनेक लेखों से स्पष्ट था, जिन्होंने 'तवायफों' को खतरनाक बुरी लत की अग्रदूत के तौर पर पेश किया।
आमतौर पर इस नए मध्यवर्ग की जड़े उच्च मुस्लिम और 'नवाबी' परिवारों से नहीं थीं बल्कि 'तवायफों' जैसी परम्पराओं से बिल्कुल परे यह एक अलग ही वर्ग था। स्वयं 'तवायफें' भी अक्सर उन लोगों से मेलजोल नहीं रखना चाहती थीं, जो उनकी न$जरों मेंं 'असभ्य' होते थे या जिनमें शिष्टाचार की कमी होती थी।
आज 'तवायफों' की प्रथा वास्तव में खत्म हो गई है। लखनऊ में एक 'कोठे' के मालिक की वारिस, गुलबदन कहती हैं, 'इस शब्द को पुन: परिभाषित किया गया है ताकि यह एक आम वेश्या पर लागू हो सके'। 'लेकिन इन वेश्याओं में 'पुरानी तवायफों' जैसी कोई समानता नहीं है।
लोग यह बात भूल जाते हैं कि प्राचीनकाल की नगरवधुएं विभिन्न कलाओं की जन्मदाता थीं, या कम से कम उन्हें लोकप्रिय बनाने वाली थीं। उदाहरण के लिए, उन्हें 'दादरा', 'गजल' और 'ठुमरी' जैसी संगीत विद्याओं में महारत हासिल थी। 'कत्थक' नृत्य भी 'तवायफों' से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। बेहद तालमय और कभी- कभी भाव वाचक यह नृत्य शैली, उत्तरी भारत में सदियों से लोकप्रिय रही है।
सौभाग्य से, 'तवायफों' की कला उनके साथ ही समाप्त नहीं हुई। बल्कि, भाग्य की अजीब विडंबना से, जिस मध्यवर्ग ने इस प्रथा के विनाश की अगुवाई की थी, उसी ने 'तवायफों' की कला को बचाए रखा। आज, नृत्य उच्च मध्यवर्ग की विशिष्टता है और शास्त्रीय संगीत सीखना सिर्फ बहुत अमीर लोगों के बच्चों के लिए ही है। इस विकास की विडंबना को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
(विमेन्स फीचर सर्विस)

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