December 12, 2019

कविता

यादों की गुल्लक

- भावना सक्सैना 

आज अचानक बैठे-बैठे
फूट गई यादों की गुल्लक
जंगल मे बहते झरने से
झर-झर झरे याद के सिक्के
गौर से देखा अलट-पलट कर
हर सिक्के का रंग अलग था,
खुशबू थी बीते मौसम की
पीर जगाती दिल में, लेकिन
मौसम थे खुशरंग वो सारे।
इक इक सिक्का
लिए कहानी आया बाहर
एक बड़ी सी ढेरी दस की
बाबा की जेबों से निकले
बस वो सिक्के नहीं है केवल
हर एक पर अक्स छपा है
लाड़ लड़ाते बाबा का और
पैताने कम्बल में छिपने पर
दादी की मीठी झिड़की भी।
छोटा वाला एक वो सिक्का
जिसकी चुस्की रंग-बिरंगी
लेते लेते छूट ग थी
त्योरी देख बुआ की उस दिन...
सैक्रीन से बैठ जाएगा
गला तुम्हारा, और
रंग भी ठीक नही ये
कुल्फी, सॉफ्टी मलाई-बर्फ
शुद्ध दूध से बनते सारे
लेना है तो कुछ अच्छा लो।
एक चवन्नी मेहनत की है...
टाल और चक्की की फेरी
बड़ी प्रिय वो इस कारण, कि
पाठ वो पहला
अपने बूते कुछ करने का
जिससे चलना सीखा अकेले
और इसी ने राह बनाई।
एक अठन्नी, ली थी ज़िद कर
मेले जाते जाते
रिब्बन, माला, चूड़ी, गुड़िया,
खेल-खिलौने रंग-बिरंगे
टिका नहीं मन किसी पर आ,
तो, वापस आई घूमघाम कर
तब से यूँ ही पड़ी हुई है
बाट जोहती मेले की फिर...
कैसे कहूँ प्रेम और सद्भाव के
अब वो मेले यहां नही हैं।
रुपया एक मोहब्बत वाला
तकना बस नुक्कड़, छज्जे से
मन की पींगें उड़ती ऊँची
सामने आ बस नज़र झुकाई
लाज और संस्कार का रंग
गहरा था तब किसी भी रंग से।
और कई हैं सिक्के इसमें
राज़ अनूठे दुबके छिप-छिप
रेज़ा-रेज़ा  ख़्वाहिश के रंग
यादें ऐसी फैल गयी हैं
सिरे समेटे से न सिमटे।
डूब गई आकंठ इन्हीं में
पूंजी लिए हुए बचपन की
भीगे नयन हृदय हर्षाता
वक्त काश वो फिर आ पाता।

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