May 15, 2018

काश... बचपन फिर लौट आए

काश... बचपन फिर लौट आए

- डॉ० भावना कुँअर
जून की छुट्टियों का इंतज़ार हम सभी बच्चों को बड़ी बेसब्री से रहता था,जिसमें दादा-दादी के गाँव जाने का मौका मिलताथा, तो दूसरे साल नानी के पास दिल्ली जाने का।कितनी ही यादों के पिटारे हैं मेरे पास। एक बार की बात है हम सभी बहन भाई छुट्टियों में इकट्ठा हुए, उसमें मेरी बुआ जी के बेटे और बेटियाँ भी थीं। उनसे हमें नए -नए गेम सीखने को मिलते थे जो हम पहले कभी भी नहीं जानते थे, हम तो शहर में रहकर कैरमलूडो आदि ही खेला करते थे। हमारी दीदी ने हमें कंकर-कंकर जोड़कर एक खेल खिलाया जो हमें आज भी याद है, गर्मी की दोपहर में हम दादी माँ के घड़े चुराकार उनको फोड़ते और छोटे-छोटे गिट्टू बनाते फिर उनको घिसकर चिकना करते ताकि हाथ में चुभे नहीं, तब गेम शुरू करते।
सौ-सौ गिट्टटू सब लेते, अब गेंद उछाल-उछालकर गिट्टू चुनते जिस पर सारे गिट्टू आ जाते वही विजयी होता, बहुतअच्छा लगता था वह गेम हमको, जीतने पर लगता था जाने कितना बड़ा खज़ाना हाथ लग गया हो और वह चोरी के घड़े फोड़ने में भी एक अलग ही तरह की खुशी मिलती थी, दादी माँ कभी-कभी इधर-उधर कुछ ढूँढती नज़र आती परकभी पूछती कुछ नहीं हमारा उद्देश्य उनको दुखी करना बिल्कुल नहीं होता था, बस हमें तो नई-नई शैतानियाँ सीखने को मिलती थी अपने कजन से। एक गेम हुआ करता था स्टम चौंगला कोडियों और तिनको के साथ खेला करते थे,अबतो उसके नियम भी याद नहीं हैं बस कुछ धुँधली सी यादें ही शेष हैं। गिल्ली-डंडा, छुपम-छुपाई, कीरा-काटी ये सारे गेम
वहीं गाँव जाकर सीखे। एक बार हम सब बच्चे दीपावली पर गाँव गए , वो हमारी पहली दीपावली थी गाँव में बहुत सारेपटाखे कंदील लेकर गए  थे हम शहर से,रोशनी तो गाँव में कुछ खास थी नहीं, पहले हमने खूब जी भरकर पटाखे जलाए फिर दादी और बहन के हाथ का बना स्वादिष्ट खाना खाया, उस खाना में जो दादी का प्यार था वह बहुत अलग ही था जिसका स्वाद आज भी उस दिन को याद करके आ जाता है।
अब हमारा मन फिर पटाखे जलाने का हुआ रात काफी हो चुकी दादी हम सबको बिस्तरों पर सुलाने को कहकर खुद भी सोने चली गईं, पर हमारे दिमाग में शैतानियाँ खलबली मचा रही थीं, हम सब बहन भाई दबे पाँव छत पर गए  अपने बचे हुए  छोटे बम लेकर वहाँ जब बम जलाए  तो आनन्द नहीं आया हमें तो बड़े वाला शोर चाहिए था, खुरापाती दिमागलगा अपने घोड़े दौड़ाने, अब कज़न भाई के दिमाग में खुराफात आ ही गई वह दबे पाँव नीचे गया और बहुत सारे घड़े उठा लाया।

अब छोटे बम उसमें रखता और बड़ा -सा ढक्कन उस पर रख देता बड़ी जोरों की आवाज़ होती और हम सब बहुत खुश होतेतालियाँ बजाते, चार घड़े फोड़ने के बाद हमने सुना कि गाँव के लोग इकट्ठा होकर शोर मचा रहे हैं-; डकैत आ गए, डकैत आ गए...हमारी दादी भी जाग गईं थी और हमें बिस्तर में ना पाकर दबी आवाज में हमें पुकारने लगीं, सब लोग चिल्लारहे थे –डकैत आ गए  पकड़ो-पकड़ो...!अब हमारे पसीने छूटने की बारी थी, हम सब बहुत डर रहे थे, लकड़ी की बनीसीढी पर हम लुढक-पुढक होते नीचे की तरफ दौड़े, शोर हमारी ही तरफ आ रहा था, किसी ने गाँव से कई फायर भी किए, जिससे डकैत भाग जाएँ, हमारी दादी ने हमें दबोचा और घर के अन्दर बन्द कर लिया। थोड़ी देर में ही बहुत सारेलोग हमारी छत पर आ गए और बोलने लगे-डकैतों की आवाजें यहीं से आ रही थींऔर उन पर बारूद भी था-वहाँ फूटेघड़े देखकर सब लोग कहने लगे- देखों यहीं थे वो लोग हमारी फायर की आवाजें सुनकर भाग गए, अब हमारी तो सिट्टी-पिट्टी गुम अरे ए  क्या हो गया गाँव के इतने सारे लोग हमारी वजह से परेशान हुए हम सब डर के मारे दम साधे खड़े रहे एक-दूसरे को आँखों से इशारा करते रहे कि कोई नहीं बोलेगा कि कोई डकैत नहीं था। यह हमारी शरारत थी। सब कह रहे थे- इनके बच्चे शहर से आए  हैं। अच्छा है हम सही वक्त पर आ गए वरना कोई अनहोनी भी हो सकती थी।
हमारी दादी तो रातभर बस गीता का पाठ करती रहीं और दिन निकलते ही हमारे रोने -धोने का भी उन पर कोई असर नहीं हुआ और डकैतों के डर से हमें रवाना कर दिया गया शहर की ओर।
आज मेरा न वो गाँव, गाँव जैसा दिखता है, न वो घर अब घर है, खण्डहर बन चुका है, ना दादा हैं,  ही दादी, भाई-बहन भी सब इधर-उधर हो गए, बस यादें हैं,जो जहन से जाती ही नहीं हैं, आज बाईस साल बाद गाँव गई। कुछ तस्वीरें संग ले आई, काश! वो वक्त वो बचपन फिर से लौट आए और लौट आएँ वो अपने और उनका प्यार।

सम्पर्कः सिडनी आस्ट्रेलियाbhawnak2002@gmail.com

1 Comment:

Dr.Bhawna said...

bahut bahut aabhar mere sansmaran ko sthhan dene ke liye..

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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